Tuesday, September 29, 2020 03:05 PM

तो उस हिमाचल को चुनो

प्रश्न उठाकर शांता कुमार ने शिक्षा के हवाले से हिमाचल की मात्रात्मक तरक्की के छेद ढूंढे हैं, तो यह स्थिति कमोबेश हर क्षेत्र की रही है। राज्य में इक्कीस विश्वविद्यालय हैं, तो इसी रफ्तार में खुले मेडिकल कालेजों ने भी चिकित्सा क्षेत्र की आधारभूत जरूरतों को तहस-नहस कर दिया। राज्य के छह सरकारी मेडिकल कालेजों के अलावा एक निजी, एक एम्स और एक पीजीआई सेटेलाइट सेंटर जोड़ दिया जाए, तो मालूम हो जाएगा कि हमारी योजनाओं का क्षेत्रफल कितने हाशियों का समूह है। बेशक हद से ज्यादा विश्वविद्यालयों और इंजीनियरिंग कालेजों के खुलने से शिक्षा नजदीक आई, लेकिन ये सभी डिग्रियां बांटने की सामग्री ही मुद्रित करते रह गए। विडंबना यह है कि हिमाचल में राजनीतिक रुतबे के प्रतीक बनकर शिक्षा-चिकित्सा संस्थान ही खंडहर नहीं बने, बल्कि हर विभाग का अनुचित राजनीतिक दोहन हुआ है। एचआरटीसी के कितने डिपो जायज हैं और कितने अनावश्यक। कितने विभाग अनावश्यक हैं और घाटे के बोर्ड-निगम आखिर किस शान की आपूर्ति में नेताओं को सजा रहे हैं। जब शांता वक्तव्य दे रहे हैं, तो ढलियारा का कालेज साइंस की स्नातकोत्तर पढ़ाई शुरू करके जश्न मना रहा है। वर्षों पहले कृषि विश्वविद्यालय का परिसर पालमपुर में खोलकर क्या शांता कुमार कृषि उत्पादक क्षेत्रों को न्याय दे पाए या हमीरपुर में भारतीय होटल प्रबंधन संस्थान का खुलना बाजिव था। आश्चर्य यह कि हिमाचल के तमाम सांस्कृतिक समारोहों में किसी न किसी पंजाबी सिंगर के नाम का लाल कालीन बिछाया जाता है, लेकिन प्रदेश के शिक्षा मंत्री इस प्रयास में हैं कि संस्कृत विश्वविद्यालय खोल कर श्लोकाच्चारण सुनाएं। हिमाचल का भाषाई अनुराग तो स्वयं शांता के दौर में प्रदेश को हिंदी राज्य घोषित कराने में सफल रहा, लेकिन इसका प्रतिकूल असर यहां के सृजन की तौहीन करता रहा। गैर हिंदी राज्यों के फलक पर पंजाब, जम्मू-कश्मीर या अन्य प्रदेशों के लेखक को हिंदी में विशेष सम्मान का हकदार माना जाता है, तो हिमाचल का हिंदी सृजन सीधे-सीधे प्रतियोगी परीक्षा जैसा हो जाता है। क्या बेहतर न होता कि हिंदी राज्य के बजाय हम हिमाचली भाषा का राज्य बनने का संघर्ष चुनते। दरअसल हम अपने राजनीतिक प्रतीकों के युद्ध में ऐसा माहौल बना रहे हैं, जो समाज के आईने तोड़ रहा है। मौजूदा दौर में स्कूलों के वार्षिक समारोहों में मुख्यातिथि क्यों कोई न कोई नेता ही नजर आता है। जब कोई सियासी शख्सियत किसी शिक्षण संस्था के समारोह को सुशोभित करती है, तो बच्चों के आदर्शों में राजनीति का अवतार ही बड़ा आकार लेता है। क्यों नहीं सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी, खिलाड़ी, लोक गायक, प्रतिष्ठित व्यापारी, उद्योगपति, वैज्ञानिक, इंजीनियर तथा तरह-तरह के प्रोफेशन से प्रतिष्ठित लोगों को स्कूली बच्चों के सामने आदर्श के रूप में पेश करने की कोई रिवायत बनी। बेशक हमारी सरकारों ने सामाजिक सुरक्षा के हर आंकड़े को प्रश्रय दिया और यह कहा जा सकता है कि इस दृष्टि से यह राज्य सर्वोच्च स्थान पर है, लेकिन नागरिक समाज के स्वभाव का सरकारीकरण अब केवल एक मांग से हटकर अपनी क्षमता खो रहा है। लिहाजा बड़ी तीव्रता से हिमाचली आर्थिकी का निर्यात हो रहा है। ऊना के खेत अगर लीज पर बिहार-उत्तर प्रदेश के लोगों की मेहनत से सब्जी उगा रहे हैं, या कांगड़ा-हमीरपुर के किसान ने खेती छोड़कर सरकारी रेवडि़यां ढूंढनी शुरू कर दीं, तो समाज के अंधेरे कोनों तक सियासत का राज दिखाई देता है। क्या हम हिमाचल के विकास या हर तरह के आगाज में क्षेत्रवाद से ऊपर दिखाई देते हैं। अचानक हर मंत्री अपने विधानसभा क्षेत्र को ही सत्ता के प्रभाव और अपने विभाग का सर्वश्रेष्ठ किरदार मान लेता है, तो एक ही जिला में सात विश्वविद्यालय तो खुलेंगे ही। क्या शांता कुमार बताएंगे कि एम्स का एक छोर में खुलना औचित्यपूर्ण है या यह राजनीतिक प्रतीक केवल जगत प्रकाश नड्डा के वर्चस्व की निशानी है। क्या चंबा के कलात्मक और ऐतिहासिक पक्ष के हजार सालों को हम धरोहर शहर में रुपांतरित कर पाए या मंडी के सांस्कृतिक महत्त्व में कला केंद्र विकसित कर पाए। यह विडंबना है कि हिमाचली नेताओं में से कोई अर्थशास्त्री इस लायक दिखाई नहीं दिया कि प्रदेश की सरकारों के बीच स्वतंत्र वित्त मंत्री नजर आते। हिमाचल का वर्तमान ढर्रा भले ही उपलब्धियों का जिक्र कर दे, लेकिन यथार्थ पूर्ण निगाह से देखें तो सरकारी इमारतों में कचरा भरा है। सब कुछ हासिल करके भी अगर स्कूल, कालेज या विश्वविद्यालय गमगीन हैं या अस्पताल से मेडिकल कालेज के प्रबंध में मरीज लाचार हैं, तो उस हिमाचल को चुनो जो खुद पर गर्व कर सके।