Monday, December 16, 2019 06:12 AM

तबादला नीति वांछनीय, परंतु जटिल

जगदीश बाली

लेखक, शिमला से हैं

निस्संदेह ऐसे में एक निश्चित तबादला नीति की दरकार है। अतः स्वागत योग्य है कि वर्तमान सरकार शिक्षकों के तबादले के लिए निश्चित व ठोस तबादला नीति लागू करने की बात कर रही है। इस उद्देश्य से एक साफ्टवेयर तैयार किया जा रहा है, जिससे मानवीय हस्तक्षेप लगभग समाप्त हो जाएगा। अगर ऐसा हो पाता है, तो यह कदम ऐतिहासिक और सराहनीय तो होगा ही, साथ में साहसिक भी होगा...

प्रदेश में हर सरकार तबादला नीति की बात करती आई है। खासतौर पर शिक्षकों की तबादला नीति की दशकों से बात हो रही है। सरकार कोई भी रही हो, इसकी पोटली से तबादला नीति की फाइल बार- बार खुलती और बंद होती है। अखबारों में भी मोटे-मोटे हर्फों में छप जाता है कि अब नहीं होंगे समय से पहले तबादले या सब काडर में गुजारने होंगे इतने साल वगैरह-वगैरह। तबादला नीति की यह फाइल मदारी के सांप की तरह पोटली से बाहर आती है। भीड़ उमड़ती है, खूब शोर होता है और तमाशाई पहले थोड़ा डरते हैं, पर फिर सब जान जाते हैं कि इस सांप से डरने की जरूरत नहीं, क्योंकि यह मदारी वाला सांप है, जो डसेगा नहीं, बस डराएगा। हालांकि 2013 में प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने इस बाबत गाइडलाइन भी जारी की थी, परंतु  इससे तबादले से जुड़े मुद्दों से निजात नहीं मिल पाई। जाहिर है पुख्ता नीति न होने के कारण सरकार, विभाग और कर्मचारी तबादलों के पेचो-खम में उलझे रहते हैं। इतिहास इस बात का द्योतक है कि जब-जब भी प्रदेश में सरकार बदलती है, तो नई सरकार का ध्यान सबसे पहले शिक्षा और शिक्षक की ओर जरूर जाता है। बड़े-बड़े बयान भी आ जाते हैं।

