Friday, December 13, 2019 07:17 PM

दिनों दिन बदल रहा रेणुका मेले का स्वरूप

 अब नहीं लगते पहाड़ी डेरे, पहाड़ी संस्कृति का आईना भी नहीं दिखता

श्रीरेणुकाजी -अंतरराष्ट्रीय रेणुका मेले का स्वरूप दिनोंदिन बदलता जा रहा है। कभी भगवान परशुराम की पालकी तांबे की पिटारी में आती थी। वर्तमान में इसका स्थान चांदी की पालकी ने ले लिया है। यह मेला जहां अपनी धार्मिक मान्यताएं आज भी समेटे है। यदि पतन हुआ है तो हमारी पहाड़ी संस्कृति का क्योंकि अब इस मेले में पहाड़ी रीति-रिवाज व वेशभूषा देखने को नहीं मिलते। अब मेले मंे डेरे भी नहीं लगते। मां-बेटे के मिलन पर्व के रूप में मनाए जाने वाले इस मेले का इतिहास पौराणिक है। यह मेला व्यास्त काल से लगभग 250 वर्ष पूर्व लगता था। उस समय बाजार नहीं लगता था। मंदिर के आसपास ही 10 से 20 दुकानंे लगती थी, जिससे गांव के लोग अपनी जरूरत की वस्तुएं खरीदते थे। महाराजा अमर प्रकाश व सिरमौर के अंतिम महाराजा राजेंद्र प्रकाश ने मेले के स्तर में सुधार लाया। ताबें के पिटारी की जगह भगवान परशुराम की चांदी की पालकी बनाई और 21 जवान सशस्त्र सलामी देने लगे व प्रतिवर्ष मेले में देव दर्शन के लिए आने लगे। उसके बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री मेले मंे आने लगे। मुख्यमंत्री मेले मंे लोगों की समस्याएं सुनते हैं। पहले देवता की पालकी जहां आज पक्का गिरि पुल है उसके नीचे से आती थी। 1974 मंे पक्का पुल बनने से पालकी का रूट बदल दिया गया, क्योंकि पुल के नीचे से जाने के लिए भगवान परशुराम ने गरणी में मना कर दिया।  भगवान परशुराम विंध्याचल से डेढ़ दिन के लिए तप छोड़कर मां रेणुका के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं। रेणुका मेला पहाड़ी क्षेत्रों का कुंभ है, लेकिन पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली व राजस्थान के श्रद्धालुओं को यहां खींच लाता है। यहां लोगों की मन्नतें पूरी होती हैं। मान्यता के अनुसार एकादशी व पूर्णिमा के दिन पवित्र रेणुका झील में स्नान करने से चार धाम की यात्रा का पुण्य व मोक्ष प्राप्त होता है। भगवान परशुराम की शोभा यात्रा को देखकर मनुष्य धन्य हो जाता है व उसके रोग नष्ट हो जाते हैं। यंू तो रेणुका में सदाबहार रौनक रहती है, जहां कभी यह पशु-पक्षियों व संतों का आश्रय था। वहीं अब पर्यटकों के लिए सैर-सपाटे का आयोजन हो गया है। अब यह मेला संस्कृति की बजाय आधुनिकता का आईना बन गया है। प्रत्येक सरकार ने मेले के स्तर को सुधारने का काम किया है। यह मेला स्थानीय स्तर से अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा दिया गया है।