Wednesday, April 24, 2019 06:07 AM

दंत चिकित्सा में करियर

देश में दांतों से जुड़ी बीमारियां तेजी से पैर पसार रही हैं। लोगों को अपने दांतों और मसूढ़ों को स्वस्थ रखने के लिए जिस अनुपात में दंत चिकित्सकों की जरूरत है, वे नहीं हैं। आज भी दंत चिकित्सक बड़े शहरों और नगरों में ही मुख्य तौर पर उपलब्ध हैं। ऐसे में डेंटिस्ट बनकर यदि अपना करियर संवारा जाए, तो यह लाभ का सौदा हो सकता है...

सुंदर और स्वस्थ दिखने की प्रतिस्पर्धा में लोग आज सुंदर चेहरे के साथ-साथ चमकदार दांत भी चाहते हैं। मेडिकल क्षेत्र में रुचि लेने वाले युवाओं के लिए आज यह बेहतर करियर विकल्प है। देश में  दांतों से जुड़ी बीमारियां तेजी से पैर पसार रही हैं। लोगों को अपने दांतों और मसूढ़ों को स्वस्थ रखने के लिए जिस अनुपात में दंत चिकित्सकों की जरूरत है, वे नहीं हैं। आज भी दंत चिकित्सक बड़े शहरों और नगरों में ही मुख्य तौर पर उपलब्ध हैं। ऐसे में डेंटिस्ट बनकर यदि अपना करियर संवारा जाए, तो यह लाभ का सौदा हो सकता है।

सेना में दंत चिकित्सा

आर्मी डेंटल कोर आर्मी मेडिकल कोर की सहयोगी शाखा है। मेडिकल कोर के प्रमुख को कर्नल का रैंक मिला होता है और वह दंत सेवाओं का उपनिदेशक भी कहलाता है। नेवी और वायु सेना में पृथक दंत चिकित्सा विभाग होते हैं। दंत चिकित्सा की विविध शाखाओं के लिए पांच विशेषज्ञ होते हैं। दंत यांत्रिक और दंत रक्षकों के प्रशिक्षण के लिए आर्म्ड फोर्सेस मेडिकल कालेज, पूना में पढ़ाई होती है। इसमें भर्ती पहले शार्ट सर्विस कमीशन के तौर पर होती है। इनमें कुछ चुने हुए अभ्यार्थियों को स्थायी कमीशन दिया जाता है।

शैक्षणिक योग्यता

डेंटिस्ट बनने के लिए फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी विषय के साथ कम से कम 50 फीसदी अंकों के साथ बारहवीं पास होना चाहिए। उसके बाद एंट्रेंस टेस्ट के आधार पर इसमें प्रवेश किया जा सकता है। इस क्षेत्र में भी अलग-अलग कोर्स कर के विशेषज्ञता हासिल की जा सकती है। दंत चिकित्सा में विशेषज्ञता हासिल करने के बाद सरकारी या निजी क्षेत्र में रोजगार के द्वार खुल जाते हैं।

भारत में दंत चिकित्सा

भारत में प्रथम दंत चिकित्सालय सन् 1920 में कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) में खोला गया। सन् 1926 में दूसरा दंत चिकित्सालय कराची (अब पाकिस्तान में ) खुला। नैयर दंत चिकित्सा विद्यालय वर्ष 1933 ई. में खुला। 1936 में लाहौर के डे मौंटमोरेसी कालेज ऑफ डेंटिस्ट्री में बीडीएस उपाधि के लिए नियमित शिक्षा आरंभ हुई। सन् 1945 में एमडीएस उपाधि के लिए पढ़ाई आरंभ की गई। वर्ष 1949 में उत्तर प्रदेश में एक दंत चिकित्सा विद्यालय लखनऊ में खोला गया। इस विद्यालय को किंग जॉर्ज मेडिकल कालेज से संबद्ध कर दिया गया।

चयन प्रक्रिया

इस क्षेत्र में प्रवेश के लिए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की ओर से आयोजित नीट यानी नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट पास करना होता है। टेस्ट में आब्जेक्टिव टाइप के 180 प्रश्न होते हैं। ये प्रश्न बायोलॉजी, जूलॉजी, फिजिक्स और केमिस्ट्री से होते हैं। इस परीक्षा में सफल होने के बाद ही उम्मीदवार को डेंटल कालेज में चार वर्षीय बीडीएस(बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी) में दाखिले का मौका मिलता है। यह कोर्स और प्रवेश परीक्षा डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया से मान्यता प्राप्त है। राज्य स्तर पर भी परीक्षाओं के माध्यम से बीडीएस में प्रवेश पाया जा सकता है। डिग्री हासिल करने के बाद पांचवें साल में एक साल की इंटर्नशिप होती है। यह कोर्स का अनिवार्य हिस्सा है।

प्रमुख शिक्षण संस्थान

* गवर्नमेंट डेंटल कालेज, शिमला (हिप्र)