तब लगने लगता है कि शिक्षा की गुणवत्ता में शायद साहिब गंभीर होने वाले हैं। शिक्षा के क्षेत्र में कुछ बेहतर होने की संभावना जगती है। लगता है कुछ बदल रहा है। वास्तव में कुछ बदलता है या नहीं, यह बताने की आवश्यकता नहीं, आप भलीभांति जानते और समझते हैं। कुछ और बदले या न बदले, पर चेहरे जरूर बदलते हैं। नए जोश और गहमा-गहमी में अनायास ही सबकी तरेरी नजरें अध्यापकों के तबादलों पर अटक जाती हैं। दनादन तबादले होने लगते हैं, चेहरों की अदला-बदली होती है। अपने-अपने बंदे अपनी-अपनी मनमाफिक जगहों पर तैनात हो जाते हैं। जो चहेते मनमाफिक जगह पर पहुंच जाते हैं, वे तबादला होने पर फू ले नहीं समाते हैं, तो कुछ खुद को प्रताडि़त महसूस करते हैं। इस आपाधापी में अंडर स्टे वाला अपनी विशेष समस्याओं को आधार बनाकर ओवर स्टे वाले शिक्षक को उठा देता है। यह कोई नहीं देखता कि समस्या तो ओवर स्टे वाले की भी गंभीर हो सकती है। तर्क तो कहता है कि अंडर स्टे वाला ओवर स्टे वाले को क्यों उठाए? अपना कार्यकाल पूरा होने पर ही तबादला होना चाहिए, परंतु ऐसा होता नहीं है। कई बार तो तीन वर्ष से पहले ही शिक्षक का तबादला कर दिया जाता है। उधर शहर व जिला मुख्यालयों के इर्द-गिर्द घूम रहे शिक्षक आपसी सहमति (म्युचुअल बेसिज) का सहारा लेकर इर्द- गिर्द ही घूमते रहते हैं। वे वाकई अपनी जड़ें मजबूत कर डटकर अड़े रहते हैं। जो राजनीति के चलते उखड़ जाते हैं, वे नई सरकार से उम्मीद लगाए वापसी का इंतजार करते हैं। चाहे सरकार कोई भी हो, अदला-बदली के चक्कर में तबादले किसी नीति के आधार पर न होकर राजनीतिक व व्यक्तिगत खुंदस निकालने के लिए भी होने लगते हैं। शिक्षकों की कमी से जूझते प्रदेश में कुछ स्कूल खाली हो जाते हैं और कुछ भर जाते हैं। कई बार अभिभावक व स्थानीय लोग स्कू लों में ताला भी जड़ देते हैं। ऐसा चलता रहा है, चल रहा है और शायद चलता भी रहेगा, क्योंकि व्यवस्था ही ऐसी बन गई है या बना दी गई है। इसमें दोष किसी एक का नहीं। उधर जब लोग अपनी-अपनी मनमाफिक जगहों पर काबिज हो जाते हैं, तब मसनद और निजाम खुद को तबादलों की वजह से परेशान घोषित करते हैं। कभी तबादलों पर बैन लगता है और कभी बैन उठ जाता है। तबादले निरंतर होते रहते हैं, चाहे सत्रारंभ हो, मध्यावधि हो या अंत। सालों से तबादले की जो परिपाटी या व्यवस्था बनी है, उसके चलते किसी की इच्छा के विपरीत तबादले से समस्याएं ही पैदा होती रहती हैं, क्योंकि तबादले करते समय एकरूपता नहीं अपनाई जाती। ऐसे तबादलों से शिक्षा के स्तर पर कतई भी सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। उल्टे कई मामले कानूनी रूप से उलझ जाते हैं और शिक्षा निदेशालय का बहुत सारा समय उन्हें सुलझाने व न्यायालय में जवाब फाइल करने में लग जाता है। इस प्रक्रिया में कई बार अध्यापक छुट्टी पर भी चले जाते हैं। छात्रों का नुकसान तो होता ही है, उधर निदेशालय इस असमंजस में रहता है कि तबादलों को सुलझाए या फिर शिक्षा को बेहतर बनाने के बारे में कुछ सोचे।

निस्संदेह ऐसे में एक निश्चित तबादला नीति की दरकार है। अतः स्वागत योग्य है कि वर्तमान सरकार शिक्षकों के तबादले के लिए निश्चित व ठोस तबादला नीति लागू करने की बात कर रही है। इस उद्देश्य से एक साफ्टवेयर तैयार किया जा रहा है, जिससे मानवीय हस्तक्षेप लगभग समाप्त हो जाएगा। अगर ऐसा हो पाता है, तो यह कदम ऐतिहासिक और सराहनीय तो होगा ही, साथ में साहसिक भी होगा। साफ्टवेयर आधारित तबादला नीति हरियाणा में लागू हो चुकी है और हाल ही में पंजाब ने भी इसे लागू कर दिया है, परंतु हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियां अलग हैं। यहां ऐसी तबादला नीति बनाना और लागू करना जटिल कार्य होगा। बड़ा सवाल यह होगा कि सबसे पहले इस नीति के तहत किन शिक्षकों का तबादला होगा। मसलन कई वर्षों से शहरों और मुख्यालयों के निकट डटे शिक्षकों के जोन के हिसाब से कम अंक होंगे। तार्किक है कि इनका तबादला सबसे पहले होना चाहिए और हार्ड या सब काडर में होना चाहिए। संभवतः प्रदेश की राजधानी शिमला इन तबादलों में सफा-ए-अव्वल पर होगी, परंतु क्या ऐसा हो पाएगा? क्या कभी यह तबादला नीति हकीकत की जमीन पर उतर पाएगी? उतर आई तो बेहतर, न उतर पाई तो आपाधापी चलती रहेगी। फिर तबादले की पोटली खुलती और बंद होती रहेगी। यदि सरकार सफल रहती है, तो साधुवाद। वैसे तबादला नीति बनाना ठीक वैसा है, जैसे आग भी बुझानी है और दामन भी बचाना है।