Tuesday, March 31, 2020 07:39 PM

तबादलों से परहेज

यह आदर्श स्थिति है कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने विभिन्न सिफारिशों से लदी हुई करीब तीन सौ स्थानांतरण फाइलें लौटा दीं। यह कड़क संदेश है और सुशासन में सम्मिलित होने की ऐसी गुंजाइश भी, जिसे हिमाचल कबूल कर ले तो कई रास्ते सीधे हो जाएंगे। उल्लेखनीय है कि जयराम सरकार 31 मार्च तक ‘नो ट्रांसफर’ पालिसी अपना रही है ताकि अगले वित्त वर्ष और स्कूली सत्र का आगमन सहजता से हो। दरअसल हिमाचल में तबादले एक बला की तरह राजनीतिक धूमकेतु बने रहते हैं और सरकारें अपने वजूद में कर्मचारी दबाव इस हद तक भर लेती हैं कि पूरा कार्यकाल तबादलों की समीक्षा में ही गुजर जाता है। कर्मचारी सामर्थ्य का आकलन न के बराबर होने के कारण सरकारी कार्य संस्कृति चाह कर भी उत्प्रेरित नहीं होती। विभागीय दक्षता के अनुरूप वांछित परिणाम इसलिए भी नहीं आते क्योंकि व्यक्तिगत चिंताएं हर सरकार से पद और पदक की उम्मीद करती हैं। यह हिमाचल की राजनीतिक विडंबना भी है कि सत्ता में आने की कशमकश, कर्मचारी चाकरी बन जाती है। शायद इसलिए अब तक स्थानांतरण नियम या नीति बनाने के अलग-अलग संकल्प झाड़-पोंछ कर भी निर्णायक नहीं हुए। समितियां बनीं और सिफारिशें भी गढ़ी गईं, लेकिन सरकारों पर कर्मचारी फोबिया हावी रहा। अब वक्त आ गया है जब कर्मचारी कार्यशाला के बाहर प्रदेश के हितों की व्याख्या में सरकार अपनी रीढ़ दिखाए और मुख्यमंत्री ने ऐसा संदेश देकर नई कसौटी कसी है। कर्मचारी वर्ग को अगर सरकारी कार्य-संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में स्थापित किया जाए तो जनता के लिए भी यह एहसास की वांछित उपलब्धि रहेगी। जनता तो एक छोटी डिस्पेंसरी में कार्यरत सफल डाक्टर या प्राइमरी स्कूल के प्रगतिशील व वचनबद्ध शिक्षक पाकर भी सरकार को आशीर्वाद देती है। अब तक एक विभाजन रेखा की तरह कर्मचारी वर्ग और जनता के बीच जो चुना गया, उससे सुशासन की बागडोर गाहे-बगाहे कमजोर दिखाई दी। स्थानांतरण को सियासी विशेषाधिकार बनाते-बनाते राजनीति के कान इतने कच्चे हो गए कि सरकारों का बदलना कर्मचारी उत्सव बनता गया। ऐसे में पारदर्शी प्रशासन, कानून-व्यवस्था की सतर्कता, विकास की फाइलें, सार्वजनिक कार्यालय और जवाबदेह कार्य-संस्कृति के लिए यह जरूरी है कि इनसे सियासी पुरस्कार दूर रहें। आश्चर्य यह है कि जहां हिमाचल के बुनियादी सवाल अपने अर्थ पूर्ण हल चाहते हैं, वे तमाम विभाग घुटनों के बल चलते हैं। खास तौर पर पुलिस, शिक्षा व चिकित्सा विभागों में स्थानांतरणों की लंबी फेहरिस्त कार्यशैली को प्रेरित करने के बजाय बेचैनियां बढ़ाती है। एक शिक्षक को स्वीकारने की पद्धति छात्र केंद्रित होनी चाहिए, न कि विभाग को घुमक्कड़ बनाकर कुछ हासिल होगा। काडर विसंगतियों से काडर संघर्ष की सियासत तक जो माहौल पैदा होता है, उससे कहीं भिन्न हल ढूंढा जाना चाहिए। स्थानांतरण की अनिवार्यता को झुठलाया नहीं जा सकता, फिर भी यह पुरस्कार की तरह मिले तो इससे जुड़ी शर्तें पूरी पद्धति का उपचार कर सकती हैं, वरना हर कर्मचारी-अधिकारी पापड़ बेल-बेल कर अपने लिए एक जगह या मनपसंद जगह पर बने रहने के प्रयत्न में पूरा सेवाकाल गुजार देता है। बहरहाल कुछ फाइलें ठुकराकर मुख्यमंत्री ने स्थानांतरण के पैगाम बदले हैं, लेकिन स्थायी तौर पर इस दिशा में परिवर्तन की जरूरत है। शिक्षा विभाग की करवटों में स्थानांतरण नीति का जो खाका तैयार है, उसके परिणामों की समीक्षा शायद कोई रास्ता पुख्ता कर दे।