Monday, September 24, 2018 09:38 PM

तीन जन्मों के पाप नष्ट करता है कृष्ण जन्माष्टमी व्रत

जन्माष्टमी भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी इसे पूरी आस्था व उल्लास से मनाते हैं। श्री कृष्ण ने अपना अवतार श्रावण माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में लिया...

श्री कृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव है। योगेश्वर कृष्ण के भगवद गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। जन्माष्टमी भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी इसे पूरी आस्था व उल्लास से मनाते हैं। श्री कृष्ण ने अपना अवतार श्रावण माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में लिया। चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे, अतः इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए श्री कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है। श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन मौके पर भगवान कान्हा की मोहक छवि देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु मथुरा पहुंचते हैं। श्री कृष्ण जन्मोत्सव पर मथुरा कृष्णमय हो जाती है। मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है। जन्माष्टमी में स्त्री-पुरुष बारह बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है। रासलीला का आयोजन भी होता है। सभी मंदिरों को खूबसूरती से सजाया जाता है और भक्त आधी रात तक इंतजार करते हैं ताकि वे देख सकें कि उनके द्वारा बनाई गई खूबसूरत खरीद के साथ उनके बाल गोपाल कैसे दिखते हैं।

जन्माष्टमी व्रत कथा

अष्टमी दो प्रकार की है-पहली जन्माष्टमी और दूसरी जयंती। इसमें केवल पहली अष्टमी है। स्कंद पुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है। ब्रह्म पुराण का कथन है कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र श्री कृष्ण उत्पन्न हुए थे। यदि दिन या रात में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चंद्रमा से मिली हुई रात्रि में इस व्रत को करें। भविष्य पुराण का वचन है-भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता, वह क्रूर राक्षस होता है। केवल अष्टमी तिथि में ही उपवास करना कहा गया है। यदि वही तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो ‘जयंती’ नाम से संबोधित की जाएगी। वह्निपुराण का वचन है कि कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको जयंती नाम से ही संबोधित किया जाएगा। अतः उसमें प्रयत्न से उपवास करना चाहिए। विष्णुरहस्यादि वचन से-कृष्ण पक्ष की अष्टमी रोहिणी नक्षत्र से युक्त भाद्रपद मास में हो तो वह जयंती नामवाली ही कही जाएगी। वसिष्ठ संहिता का मत है-यदि अष्टमी तथा रोहिणी इन दोनों का योग अहोरात्र में असंपूर्ण भी हो तो मुहूर्त मात्र में भी अहोरात्र के योग में उपवास करना चाहिए। मदन रत्न में स्कंद पुराण का वचन है कि जो उत्तम पुरुष हैं, वे निश्चित रूप से जन्माष्टमी व्रत को इस लोक में करते हैं। उनके पास सदैव स्थिर लक्ष्मी होती है। इस व्रत के करने के प्रभाव से उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। विष्णु धर्म के अनुसार आधी रात के समय रोहिणी में जब कृष्णाष्टमी हो तो उसमें कृष्ण का अर्चन और पूजन करने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है। भृगु ने कहा है-जन्माष्टमी, रोहिणी और शिवरात्रि ये पूर्वविद्धा ही करनी चाहिए तथा तिथि एवं नक्षत्र के अंत में पारणा करें।

मोहरात्रि

श्री कृष्ण-जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। इस रात में योगेश्वर श्री कृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्ति हटती है। जन्माष्टमी का व्रत व्रतराज है। इसके सविधि पालन से आज आप अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाली महान पुण्यराशि प्राप्त कर लेंगे। व्रजमंडल में श्री कृष्णाष्टमी के दूसरे दिन भाद्रपद-कृष्ण-नवमी में नंद-महोत्सव अर्थात् दधिकांदौ श्री कृष्ण के जन्म लेने के उपलक्ष्य में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भगवान के श्रीविग्रह पर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढ़ाकर ब्रजवासी उसका परस्पर लेपन और छिड़काव करते हैं। वाद्ययंत्रों से मंगलध्वनि बजाई जाती है। भक्तजन मिठाई बांटते हैं। जगद्गुरु श्री कृष्ण का जन्मोत्सव निःसंदेह संपूर्ण विश्व के लिए आनंद-मंगल का संदेश देता है।

कृष्ण जन्माष्टमी पूजा का शुभ मुहूर्त

जन्माष्टमी के दिन निशिता पूजा का समय : 23.57 से 24.43 तक।

मुहूर्त की अवधि : 45 मिनट

जन्माष्टमी में मध्यरात्रि का क्षण : 24.20

3 सितंबर को पारण का समय : 20.05 के बाद

पारण के दिन अष्टमी तिथि के समाप्त होने का समय : 19.19

पारण के दिन रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने का समय : 20.05

