Friday, August 23, 2019 07:09 AM

थोड़ा प्रशासनिक निवेश भी

किसी भी सत्ता का करिश्मा उसके द्वारा किया गया प्रशासनिक निवेश तय करता है और इस आधार पर हिमाचल में आयोजित जनमंच काफी कुछ कहते हैं। अब तक जनमंच के जरिए उठे सवालों-शिकायतों का मूल्यांकन करें, तो जवाबदेही और अनुपालन की कमी स्पष्ट होती है। ऐसे में स्थानांतरण अगर सत्ता की सियासत का निवेश है, तो इसे प्रशासनिक निवेश बनाना होगा। यानी किस पद पर कौन अधिकारी सक्षम दिखाई देगा, इसका पूर्वानुमान ही सुशासन की पहली इच्छाशक्ति है। हिमाचल के संदर्भ में देखें तो वर्तमान में जिलाधीशों व पुलिस प्रमुखों की कार्यशैली से स्पष्ट हो जाएगा कि किस जिला में राजनीतिक निवेश और किस में प्रशासनिक निवेश हुआ है। प्रशासनिक रणनीति अगर सशक्त हो तो सत्ता की छवि को कोई बिगाड़ नहीं सकता। दुर्भाग्यवश कुछ अधिकारियों की सियासी रैंकिंग हो जाती है या सत्ता के आलम में उनकी मुखरता ऐसा कर देती है, जबकि सामर्थ्य की कसौटी में तो परख के लिए एक फाइल ही काफी है। प्रशासनिक तौर-तरीकों की सरलता से अगर आम आदमी की हिम्मत बंधती है, तो सरकारों को शीर्षासन करने की जरूरत नहीं, फिर भी कर्मचारी संगठनों की पैंठ में छोटे-छोटे प्रयास भी असंभव हो रहे हैं। ऐसा क्यों है कि जनमंच की गवाही में ही प्रशासनिक निर्देश अपना इजहार करते हैं, जबकि रूटीन में जनकार्यों की प्रगति एक सुनिश्चित दायित्व की पहली पहचान होनी चाहिए। सुशासन की प्रक्रिया को कोई अदना सा अधिकारी भी ऊंचे स्तर पर ले जा सकता है, बशर्ते उसे करने का साहस व सामर्थ्य प्रदान किया जाए। यह स्थानांतरण नीति से जुड़ा एहसास है और वास्तविक कर्मठता के लिए एक जरूरी शर्त भी कि सही करने की इजाजत मिले। विडंबना यह है कि आज की राजनीतिक स्थिति में पुलिस शिकायत भी दबाव और प्रभाव से दर्ज होती है। विभागीय निर्देशों की अस्पष्टता में कार्यसंस्कृति की ताकत अब पिंजरे में बंद है, तो सुशासन के चबूतरे पर कौन स्वतंत्रता से खड़ा होगा। तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जहां कुछ युवा अधिकारी स्वयं अपने लक्ष्य निर्धारित करते हुए चुनौतियों का समाधान करते हैं, लेकिन साहब के बदलते ही पासा बदल जाता है। उदाहरण के लिए मंडी प्रशासन ने कुछ साल पहले सब्जी और फलों के मूल्य निर्धारण की एक परिपाटी विकसित की और जिसके तहत सब्जी मंडी से परचून तक स्पष्टता के साथ दामों का निर्धारण होने लगा था, लेकिन अधिकारी बदलते ही सारा उद्देश्य शून्य हो गया। अभी हाल ही में कांगड़ा में नए जिलाधीश का आगमन जिस स्फूर्ति से मसलों का हल कर रहा है, उसमें काम करने का जज्बा दिखाई देता है। मसलन विवादित मकलोडगंज बस स्टैंड की पार्किंग खुलवाकर एक अधिकारी ने अपनी क्षमता का इस्तेमाल किया। हर अधिकारी और कर्मचारी की क्षमता के सदुपयोग से ही सुशासन की इबारत लिखी जा सकती है। ऐसे में किसी भी पद की गरिमा के हिसाब से अधिकारियों की उपलब्धियां सार्वजनिक की जाएं। हर कार्यालय के बाहर अधिकारी द्वारा लिए गए फैसलों, निपटाए गए मामलों तथा जारी कार्यों का जिक्र किया जाए, ताकि मालूम हो कि व्यक्ति-व्यक्ति में कितना अंतर है। जनता को भी तो मॉनीटरिंग का हक मिले। जिस तरह प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड विभिन्न जानकारियां सार्वजनिक करता है, उसी तरह हर विभाग को अपनी दैनिक, मासिक व वार्षिक रिपोर्ट साझा करनी होगी, ताकि मालूम हो कि दफ्तर और फील्ड में हो क्या रहा। आश्चर्य तो तब होता है, जब कहीं तो एक पुल साल में बन जाता है और कहीं वर्षों लटका रहता है। किसी अस्पताल में तो स्टाफ पूरा रहता है और कहीं टोटा रहता है। इसी तरह जनता के आवेदनों पर प्रगति को इंगित करती सूचनाएं दफ्तर के बाहर चस्पां हों, तो विश्वास बढ़ेगा, वरना रूटीन के तराजू भी जनमंच का वजन ढोएंगे।