Tuesday, February 18, 2020 06:49 PM

तिब्बत में छिपा है तंत्र ज्ञान

मैं उसके सामने खड़ा मौन ही रह गया। फिर उसको ध्यान में लगे हुए देख कुछ भी पूछना उचित न लगा। अपनी इस लंबी रोमांचक यात्रा में मुझे इस प्रकार के बहुत-से लामा मिले थे, पर जितना तेज उस वृद्ध लामा के चेहरे पर था, वैसा तेज किसी के चेहरे पर न देखा था। अपने यौवन काल में तो वह अद्भुत रहा होगा। अपने कल्पना लोक में खो गया था मैं। मेरी आंखें बराबर उस वृद्ध लामा पर थीं...

-गतांक से आगे...

कायाकल्प

सिर से कानों तक को ढके हुए चमड़े की रोएंदार टोपी और लाल गहरे रंग का टखनों तक का चोगा पहने उस बड़ी-सी काली चट्टान पर वह ध्यानमग्न था। उसके दाहिने हाथ में थमा सोने से कारीगरी किया हुआ चक्र बराबर घूम रहा था और उसके होंठों से ‘ओम पद्मेमणि हुमू’ की धीमी ध्वनि निरंतर निकल रही थी। गोरा, झर्रियोंदार चेहरा दैदीप्यमान था। मैं उसके सामने खड़ा मौन ही रह गया। फिर उसको ध्यान में लगे हुए देख कुछ भी पूछना उचित न लगा। अपनी इस लंबी रोमांचक यात्रा में मुझे इस प्रकार के बहुत-से लामा मिले थे, पर जितना तेज उस वृद्ध लामा के चेहरे पर था, वैसा तेज किसी के चेहरे पर न देखा था। अपने यौवन काल में तो वह अद्भुत रहा होगा। अपने कल्पना लोक में खो गया था मैं। मेरी आंखें बराबर उस वृद्ध लामा पर थीं। उसके हाथ का चक्र निरंतर एक ही लय में घूम रहा था। अनवरत स्वर वातावरण में अमृत-सा भर रहा था। अचानक उसे मेरी उपस्थिति का एहसास हो गया और उसने आंखें खोलकर मुझे देखा। ‘तो तुम आ गए?’ उसका गंभीर स्वर गूंजा- ‘कल तुम लम्छोंग में थे ना?’ उस अपरिचित का सही प्रश्न सुनकर मैं कुछ चकित सा हुआ। ‘गंगटोक से रविवार को चले थे ना?’ ‘जी हां।’ मैंने विनम्रतापूर्वक कहा। उसने अपने हाथ का घूमता चक्र रोक दिया। फिर अत्यंत श्रद्धापूर्वक उसे चूमकर नमस्कार कर अपने चमड़े के थैले में रख दिया। उस चट्टान से नीचे उतरकर वह ठीक मेरे सामने खड़ा हो गया और बोला- ‘तामांग गोम्फा जाना है ना?’ ‘हां।’ मैंने फोरन कहा। वह आगे हो गया। मैं पीछे-पीछे चल पड़ा। मुझे पूरा निश्चय हो गया कि वह लामा एक सिद्ध पुरुष है। मन की सारी बातें जान लेता है। उससे कुछ कहने की आवश्यकता ही न पड़ी। वह सब कुछ जान गया। इसी प्रकार लम्छोंग में भी एक लामा मिला था। मुझे देखते ही बोला था- ‘तामांग गोम्फा जाना है ना?’ मेरे स्वीकार करने पर उसने पूरा रास्ता बतला दिया था। सुबह-सवेरे ही किराए का खच्चर लेकर मैं चल पड़ा था। खच्चर वाला पहाड़ी की तलहटी तक पहुंचा गया था और बोला था- ‘तामांग गोम्फा इसी पहाड़ी पर है।’ वह दो बार रास्ता समझाकर चला गया था और बोला था- ऊपर जाने का रास्ता और किसी से पूछ लेना, मैंने ठीक वैसा ही किया। ऊंची चढ़ाई का संकरा और कठिन रास्ता पार करके मैं ऊपर आया तो सर्वप्रथम इसी लामा पर दृष्टि गई, जो ध्यानमग्न था और अब मुझे अपने साथ लिए जा रहा था। थोड़ी-सी दूरी पर एक घुमावदार रास्ता था।