वैष्णव कृष्ण जन्माष्टमी 3 सितंबर 2018 को मनाई जाएगी।

वैष्णव जन्माष्टमी के लिए अगले दिन का पारण समय : 06.04 (सूर्योदय के बाद)

पारण के दिन अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएंगे।

जन्माष्टमी व्रत व पूजा विधि

जन्माष्टमी की पूर्व रात्रि हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्पति, भूमि, आकाश और ब्रह्मादि को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर बैठें। इसके बाद हाथ में जल लेकर संकल्प करें। अब मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए प्रसूति-गृह  का निर्माण करें।  तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। मूर्ति या प्रतिमा में बालकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी अथवा लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किए हों। तत्पश्चात श्री कृष्ण की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करवाया जाता है। उसके बाद उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और उनका अभिषेक किया जाता है। अभिषेक करने के बाद उन्हें सुगंधित पुष्प, फल, मिष्ठान आदि अर्पित किए जाते हैं। फिर उन्हें माखन मिश्री, जो कि उनका प्रिय है, उसका भोग लगाया जाता है। इसके अलावा आप जन्माष्टमी के प्रसाद में पंजीरी व पंचामृत का भी भोग लगा सकते हैं। व्रत अगले दिन सूर्योदय के पश्चात ही तोड़ा जाना चाहिए। इसका ध्यान रखना चाहिए कि व्रत अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के पश्चात ही तोड़ा जाए। किंतु यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्यास्त से पहले समाप्त न हो तो किसी एक के समाप्त होने के पश्चात व्रत तोडं़े। किंतु यदि यह सूर्यास्त तक भी संभव न हो, तो दिन में व्रत न तोड़ें और अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में से किसी भी एक के समाप्त होने की प्रतीक्षा करें या निशिता समय में व्रत तोड़ें। ऐसी स्थिति में दो दिन तक व्रत न कर पाने में असमर्थ, सूर्योदय के पश्चात कभी भी व्रत तोड़ सकते हैं।

कुंज बिहारी की आरती

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।

श्रवण में कुंडल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।

लतन में ठाढ़े बनमाली

भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक

ललित छवि श्यामा प्यारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

॥ आरती कुंजबिहारी की...॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।

गगन सों सुमन रासि बरसै।

बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग

अतुल रति गोप कुमारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

॥ आरती कुंजबिहारी की...॥

जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा।

स्मरन ते होत मोह भंगा

बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच,

चरन छवि श्रीबनवारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

॥ आरती कुंजबिहारी की...॥

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।

चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू

हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद

टेर सुनो दीन दुखारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

॥ आरती कुंजबिहारी की...॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

श्रीगोपाल सहस्रनाम स्तोत्र

-गतांक से आगे...

तत्त्वत्रयात्मकोह्यव्यक्तट्ठ कुंडलीसमुपाश्रितः।

ब्रह्मण्यः सर्वधर्मज्ञः शांतो दांतो गतक्लमः।। 131।।

श्रीनिवासः सदानंदी विश्वमूर्तिर्महाप्रभुः।

सहस्त्रशीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपातः।। 132।।

समस्तभुवनाधारः समस्तप्राणरक्षकः।

समस्तसर्वभावज्ञो गोपिकाप्राणरक्षकः।। 133।।

नित्योत्सवो नित्यसौ यो नित्यश्रीर्नित्यमंगलः।

व्यूहार्चितो जगन्नाथः श्रीवैकुंठपुराधिपः।। 134।।

पूर्णानंदघनीभूतो गोपवेषधरो हरिः।

कलापकुसुमश्यामः कोमलः शांतविग्रहः।। 135।।

गोपाड़्गनावृतोह्यनंतो वृंदावनसमाश्रयः।

वेणुवादरतः श्रेष्ठो देवानां हितकारकः।। 136।।

बालक्रीड़ासमासक्तो नवनीतस्यं तस्करः।

गोपालकामिनीजारश्चोरजारशिखामणिः।। 137।।

परंज्योतिः पराकाशः परावासः परिस्फुटः।

अष्टादशाक्षरो मंत्रो व्यापको लोकपावनः।। 138।।

सप्तकोटिमहामंत्रशेखरो देवशेखरः।

विज्ञानज्ञानसंधानस्तेजोराशिर्जगत्पतिः।। 139।।

भक्तलोकप्रसन्नात्मा भक्तमंदारविग्रहः।

भक्तदारिद्रयदमनो भक्तानां प्रीतिदायकः।। 140।।