देवभूमि को कलंकित करते कारनामे

जगदीश बाली 

स्वतंत्र लेखक

सरकाघाट के एक गांव में वृद्ध महिला के साथ हुए आततायी व्यवहार पर मन दुखी व आक्रोशित है। आस्था व अंधविश्वास के बीच फासला ज्यादा नहीं होता। इस महीन सी हद को जब आस्था या श्रद्धा पार करती है, तो अंधविश्वास का काला युग व साम्राज्य आरंभ होता है। अंधविश्वास के उस स्याह अंधेरे में धर्म, ईश्वर व देवी-देवताओं के चंद ठेकेदार समाज में तरह-तरह की भ्रांतियां फैला देते हैं...

खेदजनक है कि खुदा की बात करने वाले व खुदा की कसमें खाने वाले अब खुद ही खुदा बन बैठे हैं। अफसोस है जिस प्रदेश को देवभूमि कहते हैं उसी प्रदेश को देवी-देवताओं के नाम पर शर्मसार होना पड़ रहा है। देव संस्कृति के नाम पर अंधविश्वास, रूढि़वादिता व अहंकार के ऐसे नंगे नाच पर अगर आज लगाम नहीं कसी गई तो मालूम नहीं कल प्रदेश के किस देव प्रांगण में किस राजदेई को इन देवता के ठेकेदारों का शिकार होना पड़े। सरकाघाट के एक गांव में वृद्ध महिला के साथ हुए आततायी व्यवहार पर मन दुखी व आक्रोशित है। आस्था व अंधविश्वास के बीच फासला ज्यादा नहीं होता। फासला सा होता है। इस महीन सी हद को जब आस्था या श्रद्धा पार करती है, तो अंधविश्वास का काला युग व साम्राज्य आरंभ होता है। अंधविश्वास के उस स्याह अंधेरे में धर्म, ईश्वर व देवी-देवताओं के चंद ठेकेदार समाज में तरह-तरह की भ्रांतियां फैला देते हैं। वे दैविक प्रकोप के भय का एक ऐसा माहौल तैयार कर लेते हैं कि आम आदमी उनके द्वारा कही गई बातों को देववाक्य समझ कर नियम मान लेते हैं जिनका पालन करने के लिए वे बाध्य हो जाते हैं। ऐसे माहौल में वे किसी को भूत या डायन भी घोषित कर लेते हैं। ऐसे में लोगों की एक ऐसी अंधी भीड़ तैयार हो जाती है जो तर्क-कुतर्क नहीं जानती। ये भीड़ उन ठेकेदारों द्वारा रचित तर्कहीन कायदे कानून का पालन न करने वालों पर टूट पड़ती है। इस बार ये भीड़ सरकाघाट के एक गांव में बुजुर्ग महिला पर टूट पड़ी। जिस उम्र में औरों के सहारे की दरकार होती है, उस उम्र में इस महिला को डायन घोषित कर दिया गया। इसके पके हुए बालों को काटकर मुंह पर कालिख पोत दी गई। नंगे पांव इस महिला को गांव में पीटा-घसीटा गया। पीडि़त महिला का कहना है कि उसके स्वर्गीय फौजी पति के मेडल व अन्य निशानियां भी जला दी गईं। विडंबना है कि अंधविश्वास के उन्माद में भीड़ ‘मैया जी की जय’ व ‘बोल सांचे दरबार की जय’ का उद्घोष कर रही थी। आज के आधुनिक व वैज्ञानिक युग में अंधविश्वास व रूढि़वादिता की ये पराकाष्ठा नहीं तो फिर क्या है?

