Monday, June 01, 2020 01:27 AM

दागी सूची में एक और

एक ऑडियोने हिमाचल के कानों में इतनी खुजली कर दी कि सतर्कता विभाग के चुंगल में स्वास्थ्य विभाग का आला अधिकारी फंस गया। मामले की परतें अभी खुलनी बाकी हैं, लेकिन कोरोना काल के दौरान ऐसे सबूतों से भरी एक ऑडियो ने महकमे को चौराहे पर लाकर खड़ा जरूर किया है। आश्चर्य यह है कि जिस विभाग के मुखिया के भरोसे हम कोरोना के खिलाफ चिकित्सकीय लड़ाई में खुद को बचाने का सपना देख रहे हैं, उसकी चादर कितनी मैली है इस पर बहस शुरू हो गई। जाहिर है सरकार ने मामले के प्रकाश में आने पर विजिलेंस विभाग को सक्रिय किया और नतीजे में सरकारी पद की भूमिका पिंजरे में नजर आ रही है। कुछ तो संदिग्ध रूप से चल रहा था या किसी बाज ने अपने जाल में फंसा लिया। जो भी हो कहीं कुछ सुराख पूरी व्यवस्था में गाहे बगाहे नजर आते हैं, तो मालूम होता है कि भ्रष्टाचार की चरागाहें किस तरह विकसित हो चुकी हैं। इस गिरफ्तारी का यह अर्थ भी नहीं कि भ्रष्टाचार पर कोई बड़ा प्रहार हो गया, क्योंकि अभी जांच के निष्कर्ष आएंगे। सदा की तरह हिमाचल की व्यवस्था में काली सूची बढ़ जाती है, लेकिन कोई असरदार कानूनी पहल नहीं होती और न ही सरकारी खरीद फरोख्त, निविदा आमंत्रण या ठेकों में दलाली रुकती है। यह दीगर है कि कोई अदना सा कर्मचारी पकड़ा जाता है, लेकिन बड़ी मछलियां पुनः भ्रष्टाचार के समुद्र में समा जाती है। इस दौरान कितने अधिकारी दवाई उद्योग, सामान्य उद्योग, विद्युत, प्रशासन, पीडब्ल्यूडी, आईपीएच, वन, आबकारी या अन्य महकमों की मिट्टी पलीद कर चुके हैं, लेकिल आज भी हिमाचल में बासठ के करीब दागी अधिकारी काम कर रहे हैं। क्या इस तरह की करतूतों के बाद निजी क्षेत्र में कोई महत्त्वपूर्ण ओहदेदार रह सकता है। यहां हम एक महकमे के मुखिया पर दोषारोपण करके समूची व्यवस्था को पाक करार नहीं कर सकते और न ही यह कह सकते कि सारा माजरा एक व्यक्ति के कारण जाहिर हो रहा है। सरकारी क्षेत्र में धीरे-धीरे कुछ ऐसी परंपराएं विकसित हो रही हैं जहां हर ओहदा एक तरह का रजत अस्तर है। हम चाहें तो यह समीक्षा कर सकते हैं कि आखिर कुछ प्रमुख पद क्यों बार-बार राजनीतिक पसंद से चलते है या एक सत्ता के बाद जब सियासी विकल्प सत्तारुढ़ होता है, तो पदोन्नति की सारी सीढि़यां क्यों बदल जाती हैं। हम यह मूल्यांकन भी कर सकते हैं कि आज भी ब्रिटिश पीरियड में बने कई पुल यातायात का दबाव बर्दाश्त कर रहे हैं, जबकि कुछ दिन पहले बारह करोड़ जाया करके एक पुल पूरी तरह चकनाचूर हो गया। विडंबना यह भी है कि कोरोना युद्ध के दौरान हमारा चरित्र इस कद्र हार रहा है कि सेनेटाइजर जैसे उत्पाद में भी हमारी सरकारी मशीनरी भ्रष्टाचार का उत्पात करती रही। जीवन रक्षक दवाइयों में बार-बार बीबीएन के सैंपल ही क्यों फेल होते हैं। दरअसल सरकारी संसाधनों के प्रति न कोई सत्ता जिम्मेदार होना चाहती और न खर्च के ब्यौरे किसी जवाबदेही के सामने ईमानदार हैं। दुर्भाग्यवश जहां राज्यों की जीडीपी बनती और संवरती है, उस निजी क्षेत्र को हमारी नीतियां और नियम आजादी से काम नहीं करने देते। ऐसा तंत्र विकसिक किया जाता है जिसका आका कोई व्यवस्था नहीं, बल्कि राजनीतिक करार है। इसलिए हमारे चारों ओर एक नुमाइश सजी है और इसके भीतर न जाने कहां-कहां दीमक है। हो सकता है कि चिकित्सा विभाग की नुमाइश से एक दीमक भाग खड़ी हुई और उसने हमें ऑडियो सुना दिया, वरना कमोबेश हर विभाग की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन वे तमाम दागी अधिकारी तो न जाने  कब से कर चुके हैं। आज इसी सूची में इजाफा हो गया,कल हो सकता है कोई और पकड़ में आ जाए, लेकिन इससे शायद ही व्यवस्था के कान में कोई जूं रेंगे।