Thursday, July 09, 2020 05:17 PM

दलबदल विरोधी कानून के परिणाम

पीके खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

दलबदल विरोधी कानून का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि बिल पर बहस का कोई सार्थक अवसर न होने के कारण अकसर ऐसे कानून बन जाते हैं जो व्यावहारिक नहीं होते, जनहितकारी नहीं होते और सिर्फ  शासक दल के स्वार्थों की पूर्ति करते हैं। मोदी सरकार का चुनावी बांड से संबंधित कानून भी निश्चय ही इस तरह के कानून की श्रेणी में आता है जो शासक दल और उनके पिछलग्गू पूंजीपतियों की सांठगांठ से भ्रष्टाचार और काला धन बढ़ाने में सहायक होगा। दलबदल विरोधी कानून में ही सारे संशोधनों के बावजूद दलबदल नहीं रुका है। हां, इसका सीधा-सा परिणाम यह अवश्य हुआ है कि अब देश में ज्यादातर कानून जनहितकारी होने के बजाय जनविरोधी होने लग गए हैं...

इसी सप्ताह मंगलवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेंटर की ओर से एक वेबिनार का आयोजन किया गया जिसका विषय था भारतवर्ष में दलबदल विरोधी कानून का विश्लेषण। इस वेबिनार में मुख्य वक्ता भारतवर्ष के अतिरिक्त महाधिवक्ता सत्यपाल जैन थे। चूंकि यह वेबिनार मूलतः अकादमिक प्रकृति का था और लॉ सेंटर के विद्यार्थियों के ज्ञानवर्द्धन के लिए था, इसलिए इस मंच पर खुल कर बोलने में कोई परेशानी नहीं थी और यह सच है कि सत्यपाल जैन जो बोले, खुलकर बोले और उन्होंने इस कानून की बहुत सी खामियों की ओर ध्यान दिलाया। अपने देश में सन् 1967 में पहली बार गया लाल नाम के एक विधायक ने धन और पद के लालच में एक ही दिन में कई बार दलबदल किया। इसके बाद से देश में ‘आया राम, गया राम’ के इतने उदाहरण देखने को मिले हैं कि उनकी गिनती कर पाना संभव नहीं है।

सन् 1980 में जनता पार्टी की सरकार के पतन के बाद इंदिरा गांधी फिर से प्रधानमंत्री बनीं तो हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने अपने 40 साथी विधायकों के साथ थोक में दलबदल किया और रातों-रात जनता पार्टी की सरकार, कांग्रेस की सरकार हो गई। सन् 1982 में यही किस्सा एक बार फिर एक नए रूप में दोहराया गया। देश में सरकारें बनाने को लेकर सियासी जोड़-तोड़ के किस्सों से तो इतिहास भरा पड़ा है, लेकिन सरकार बनाने को लेकर देश में एक ऐसा वाकया भी हो चुका है जब देश के लोकतंत्र को शर्मसार होना पड़ा। हरियाणा में सन् 1982 के विधानसभा चुनावों में किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला था। नब्बे सीटों वाली विधानसभा में तब कांग्रेस को 35, लोकदल को 31 और भाजपा को छह सीटें हासिल हुईं। लोकदल को भाजपा का समर्थन मिला और कांग्रेस और लोकदल दोनों ने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। लेकिन हरियाणा के तत्कालीन राज्यपाल गणपत राव जी तपासे ने भजन लाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। यह जानकारी होते ही लोकदल के नेता देवी लाल अपने भाजपाई सहयोगी डा. मंगल सेन और अपने समर्थक सभी विधायकों सहित राजभवन पहुंचे और भजन लाल की सरकार को तुरंत बर्खास्त करने और उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने का आग्रह किया, लेकिन राज्यपाल ने उनकी एक न सुनी। परिणाम यह हुआ कि देवी लाल और राज्यपाल तपासे के बीच तीखी बहस छिड़ गई। इस बीच देवी लाल ने राज्यपाल तपासे की ठुड्डी पकड़ कर उन्हें कुछ कहा तो राज्यपाल ने उनका हाथ झटक दिया। इस पर गुस्से से भरे देवी लाल ने राज्यपाल को थप्पड़ दे मारा।