* एमएन डीएवी डेंटल कालेज, सोलन

* फैकल्टी ऑफ डेंटिस्ट्री, जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली

* हिमाचल डेंटल कालेज, सुंदरनगर

* भोजिया डेंटल कालेज, बद्दी (हिप्र)

* हिमाचल इंस्टीच्यूट ऑफ  डेंटल कालेज, पांवटा साहिब

*  अहमदाबाद डेंटल कालेज

* अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय

क्या है दंत चिकित्सा

दंत चिकित्सा  स्वास्थ्य सेवा की वह शाखा है, जिसका संबंध मुख के भीतरी भाग और दांत आदि की आकृति, कार्यकरण, रक्षा तथा सुधार और इन अंगों तथा शरीर के अंतःसंबंध से है। इसके अंतर्गत शरीर के रोगों के मुख संबंधी लक्षण, मुख के भीतर के रोग, घाव, विकृतियां, त्रुटियां, रोग अथवा दुर्घटनाओं से क्षतिग्रस्त दांतों की मरम्मत और टूटे दांतों के बदले कृत्रिम दांत लगाना, ये सभी बातें आती हैं। इस प्रकार दंत चिकित्सा का क्षेत्र लगभग उतना ही बड़ा है, जितना नेत्र या त्वचा चिकित्सा का। इसका सामाजिक महत्त्व तथा सेवा करने का अवसर भी अधिक है। दंत चिकित्सक का व्यवसाय स्वतंत्र संगठित है और यह स्वास्थ्य सेवाओं का महत्त्वपूर्ण विभाग है। दंत चिकित्सा की कला और विज्ञान के लिए मुख की संरचना, दांतों की उत्पत्ति, विकास तथा कार्यकरण और इनके भीतर के अन्य अंगों और ऊतकों तथा उनके औषधीय, शल्य तथा यांत्रिक उपचार का समुचित ज्ञान आवश्यक है। तभी आप इस क्षेत्र में सफल हो सकते हैं।

अवसर कहां-कहां

वर्तमान में देश में डेंटल सर्जन की सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में काफी मांग है। आज पूरे देश में निजी अस्पतालों का जाल सा बिछ चुका है। इन में बेहतर पैकेज और सुविधा के साथ दंत चिकित्सकों को नियुक्त किया जाता है। इसी तरह निजी नर्सिंग होम और सरकार की बड़ी डिस्पेंसरियों में भी दंत चिकित्सक नियुक्त किए जा रहे हैं। सरकारी अस्पतालों, मेडिकल कालेजों के अलावा रेलवे और रक्षा क्षेत्रों द्वारा संचालित अस्पतालों में डेंटिस्ट की नियुक्तियां होती हैं। टूथ पेस्ट बनाने और मसूढ़ों की देखभाल करने वाली कंपनियां अपने यहां ऐसे लोगों को बतौर विशेषज्ञ नियुक्त कर रही हैं। इसके अलावा स्वरोजगार के तौर पर निजी क्लीनिक भी खोल सकते हैं। दंत चिकित्सा में उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद अध्यापन कार्य से भी जुड़ सकते हैं। दंत चिकित्सा को लेकर रिसर्च भी कर सकते हैं।

वेतनमान

दांतों के डाक्टर का शुरुआती वेतनमान सरकारी अस्पताल में 50 हजार रुपए से ज्यादा है। जैसे-जैसे अनुभव में इजाफा होता जाता है, वेतन में बढ़ोतरी होती जाती है। सीनियर डाक्टर के रूप में वेतनमान डेढ़ लाख से ऊपर है। इसके अलावा निजी क्षेत्र में कमाई क्लीनिक चलने पर निर्भर करती है। यह लाख रुपए से दस लाख रुपए भी हो सकती है। इसमें खासी मेहनत और पहचान की जरूरत होती है।

स्पेशलाइजेशन

बीडीएस कोर्स करने के बाद स्पेशलाइजेशन और गहन चिकित्सा का ज्ञान हासिल करने के लिए एमडीएस में भी प्रवेश जरूरी है। मास्टर ऑफ डेंटल सर्जरी में भी दाखिला प्रवेश परीक्षा के जरिए ही मिलता है। एमडीएस में स्पेशलाइजेशन विभिन्न तरह की हैं। इन में इंडोडांटिक्स, ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल पैथोलॉजी, ओरल सर्जरी, आर्थोडांटिक्स,, पेडोडांटिक्स, पेरियोडांटिक्स एवं प्रोस्थोडांटिक्स जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इनमें से किसी एक क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करनी होती है। दंत चिकित्सा में स्पेशलाइजेशन हासिल करने के लिए इससे जुड़े प्रैक्टिस प्रोग्राम और देश-दुनिया में हो रहे नए प्रयोग, अनुसंधान और इलाजों की भी जानकारी रखनी होती है।