Friday, August 23, 2019 05:42 AM

त्रिलोचन महादेव मंदिर

भगवान शिव की महिमा भी बड़ी न्यारी है। विभिन्न रूपों में शिव जी अपने भक्तों का बड़े ही भोले अंदाज में मन मोह लेते हैं। भांग, धतूरा और श्मशान की राख और गले में सर्प की माला उन्हें औघड़ स्वरूप देती है। यही कारण है कि शिवलिंग के रूप में भगवान शिव सहज भाव से ही अपने भक्तों को उपलब्ध हो जाते हैं। काशी में अनेकों शिवलिंग हैं। स्वयंभू शिवलिंगों में त्रिलोचन महादेव का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। त्रिलोचन महादेव का मंदिर वाराणसी-जौनपुर सीमा पर स्थित है। स्कंद पुराण के अनुसार देवादिदेव शिव जब योगयुक्त होकर बैठे हुए थे, तभी त्रिलोचन महादेव सात पातालों को छेद कर उत्पन्न हुए। स्कंद पुराण के अनुसार भगवान शिव पार्वती जी से कहते हैं कि सब तीर्थों में आनंद कानन और शिवलिंगों में त्रिलोचन महादेव श्रेष्ठ हैं। इस मंदिर की खासियत यह है कि त्रिलोचन महादेव के शिवलिंग पर भगवान शिव की आकृति उभरी हुई है, वह भी एक नहीं बल्कि दो। प्रायः श्रद्धालु इन आकृतियों को देख नहीं पाते। क्योंकि बड़े से अर्घे के भीतर स्थित शिवलिंग पर फूल माला चढ़ी रहती है। आकृति को देखने के लिए अर्घे के भीतर कपूर जलाना पड़ता है। यह शिवलिंग सीधा न होकर उत्तर दिशा की ओर झुका हुआ है। उत्तर दिशा की ओर शिवलिंग झुकने के पीछे एक किंवदंती है कि जब यह शिवलिंग प्रकट हुआ, तो दो गांव रेहटी व लहंगपुर में विवाद उत्पन्न हो गया कि यह शिवलिंग किसके गांव में हैं। शिवलिंग को लेकर सीमा विवाद बढ़ता जा रहा था। दोनों गांवों के लोग आमने-सामने थे। इसी बीच एक रात्रि यह शिवलिंग उत्तर दिशा रेहटी गांव की ओर झुक गया। इस तरह सीमा विवाद समाप्त हुआ और दोनों गांवों ने यह मान लिया कि यह शिवलिंग रेहटी गांव में उत्पन्न हुआ है।  त्रिलोचन महादेव मंदिर के ठीक सामने औषधि गुणों से युक्त तालाब भी है। मान्यता है कि इस तालाब का जल स्रोत गोमती और सई नदी के संगम से मिला हुआ है, जिससे इस तालाब का पानी कभी सूखता नहीं है। इसमें स्नान करने से कुष्ठ एवं मिर्गी रोग में लाभ मिलता है। भगवान शिव का सबसे प्रिय महीना श्रावण में यहां अलग ही छटा रहती है। मंदिर परिसर और उसके आसपास का नजारा प्राकृतिक रूप से हरियाली युक्त हो जाता है। पूरे माह मेले जैसा माहौल रहता है। दूर-दूर से श्रद्धालु त्रिलोचन महादेव का दर्शन, पूजन करने आते हैं। सुबह से ही मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं की लंबी कतारे लग जाती हैं। वहीं कांवरियों का जत्था भी इस मंदिर में शिवलिंग पर जल अर्पित करता है।