इस घटना ने देश की राजनीति में भूचाल-सा ला दिया। इस शर्मनाक घटना का कारण यही है कि सभी राजनेता यह मानते हैं कि यदि एक बार वे सत्ता में आ गए तो विपक्षी दलों के सदस्यों को खरीदना मुश्किल नहीं है और कुछ विशेष अपवादों को छोड़ दें तो अधिकांश मामलों में यह सच भी साबित होता रहा है। 31 अक्तूबर 1984 को इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने और उसी साल दिसंबर में हुए लोकसभा चुनावों में उन्हें अपार बहुमत मिला। दलबदल की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं रोकने के लिए उन्होंने सन् 1985 में संविधान के 52वें संशोधन के माध्यम से दलबदल विरोधी कानून पास करवाया, लेकिन चूंकि वे न केवल देश के प्रधानमंत्री थे बल्कि अपने दल के अध्यक्ष भी थे, अतः पार्टी अध्यक्ष के रूप में खुद को और भी मजबूत करने के लिए  दलबदल विरोधी कानून के माध्यम से पार्टी अध्यक्ष को असीम शक्तियां दे दीं जिसके परिणामस्वरूप राजनीतिक दल प्राइवेट कंपनियों की तरह काम करने लगे। सत्यपाल जैन ने दलबदल विरोधी कानून की खामियां गिनाते हुए भी मुख्यतः इस कानून की वकालत ही की, जबकि उनसे अगले वक्ता, कार्यक्रम के मॉडरेटर आकाशदीप ने खुलकर कहा कि दलबदल विरोधी कानून के अस्तित्व में आने के कारण तथा पार्टियों द्वारा ह्विप जारी होने के कारण संसद और विधानसभाओं की बहस बेमानी हो गई है, उसका स्तर गिर गया है। चूंकि मतदान का परिणाम पहले से ही पता होता है, इसलिए मतदान की प्रासंगिकता भी समाप्त हो गई है। दोनों वक्ताओं ने हालांकि इस कानून का विश्लेषण करते हुए पूरी ईमानदारी का परिचय दिया, पर दोनों वक्ता दलबदल विरोधी कानून के एक अत्यंत संवेदनशील परिणाम की ओर ध्यान दिलाने से चूक गए।

चूंकि दलबदल विरोधी कानून और ह्विप के कारण अब हमारे सांसद पिंजरे के तोते की तरह हो गए हैं और कानून बनाने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी खत्म हो गई है, अतः संसद में पेश किए जाने वाले बिल क्या हैं, उनका मसौदा क्या है, उद्देश्य क्या है, यह जानने में भी उनकी रुचि जाती रही है। दरअसल अब उनमें बिल पर बहस करने या मतदान में भाग लेने की इच्छा का ही अभाव घर कर गया है। इसका पहला परिणाम यह है कि ज्यादातर बिल बिना किसी बहस के पास होने लग गए हैं। आंकड़ों की बात करें तो सन् 1990 में चंद्रशेखर की सरकार ने दो घंटे से भी कम समय में 18 बिल पास कर दिए। सन् 1999 में सदन की कुल 20 बैठकें हुईं, लेकिन उनमें 22 बिल पास कर दिए गए। सन् 2001 में 32 घंटों में 33 बिल पास हो गए। सन् 2007 में लोकसभा ने 15 मिनट में तीन बिल पास कर दिए। यही नहीं, अब संसद की बैठकों का समय भी घट गया है। पचास के दशक में जहां साल भर में सदन की बैठकें 130 दिन हुआ करती थीं, सन् 2000 आते-आते इनकी संख्या घट कर 50 के आसपास रह गई। इसके अलावा, काम का समय भी कम हो गया। संसद, सरकार की रबड़ स्टैंप बन कर रह गई। इससे कानूनों के स्तर और गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

सन् 2000 में पास हुए रासायनिक हथियार सम्मेलन अधिनियम पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो जाने के बाद अलग-अलग किस्म की 40 गलतियां पकड़ी गईं। चूंकि कानून बनाने की प्रक्रिया में सांसदों की भूमिका खत्म हो गई है, अतः सत्ता पक्ष इसका लाभ उठाकर मनमाने कानून बना रहा है।

दलबदल विरोधी कानून का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि बिल पर बहस का कोई सार्थक अवसर न होने के कारण अकसर ऐसे कानून बन जाते हैं जो व्यावहारिक नहीं होते, जनहितकारी नहीं होते और सिर्फ  शासक दल के स्वार्थों की पूर्ति करते हैं। मोदी सरकार का चुनावी बांड से संबंधित कानून भी निश्चय ही इस तरह के कानून की श्रेणी में आता है जो शासक दल और उनके पिछलग्गू पूंजीपतियों की सांठगांठ से भ्रष्टाचार और काला धन बढ़ाने में सहायक होगा। दलबदल विरोधी कानून में ही सारे संशोधनों के बावजूद दलबदल नहीं रुका है। हां, इसका सीधा-सा परिणाम यह अवश्य हुआ है कि अब देश में ज्यादातर कानून जनहितकारी होने के बजाय जनविरोधी होने लग गए हैं।

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