इस बुजुर्ग महिला को अमानवीय प्रताड़ना देने वाली भीड़ कहती है कि यह देवता जी का फैसला है। देवता के नाम पर इकट्ठी इस भीड़ का भय या प्रभाव इतना कि मामला कुछ दिन तक दबा रहा। जाहिर है महिला आवाज नहीं उठा पाई। यहां तक कि महिला ने अपनी बेटी को भी अपने ऊपर हुए जुल्म के बारे में नहीं बताया। शुक्र है इस घटना के वीडियो बनाने वाले का। अच्छा ये हुआ कि वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। 80 वर्षीय महिला को जलील करने वाले इन लोगों की सीनाजोरी इतनी कि भीड़ थाने को घेरने भी निकल पड़ी थी। जानकारी यह भी है कि पहले भी गांव में देवता के नाम पर डराया धमकाया गया है। खैर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने मामले का संज्ञान लिया है और कई गिरफ्तारियां इस मामले में हुई हैं। अब तो प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी इस घटना का संज्ञान लिया है। आपको याद होगा ऐसी ही भीड़ इस वर्ष जनवरी में बंजार के एक फागली उत्सव में उस वक्त एक अनुसूचित युवक पर भी टूट पड़ी थी जब देव कारकूनों द्वारा फेंके गए फूल उसके हाथ में आ गए थे। कारकूनों ने इसे अशुभ मान लिया और परिणाम स्वरूप उस युवक की पिटाई कर दी गई थी। उस फूल को क्या पता कि उसे किसके हाथ में जाना है और किसके हाथ में नहीं जाना है! कई बार ऐसी भीड़ देवता के नाम पर दलितों को मंदिर में प्रवेश भी नहीं करने देती। किसी इनसान के प्रवेश से कोई मंदिर कैसे अपवित्र हो सकता है? अजब है कि मंदिरों के अहाते व छतों पर बेजुबान जानवरों की बलि दे कर खून बहाने से पवित्रता नष्ट नहीं होती।

देवता जी का ऐसा कानून नहीं हो सकता, बल्कि खुद को देवदूत मान चुके कुछ कार करिंदों की करामात होती है। शैक्षणिक उपाधियां, उपलब्धियां, डिग्रियां व तमगे तब तक महज कागज व धातुओं के टुकड़े हैं जब तक शैक्षिणिक योग्यताएं मानव के आचार व्यवहार में नहीं झलकती। विडंबना है कि शिक्षा के क्षेत्र में अव्वल राज्यों में गिनती होने के बावजूद हमारे समाज का एक हिस्सा अंधविश्वास के दायरे से बाहर नहीं आ पा रहा है। समाहल में वृद्धा को प्रताडि़त कर उसके साथ किया गया अमानवीय व्यवहार इसी बात की बानगी है। जब हिमाचल प्रदेश को देवभूमि के नाम से पुकारा जाता है तो अनायास ही इस प्रदेश के पवित्र होने का एहसास हो उठता है। यहां के लोगों के भोले-भाले, दयावान व न्यायप्रिय होने की बात जहन में उतरती है। परंतु इस तरह की घटनाएं प्रदेश को शर्मसार ही करती हैं। निःसंदेह हमारा प्रदेश देवी-देवताओं का प्रदेश है। जाहिर है लोगों का देवी- देवताओं में अगाध विश्वास और आस्था है। इस आस्था के चलते ये समाज में व्यवस्था बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। परंतु देवी-देवता समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए हैं, किसी को क्रूर तरीके से जलील व प्रताडि़त करने के लिए नहीं। ये आततायी व्यवहार व जुल्म हमारी देव संस्कृति का हिस्सा नहीं हो सकते। आस्था के नाम पर किसी को ये हक नहीं दिया जा सकता। मानव सृष्टि से ही हम जहालत से सभ्य समाज की ओर बढ़े हैं, परंतु ऐसी घटनाएं यही प्रदर्शित करती हैं कि देव संस्कृति की आड़ में प्रदेश में ऐसा माफिया पनप रहा है जो समाज को पीछे की ओर धकेलने में लगा है और देवभूमि को कलंकित कर रहा है। खुद को देवदूत कहने वाले कुछ ऐसे लोगों को देश के कानून का सबक सिखाना आवश्यक है अन्यथा आज एक राजदेई शिकार हुई है, मालूम नहीं भविष्य में कौन इनका शिकार हो जाए।