Thursday, August 06, 2020 07:28 PM

त्याग और बलिदान

श्रीश्री रवि शंकर

दूसरे शब्दों में जो चीज तुम्हें आनंद और खुशी देती है, तुम उस वस्तु का बलिदान नहीं कर सकते जो तुम्हें न पसंद या अस्वीकार है। बलिदान हमेशा किसी श्रेष्ठतर कारण के लिए या किसी बड़ी अच्छाई के लिए किया जाता है। साथ ही उस समय उस बड़ी अच्छाई के लिए तुम्हारा प्रेम इतना अधिक बलवान होता है कि अन्य किसी चीज का कोई महत्त्व नहीं होता...

संसार के सभी ग्रंथों में बलिदान की महिमा का गुणगान है। बलिदान है क्या? बलिदान उस वस्तु का समर्पण है जिसे तुम महत्त्व देते हो। तुम केवल उसी वस्तु का बलिदान कर सकते हो जिसे तुम स्वयं के लिए रखना पसंद करते हो। दूसरे शब्दों में जो चीज तुम्हें आनंद और खुशी देती है। तुम उस वस्तु का बलिदान नहीं कर सकते जो तुम्हें न पसंद या अस्वीकार है। बलिदान हमेशा किसी श्रेष्ठतर कारण के लिए या किसी बड़ी अच्छाई के लिए किया जाता है। साथ ही उस समय उस बड़ी अच्छाई के लिए तुम्हारा प्रेम इतना अधिक बलवान होता है कि अन्य किसी चीज का कोई महत्त्व नहीं होता। तब यहां बलिदान अप्रासंगिक हो जाता है क्योंकि केवल प्रेम ही तुम्हारी सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति है। जब इतना अधिक प्रेम होता है तब बलिदान नहीं होता और जब प्रेम नहीं होता तब बलिदान भी नहीं हो पाता। उदाहरण स्वरूप यदि एक मां सिनेमा देखने की योजना बनाती है, लेकिन तभी उसे पता चलता है कि उसका बच्चा बीमार है तब वह यह नहीं कहती कि बच्चे की देखभाल के लिए सिनेमा का बलिदान कर दिया जाए। क्योंकि वह जाना ही नहीं चाहती। मां के लिए बच्चे के साथ रहने से बड़ी और कोई खुशी नहीं है। जहां प्रेम होता है वहां बलिदान नहीं होता है। बलिदान यह प्रदर्शित करता है कि जिस कारण के लिए तुम बलिदान कर रहे हो उसकी अपेक्षा तुम्हारी खुशी का अधिक महत्त्व है। जब प्रेम कम होता है तभी बलिदान का अर्थ होता है। फिर भी बलिदान से मनुष्य का मन शुद्ध होता है और यह स्थायी प्रवृत्तियों को रोकता है। परंतु साथ ही इससे अभिमान, दंभ, आत्मकरुणा और कभी-कभी नीरसता भी उत्पन्न हो सकती है। तुम केवल उसे बलिदान कर सकते हो जो तुम्हारे लिए महत्त्वपूर्ण  हो। एक बुद्धिमान व्यक्ति के लिए सत्य मूल्यों और ईश्वर के अलावा कुछ भी महत्त्वपूर्ण नहीं है और इनका वह कभी भी बलिदान नहीं करता। ईश्वर सर्वश्रेष्ठ है और जो सर्वश्रेष्ठ के महत्त्व को समझता है, तो वह ईश्वर का बलिदान कैसे कर सकता है। यही बलिदान का विरोधाभास है। बलिदान अगर सही मायनों में अच्छे और शुद्ध मन के द्वारा किया जाए, तो उसका अपना ही महत्त्व होता है। ईश्वर ही सत्य है और जो इस को मान कर अपना कार्य करते हैं, वह अपनी मंजिल को प्राप्त कर लेते हैं। त्याग और बलिदान ही ऐसे गुण हैं जिनके आधार पर ही किसी व्यक्ति को स्थायी मान्यता प्राप्त हो सकती है।