Monday, October 21, 2019 08:35 AM

तीन तलाक का आश्चर्यजनक अंत

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

अगर कोई इतिहास में देखता है तो आश्चर्य होता है कि शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रद्द करने के लिए राजीव द्वारा कानून क्यों लाया गया। एक बहादुर कांग्रेस मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने जब विरोध में इस्तीफा दे दिया, फिर भी राजीव गांधी ने तीन तलाक को बनाए रखा और एक विधेयक पारित किया। तब से लेकर महिलाएं इस अन्यायपूर्ण और अमानवीय व्यवस्थाके खिलाफ लड़ रही हैं। हिंदू विवाह कानून में सुधार हुए हैं, लेकिन कभी किसी ने भी मुस्लिम पर्सनल लॉ को छूने की हिम्मत नहीं की। एक साहसी महिला नेता जाकिया सोमन इसके लिए लड़ रही हैं। वह इस मुहिम की सूत्रधार हैं और अंत में उन्होंने जीत भी हासिल कर ली है...

यह धरती को हिला देने वाले घटनाक्रम का अंत है, जो मुस्लिम महिला अधिकार सुरक्षा बिल पर राज्यसभा में वोटिंग का साक्षी बना। विपक्ष के 25 सदस्य गायब रहे। अधिकतर विपक्षी पार्टियां यहां तक कि कश्मीर के पुनर्नवीनीकरण का समर्थन कर रही हैं। क्यों उन्होंने स्वयं को अनुपस्थित किया, जबकि वे जानते थे कि मुस्लिम विवाह विधान को बदलने का ऐतिहासिक क्षण है और इसके लिए वोट किया जाना है। इससे पहले भी इस विधान को संसद में दो बार हराया जा चुका है। पूरा विपक्ष एबीपी प्रायोजित प्रस्ताव पर विरोधी एकता की डींगे हांक रहा था। यह एक कल्पना में परिवर्तित हुआ और इसके खिलाफ केवल 84 वोट पड़े। उनमें से अधिकतर भाजपा की चतुरतापूर्ण तिकड़म के आगे बह गए। इस बिल के पक्ष में 99 वोट आए और इसके खिलाफ सिर्फ 84 वोट आए, जबकि दूसरे गायब रहे, जैसे कांग्रेस के पांच एमपी अनुपस्थित रहे। यह अंकशास्त्र पेचीदगी पैदा कर रहा था, जैसे कि भाजपा बिल के लिए जनमत तैयार करने में जुट चुकी थी। भाजपा यह जानती थी कि अगर पूरा विपक्ष इसके खिलाफ रहता है, तो उसके पास इस बिल को पास करवाने की क्षमता नहीं होगी। शायद इस आत्मविश्वास और पिछले इतिहास ने राज्यसभा के अधिकतर सदस्यों को अनुपस्थित होने को आश्वस्त किया। इसी बीच में भाजपा ने बिल की कड़ी पैरवी में रातभर काम किया। यदि हम इस खेल को देखते हैं तो पाते हैं कि जिन दलों ने एनडीए की मदद की, उनमें एआईडीएमके अनुपस्थित रही, जबकि बीजेडी और कुछ अन्य पार्टियों ने इस बिल का समर्थन किया। अल्पमत के साथ बिल कैसे पास हो सकता है, लेकिन अन्य लोग समर्थन को आगे आए। यह तब तक एक पहेली थी, जब तक कांग्रेस के कपिल सिब्बल ने कबूल नहीं किया था कि यह एक धोखा था, लेकिन अब ये सिर्फ शब्द थे, जैसे ही बिल एक अधिनियम बन गया है।

