Monday, June 01, 2020 02:26 AM

दरवाजे बंद, खिड़कियां खोलें

चेतावनियां भले ही हिमाचल के करीब आ रही हैं, लेकिन प्रदेश ने कोरोना जांच की परिधि को विस्तृत और सक्षम बनाने की एक परिपाटी विकसित कर ली है। बढ़ते आंकड़ों में हम दोष निकाल सकते हैं या वापसी की अनुमति पर वितंडा खड़ा कर सकते हैं, लेकिन कोरोना संकट सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था के सामने अर्थ ढूंढ रहा है। भले ही दिल्ली, मुंबई, गोवा या पुणे से लौटते हिमाचलियों के साथ कोविड-19 की सूचनाएं बढ़ती हैं या अब मामले बाहर से आने वालों की केस हिस्ट्री बनाते हैं, फिर भी यह दौर लॉकडाउन से बाहर आने की जद्दोजहद व इस स्वीकारोक्ति का है कि महामारी हमें और समय के लिए बंद नहीं कर सकती है। यह समय और सरकार की हर इकाई पर निर्भर करेगा कि कोरोना के सामने किस तरह की जिंदगी अख्तियार की जाए। यह संभव नहीं कि लॉकडाउन के करीब दो महीने बाद भी कैद भरी जिंदगी में बचाव ढूंढा जाए, बल्कि यह पद्धति को नए सिरे मजबूत करने का इम्तिहान है। अब उस व्यवस्था पर भरोसा करें जहां हिमाचल ने बीस हजार से ऊपर कोरोना टेस्ट कर लिए या हर दिन करीब बारह सौ टेस्ट हो रहे हैं तो एक तरह से स्थिति स्पष्ट होगी और ट्रेंड भी समझ आएगा कि कहां दरवाजे बंद करने हैं और कहां खिड़कियां खोलनी हैं। हिमाचली समाज के भीतर कहीं-कहीं ऐसी भावना भी पनप रही है कि बाहर से आने वालों को इतनी तादाद में अनुमति नहीं मिलनी चाहिए, लेकिन ऐसा सोच कर हम प्रदेश का कद छोटा कर रहे हैं या शुतुरमुर्ग बन कर असहाय समाज बनाने की निशानियां पैदा करेंगे। ताजा मामले सीधे क्वारंटीन केंद्रों से आ रहे हैं और अब यह व्यवस्था कायम है कि घर पहुंचने से पहले बाहर से आए हर व्यक्ति की पूरी जांच हो। प्रदेश भर में अब तक लगभग साठ हजार लोग होम क्वारंटीन की अवधि पूरी करके स्वस्थ साबित हुए हैं, तो यह भी एक सुखद पहलू है। दूसरी ओर बाजार पर फिर से ग्राहक का भरोसा तथा आर्थिकी के विराम तोड़ने की आवश्यकता बढ़ रही है। हिमाचल में सरकार अपने तंत्र को पुनः स्थापित करने की स्थिति को संवारना चाहती है, तो कर्त्तव्यों की नई व्याख्या में बजट का सामर्थ्य फिर से पुख्ता करना है। इसीलिए सरकार की आवश्यक फाइलें आगे सरकने लगीं, तो सार्वजनिक निर्माण को फिर से हाथ मिलने लगे। हर कोई अपनी व्यस्तता को कोरोना संकट से आजाद करने की मंशा रखता है, लिहाजा कोरोना संबंधी आंकड़ों को बेजुबान मानने की एक नई परिस्थिति शीघ्र उभरेगी। भले ही 31 मई तक संजीदगी से विश्लेषण होंगे, लेकिन अब छूट का अभिप्राय जिंदगी की भागदौड़ में कोरोना को परास्त करने का एक नजरिया होगा। हिमाचल को अपनी दुरुस्ती करनी है और समाज को भी आगामी दौर की तैयारी करनी है। हो सकता है कि कुछ दिन या बीमारी के शिखर आने की खबर तक कई और मामले पॉजिटिव नजर आएं, लेकिन अब पद्धति से इंतजाम तक एक ऐसी व्यवस्था काम करने लगी है जिसे कबूल करके ही हर व्यक्ति को जिंदगी में लौटने का अवसर मिलेगा। यह दीगर है कि हिमाचल लौटे लोग केवल प्रदेश की पनाह हासिल नहीं कर रहे, बल्कि रोजगार खोकर फिर से अस्तित्व बनाने की गुहार भी कर रहे हैं। कोरोना काल के बीच बहुत सारी आवाजें आ रही हैं, लेकिन सुनने का साहस और जवाब देने का मकसद चाहिए। कल जिंदगी को पटरी पर लाने की कीमत अदा करनी पड़ सकती है। कुछ आवश्यक सेवाओं की दरों में बढ़ोतरी या राज्य के शुल्कों में नए आगाज को स्वीकार करने का मतलब भी तो भविष्य का बुनियादी उसूल हो सकता है। कोरोना बेशक दरवाजे के बाहर रहे, लेकिन खिड़कियां अब खोलनी ही पड़ेंगी।