Wednesday, September 18, 2019 09:17 AM

थीरम या ऑरियोफंजिन से दूर भागेगा सेब रोग

पहले आपने सेब में होने वाली बीमारियों के बारे में पढ़ा अब पढि़ए सेब की रोगथाम के बारे में...

मृदा जनित बीमारियों का प्रबंधन

मृदाजनित बीमारियों के प्रबंधन का मुख्य बिंदु इसी बात पर निर्भर करता है कि बीमारी के कारकों को कैसे एक्टिव स्टेट से दूर रखा जाए या कम से कम किया जाए। मृदा जनित बीमारियों के प्रबंधन में रोग प्रबंधन के सभी सिद्धांत प्रयोग में लाए जाने चाहिएं, जिन्हें हम निम्न प्रकार से समझ सकते हैं।

साफ-सफाई :  मिट्टी द्वारा फैलने वाले रोगों में साफ- सफाई का महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि मिट्टी में प्राथमिक इनोकुलम यदि, इकोनॉमिक थ्रेशोल्ड से बढ़ जाए तो बीमारी आने की संभावना बढ़ जाती है। बीमारी वाले मृत पौधों या हिस्सों को खेत से निकाल कर नष्ट कर देना चाहिए, जिससे प्राथमिक इनोकुलम कम हो सके। जब पेड़ सुसुप्त अवस्था (नवंबर-दिसंबर) में हो तो प्रभावित जड़ों की मिट्टी हटाकर, रोगग्रस्त जड़ों को काटकर निकाल दें और कटे स्थान पर चौबाटिया पेस्ट एक-एक भाग कॉपर कार्बोनेट और लाल सिंदूर व सवा भाग अलसी के तेल का लेप लगाएं।

बीमारी पनपने वाले वातावरण का प्रबंधनः मृदा जनित बीमारियों के पनपने के लिए पेड़ के तने के पास अथवा नर्सरी में खुला पानी या अत्यधिक नमी एक तरह का वांछित वातावरण होता है। तौलिए में अधिक देर तक पानी न ठहरे, इसके लिए तौलिए में बजरी या रेत का ढेर लगाएं या तौलिए के बाहर नालियां खोदकर पानी की निकासी की व्यवस्था सुधारें।

यदि पीएच मान 6.2 से कम हो, तो चूने के उपयोग द्वारा पीएच मान सुधारें।

नर्सरी लगाने से पहले खेत की सिंचाई कर 40.45 दिन के लिए 100.150 गेज की प्लास्टिक शीट द्वारा ढक कर सौर ऊर्जा द्वारा उपचारित करें।

मिट्टी में नीम खली, देवदार, बनाह व लहसुन इत्यादि की पत्तियों को मिलाने से भी मृदा जनित बीमारियों को नियंत्रित किया जा सकता है।

जैविक नियंत्रकों का उपयोगः मृदा जनित बीमारियों के प्रबंधन हेतु प्रारंभिक अनुसंधानों में जैविक नियंत्रक काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनमें ट्राइकोडरमा विरिडी, ट्राइकोडरमा हारजियानम, एंटेरोबैक्टर एरोजीव, स्यूडोमोनास फ्लोरिसेस इत्यादि जैविक नियंत्रक विभिन्न तरीकों से इन बीमारियों के नियंत्रण में सहायता प्रदान करते हैं। इन जैविक नियंत्रकों की वजह से रोगाणु अपना विस्तार नहीं कर पाते और रोग एक सीमा से नीचे रहते हैं।

कृषि रसायनों का प्रयोगः किसी भी बीमारी के एक सीमा से अधिक फैलने पर उन्हें कृषि रसायनों द्वारा ही नियंत्रित किया जा सकता है।

कॉलर रूट क्राउन रॉटः  पेड़ के तने के चारों ओर 30 सेमीटर के दायरे में मैनकोजेब 600 से 800 ग्रा, 200 ली पानी या कॉपर आक्सीक्लोराइड 1000 ग्रा. 200 ली पानी या मैटालैक्सिल  मैनकोजेब 600 ग्रा. 200 ली पानी या बोर्डो मिक्सचर 2 किग्रा नीलाथोथा, 2 किग्रा बुझा हुआ चूना 200 ली पानी  के10 लीटर घोल से सिंचाई करें। यह प्रक्रिया साल में दो बार मार्च व मानसून में अपनाएं।

श्वेत जड़ विगलन : बीमारी से ग्रसित पौधों को बरसात के दिनों में तीन बार 15.20 दिनों के अंतराल पर कार्बेन्डाझिम (200 ग्रा 200 लीटर) पानी  या ऑरियोफंजिन 100 ग्रा. कॉपर सल्फेट 100 ग्रा. 200 लीटर पानी के 10.15 लीटर घोल से उपचारित करें।

बीजू झुलसा :  नर्सरी में ग्रसित पौधों को थीरम 600 ग्रा. या ऑरियोफंजिन 80 ग्रा. 200 ली पानी के घोल से सिंचाई करें।

गुच्छेदार जड़ें शिखर पिट्टिकाः पौधे लगाने से पहले एक घंटे तक स्वस्थ कलम किए पौधों को 1 प्रतिशत कॉपर सल्फेट मिश्रण 10 ग्रा. लीटर पानी में डुबोकर रखें। फिर छाया में सुखाकर नर्सरी में लगाएं।

-भूपेश गुप्ता, उषा शर्मा एवं शालिनी वर्मा