इसे देखने के लिए पूरी रणनीति के चार महत्त्वपूर्ण भाग हैं- पहला, यह हर कोई देख सकता है कि वे पूरी तरह से यह जानते हुए भी पास हो गए कि उनका राज्यसभा में बहुमत नहीं है। यह इस संभावना के खिलाफ प्रभाव था कि वे इसमें हार भी सकते हैं, लेकिन तब भी जब यह बिल लोकसभा में पारित किया गया था, वे इसके समर्थक थे। उसी समय दूसरों को टारगेट करने के लिए कि वे इस बिल के खिलाफ और तीन तलाक के लिए है। दूसरा, यदि कोई नोटिस करता है, तो विपक्षी एकता में घमंड एक बार फिर दरार का कारण बनता है। यह स्पष्ट था कि कुछ पार्टियां स्टैंड बदल सकती थीं, जैसे कि उन्होंने किया और यदि बिल पास होता है तो उनके पास एनडीए के भागीदारों के रूप में विकसित होने की क्षमता होगी। स्पष्ट रूप से बीजेडी, तेलुगूदेशम और एआईडीएमके भविष्य के सहयोगी के रूप में उभरे हैं। बिल ने विपक्षी पार्टियों में कुछ छिद्र करके इसे विभक्त भी कर दिया है, जैसा कि कुछ लोगों ने वोटिंग ही नहीं की, हालांकि पार्टी ने बिल के खिलाफ मतदान किया। तीसरा, बिल लैंगिक समानता के लिए एक समाधान और पीडि़त महिलाओं के लिए मानवीय साहसिक कार्य हो सकता है। इसमें कोई शक नहीं है कि मोदी ने मुस्लिम महिलाओं के उत्पीड़न के खिलाफ खड़े होकर एक चैंपियन की तरह खेल को जीता है, हालांकि उन्हें कुछ मुस्लिमों द्वारा निशाना बनाया जा रहा है, लेकिन स्पष्ट है कि वे इस समुदाय की मदद कर रहे हैं। इस बिल ने भाजपा के लिए एक बड़े कदम के रूप में कार्य किया है, क्योंकि इसकी वजह से पार्टी पर से मुस्लिम विरोधी होने का कलंक मिट गया है। इसने अगले आम चुनाव में मतदान के लिए आधार को भी मजबूत बनाया है। भाजपा की और बहुत बड़ी उपलब्धि मोदी-शाह की जोड़ी है, जिसने कांग्रेस को पछाड़ते हुए अपनी पार्टी की प्रधानता स्थापना की है। कांग्रेस ने अपनी हेकड़ी के कारण कभी यह सोचा भी नहीं था कि उन्हें मुस्लिम हितैषी और मोदी के मुस्लिम विरोधी नेता होने के अपने ही दावे में हार देखनी पड़ सकती है। यह विधेयक कांग्रेस को सॉफ्ट स्पॉट पर हिट करते हुए इस विचार का चुनौती दे रहा प्रतीत होता है, जिसके आधार पर कांग्रेस इसमें व्यस्त थी कि धर्मनिरपेक्षता के दावे के आधार पर वह मुस्लिमों का विश्वास प्राप्त कर सकती है।  अब जाहिर है कि मुस्लिम वोट पर केवल कांग्रेस का एकाधिकार नहीं रहा है। अगर कोई इतिहास में देखता है तो आश्चर्य होता है कि शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रद्द करने के लिए राजीव द्वारा कानून क्यों लाया गया।

एक बहादुर कांग्रेस मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने जब विरोध में इस्तीफा दे दिया, फिर भी राजीव गांधी ने तीन तलाक को बनाए रखा और एक विधेयक पारित किया। तब से लेकर महिलाएं इस अन्यायपूर्ण और अमानवीय व्यवस्था के खिलाफ लड़ रही हैं। हिंदू विवाह कानून में सुधार हुए हैं, लेकिन कभी किसी ने भी मुस्लिम पर्सनल लॉ को छूने की हिम्मत नहीं की। एक साहसी महिला नेता जाकिया सोमन इसके लिए लड़ रही हैं। वह इस मुहिम की सूत्रधार हैं और अंत में उन्होंने जीत भी हासिल कर ली है। कोर्ट में भी यह मामला चला और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने कहा ‘जब तक सरकार तीन तलाक के बारे में कानून तैयार नहीं करती है, तब तक पत्नियों पर तीन तलाक का उच्चारण करने वाले पतियों के खिलाफ निषेधाज्ञा दी जाएगी’। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस निषेधाज्ञा के बावजूद तीन तलाक की प्रथा जारी रही और इसीलिए सरकार को इसे रोकने के लिए कानून लाना पड़ा। अब एनडीए को इसे उचित प्रावधानों के साथ कानून बनाकर लाना पड़ा है। मुल्ला, जो तीन तलाक को लगातार समर्थन देते रहे और विपक्ष, जो अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की नीति पर चलता है, वे यह नहीं देखते कि समय और चीजों में बदलाव आ रहा है। वे सिर्फ वोटबैंक के लिए ही चिंतित थे।

मोदी ने अब दिखा दिया है कि वह मूल्यों की परवाह करते हैं और समय के अनुरूप परिवर्तन के लिए वह कोई भी जोखिम उठाने को तत्पर रहते हैं। यह मामला स्थिति के निपुण संचालन को प्रदर्शित कर रहा है और विपक्ष में भी राजनीतिक सहयोगियों का कुशलता से प्रबंधन को इंगित कर रहा है। इससे एक संदेश यह भी जा रहा है कि मुसलमान वर्ग अपनी पुरानी और क्रूर प्रथाओं को छोड़कर जीवन जीने और मुख्य धारा में शामिल होने के लिए नए मूल्यों को सीख रहा है। मुस्लिम महिलाएं इस घटनाक्रम को समाज के उदारीकरण के रूप में देख रही हैं और उन्हें अब यह भी उम्मीद बंधी है कि शीघ्र ही बुर्का प्रथा का भी अंत होगा क्योंकि वे भी समाज की अन्य महिलाओं के बराबर ही हैं। 

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