दिल्ली है भारत का दिल

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

दिन की समाप्ति के साथ मैं इस बात से हैरान हो गया जब कांग्रेस के कट्टर समर्थकों तक ने माना कि कांग्रेस को दो सीटें मिलेंगी तथा बाकी सभी सीटें एनडीए को चली जाएंगी। मेरा अपना अनुमान भी यह था कि कांग्रेस को एक सीट मिलेगी, जबकि आम आदमी पार्टी को एक भी सीट नहीं मिलेगी। बाकी सभी सीटें एनडीए के खाते में चली जाएंगी। इसके बावजूद उनके चेहरों पर खुशी झलक रही थी क्योंकि उन्हें यह भी विश्वास नहीं था कि वे दो सीटें भी जीत जाएंगे, जबकि अखबारों में यह भी लिखा जा रहा है कि यूपीए सभी सीटों पर जीत दर्ज करेगा। पाठकों को गुमराह करने के लिए झूठ का विचारपूर्ण प्रयोग पत्रकारों के मध्य आम हो गया है। हर कोई शर्त लगाने के मूड में दिखा, किंतु जैसा कि सत्ता के गलियारों में देखा गया, लड़ाई अब खत्म हो चुकी थी...

जब एक सेना अपने मिशन में फेल हो गई तथा अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकी तो बुद्धिमान बुजुर्ग लोगों ने कहा, ‘दिल्ली दूर है।’  इसने भारत के दिल तक पहुंचने में विफलता को रेखांकित किया। मैंने हाल में दिल्ली में कुछ दिन बिताए। मुझे वहां 40 डिग्री तापमान का सामना करना पड़ा। इसके अलावा राजनीतिक द्वंद्व से भी मुझे गुजरना पड़ा। यह रविवार का दिन था और मतदान हो रहा था। मौसम गर्म तथा सुस्ती वाला था। आम तौर पर रविवार को लोग अपने घरों में एयर कंडीशनर की छाया में गर्मी से निजात पाने का प्रयास करते हैं तथा बाहर के शोर-शराबे से बचते हुए यहां तक कि युवा लोग भी नींद की ओवरडोज लेते हैं। इस रविवार को  मतदाता इधर-उधर भागदौड़ कर रहे थे। इनमें से कई उस प्यार की खोज कर रहे थे जिसका वर्णन करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि उनकी पार्टी प्यार फैलाती है, जबकि मोदी में घृणा भरी हुई है। तर्क और हमनाम की पुरानी तार्किक भ्रांति को प्रयोग करना अच्छा है, जो इस बात पर लक्षित है कि कुत्ते को पागल कहो तथा उसके पहुंचने से पहले ही उसे मार दो। मुझे ऐसी शब्दावली के प्रयोग के लिए पछतावा है जो कि यूपीए द्वारा प्रयोग किए गए सांप व बिच्छू से बेहतर नहीं है।

सुकरात, राहुल की इस थ्योरी पर चकित हुए होते तथा इस पर संवाद की मार्किट एवं परिचर्चा संचालित की होती। सौभाग्य की बात है कि नरेंद्र मोदी ने गालियों के प्रति नर्म रुख व सहनशीलता का परिचय दिया है। इस तरह के कुछ संवाद मतदान के दिन रविवार को छह बजे के बाद शराब पर पाबंदी खुलने के बाद प्रेस क्लब तथा अन्य क्लबों में उस समय सुनने को मिले जब वहां पर पत्रकार लोग एकत्र हुए। हर कोई हाथ ऊपर कर रहा था तथा दिल्ली की दो या तीन या सभी सात सीटों के लिए विजय चिन्ह बना रहा था। महानगर की सातों सीटों पर कड़ा संघर्ष हो रहा है। पिछली बार एनडीए को सभी सात सीटें मिल गई थीं, लेकिन इस बार संघर्ष कड़ा लग रहा है। दिन की समाप्ति के साथ मैं इस बात से हैरान हो गया जब कांग्रेस के कट्टर समर्थकों तक ने माना कि कांग्रेस को दो सीटें मिलेंगी तथा बाकी सभी सीटें एनडीए को चली जाएंगी। मेरा अपना अनुमान भी यह था कि कांग्रेस को एक सीट मिलेगी, जबकि आम आदमी पार्टी को एक भी सीट नहीं मिलेगी। बाकी सभी सीटें एनडीए के खाते में चली जाएंगी। इसके बावजूद उनके चेहरों पर खुशी झलक रही थी क्योंकि उन्हें यह भी विश्वास नहीं था कि वे दो सीटें भी जीत जाएंगे, जबकि अखबारों में यह भी लिखा जा रहा है कि यूपीए सभी सीटों पर जीत दर्ज करेगा। पाठकों को गुमराह करने के लिए झूठ का विचारपूर्ण प्रयोग पत्रकारों के मध्य आम हो गया है। हर कोई शर्त लगाने के मूड में दिखा, किंतु जैसा कि सत्ता के गलियारों में देखा गया, लड़ाई अब खत्म हो चुकी थी। आश्चर्यजनक रूप से मैंने टैक्सी चालक को बहुत ईमानदार व विचारों में बिल्कुल स्पष्ट पाया। एक टैक्सी वाला सीधा-सीधा कहता है, ‘मैंने घर बना लिया है, गैस व शौचालय भी प्राप्त कर लिया है, अब मुझे मोदी को क्यों वोट नहीं करना चाहिए?’ एक अन्य टैक्सी चालक विचारक टाइप व्यक्ति था, ‘सर, आप मुझे बताएं कि जब केंद्र में कोई दूसरा दल राज कर रहा हो, तो कैसे कोई अलग पार्टी राज्य में काम कर सकती है? हम चाहते हैं कि केंद्र में जो पार्टी राज करे, वही राज्य में भी होनी चाहिए।’ मोदी गैंग की इस भीड़ के बाहर मुझे केवल एक टैक्सी चालक मिला जिसने अलग मत प्रकट करते हुए कहा, ‘मोदी एक भ्रष्ट आदमी है जिन्होंने राफेल सौदे में अर्जित पैसा अपनी जेब में डाल लिया है।’ मैंने उससे कोई तर्क-वितर्क नहीं किया क्योंकि लगता था कि उसे ऐसा सिखाया गया था तथा उसके विचारों को बदलना आसान नहीं था। किंतु दूरस्थ छोर पर अथवा दिल्ली से दूर कस्बों में भी मोदी-मोदी की आवाज सुनी जा सकती है।

रविवार को हुए मतदान का परिणाम एनडीए के विरोधी दलों के चेहरों पर साफ लिखा था। इसके बावजूद कांग्रेस की स्थिति पिछली बार जितनी बुरी नहीं है तथा एक या दो सीटें भी पार्टी के मनोबल को बढ़ा सकती हैं। दिल्ली में चुनाव इतने महत्त्वपूर्ण क्यों बन जाते हैं कि हर कोई अपने भविष्य को लेकर उत्तेजित दिखता है? शुरू से ही, जब से वर्ष 1931 में देश की राजधानी कोलकाता से दिल्ली को बदली गई, इससे पहले मुगल काल तथा उससे भी पहले इद्रप्रस्थ के पांडवों की राजधानी भी यही रही है तथा उत्तरी भारत का यह क्षेत्र शक्ति का केंद्रीय प्रतीक रहा है। यह न केवल देश की प्रशासनिक व राजनीतिक राजधानी रही है, बल्कि सामाजिक व सांस्कृतिक राजधानी की धुरी भी रायसीना हिल्स के आसपास घूमती है। हमले के समय कवियों का आवागमन दिल्ली से लखनऊ की ओर हो गया।

महान उर्दू कवि मीर, जो लखनऊ आए, से जब पूछा गया कि वह किस क्षेत्र से संबंधित हैं, तो उन्होंने जवाब दिया, ‘क्या बूदो बाश पूछो हो पूरब के सकिनो/हमको गरीब समझ कर हंस हंस पुकार कर/द्ल्लि जो एक शहर था आलम में इंतेखाब, रहते थे जहां मुंतिखब ही/रोजगार के/उसको फलक ने लूट के वीरान कर दिया/हम रहने वाले हैं उसी उजड़े दियार के।’ इसमें लखनऊ पर ऐसे बेहूदा सवालों के लिए प्रश्नांकित किया गया है जबकि उन्हें यह पता होना चाहिए था कि एक महान शहर, जिसमें संभ्रांत लोग रहते हैं, भाग्य के हाथों उजड़ गया है। मैं उसी परित्यक्त वृक्ष से संबंधित हूं। यह व्यंग्योक्ति उर्दू कविता में शास्त्रीय है। वही शहर आज युवाओं की बढ़ती आकांक्षाओं तथा डिजीटल संसार व मेट्रो में दौड़ते एक शहर का प्रतिनिधित्व करता है। शहर में शक्ति भारत के दिल को स्पंदित कर रही है तथा चुनाव को निर्णायक बना रही है। 

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