Monday, November 19, 2018 12:12 AM

देश को पीछे ले जा रहा आरक्षण

नीलम सूद

लेखिका, पालमपुर से  हैं

जो लोग समझते हैं कि आरक्षण से समाज के दबे-कुचले तबके को बल मिलेगा, तो अंतरिक्ष तक पहुंची कल्पना चावला जैसी माहिलाएं उनके मुंह पर एक जोरदार तमाचा हैं। आरक्षण से अपराध व अत्याचार कभी कम नहीं होंगे और न ही समाप्त होंगे, बल्कि आरक्षण  योग्यता पर वह प्रहार है, जो देश को डुबोकर छोड़ेगा...

आजकल देश में आरक्षण का मुद्दा इस कद्र हावी है कि 2019 के चुनावों में इसकी काली छाया पड़ने की पूरी संभावना है। एससी / एसटी एट्रोसिटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को बदल देना भाजपा केलिए खुद अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। चलो मान लेते हैं कि अशिक्षा व अंधविश्वास के कारण दलितों पर अमानवीय अत्याचार हुए हैं और कुछ स्थानों पर आज भी हो रहे हैं, परंतु विभिन्न राजनीतिक दल इस समस्या का जो समाधान निकालना चाहते हैं, वह पूर्णतया वोटों की राजनीति को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। तुलसी चरित रामायण में कहा गया है कि ढोल, शूद्र, पशु और नारी ये सब ताड़न के अधिकारी हैं। कितनी ही विकृत सोच रही होगी उस युग की जब निर्जीव वस्तुओं ढोल इत्यादि की सजीव नारी व दलितों के साथ तुलना की जाती होगी। यहां हिंदू सनातन धर्म के अनुसार तुलसीदास को अगर संत मान कर चलते हैं, तो उनके कहने का तात्पर्य है कि ढोल, पशु और शूद्र व नारी को उसके गुण के आधार पर देख-परख कर चयन करना चाहिए, परंतु विडंबना यह है कि पुरुष कैसा भी हो शराबी-कवाबी, नालायक, अनपढ़, निकम्मा, भैंगा,  पागल वह हर तरीके से सही है। किसी भी नारी को उसका चयन करते समय ताड़ने अर्थात उसका निरीक्षण करने की कतई आवश्यकता नहीं है।

मेरा इन राजनीतिक पार्टियों एवं दलित परिवारों से निवेदन है कि जितने जुल्म दलितों पर हुए हैं, उससे कहीं अधिक नारियों पर हुए हैं और आज भी गर्भ से लेकर सड़क तक हो रहे हैं, परंतु आरक्षण व ऐसे बेसिर-पैर के कानून इस समस्या का हल नहीं हैं। नारी सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का भी उसी प्रकार दुरुपयोग हो रहा है, जिस प्रकार एससी / एससी एट्रोसिटी एक्ट का। आरक्षण एक ऐसा जहर है, जो देश की संपूर्ण व्यवस्था को धीरे-धीरे खोखला कर रहा है। कभी जाति के नाम पर, कभी क्षेत्र के नाम पर, तो कभी लिंग के नाम पर आरक्षण। कभी किसी ने यह विचार करने की कोशिश नहीं की कि आरक्षण से क्या बदला है। सदियों से दोषपूर्ण सामाजिक अव्यवस्थाओं की शिकार महिलाओं के कल्याण, उन्हें मुख्य धारा में जोड़ने एवं महिला अत्याचारों पर लगाम कसने हेतु महिला आरक्षण की बात की जाती है। लेकिन हमने कभी सोचा है कि क्या आरक्षण मिलने भर से महिलाओं की स्थिति सुधर जाएगी या उन पर हो रहे अत्याचारों में कमी आ जाएगी। वोटों की राजनीति करने वाले नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि पंचायतों व नगर निकायों में महिलाओं को मिले आरक्षण से क्या बलात्कार कम हुए हैं? क्या दहेजप्रथा बंद हुई है? क्या भ्रूण हत्या पर संपूर्णतया रोक लगी है? अगर नहीं तो आरक्षण क्यों? समावेश दलित समाज की भी यही स्थिति है। हमारे पुरुषप्रधान समाज ने हजारों वर्षों से बगैर किसी महिला आरक्षण के ऐसी महिला नेत्रियां प्रदान की हैं, जिन्होंने नारी शक्ति को गौरवान्वित किया है। कस्तूरबा गांधी, सावित्रिबाई फूले, कमला चट्टोपाध्याय, विजयालक्ष्मी पंडित और कैप्टन लक्ष्मी सहगल आदि कुछ ऐसे नाम हैं, जिन्हें कभी किसी आरक्षण की जरूरत नहीं पड़ी। यह उस कालखंड की विभूतियां हैं, जब महिलाओं में साक्षरता का प्रतिशत अत्यंत ही कम था।

बड़े-बड़े घूंघटों के बीच समाज ने उन्हें परदे से ढक रखा था। इस दृष्टिकोण से जब आज की पढ़ी-लिखी नारी आरक्षण की वकालत करती है, तो आश्चर्य होता है। पंचायत समितियों में एवं स्थानीय निकायों में आरक्षण से जो महिलाएं राजनीति में आई हैं, उनमें भी ज्यादातर महिला सरपंच व नगर निकायों की मेयर तक के अधिकारों का उपयोग उनके पति, ससुर एवं देवर कर रहे हैं। इतना ही नहीं, राजनीतिक पार्टियों में भी उनके पति ही उनका प्रतिनिधित्व करते हैं। अशिक्षित महिलाओं को ऐसे परदे दिए गए हैं, जिसका वे क, ख, ग भी नहीं जानती। बिना योग्यता या बिना कैलिवर के महिलाओं को मेयर जैसे पदों पर विराजमान करोगे, तो शिमला जल संकट जैसी अव्यवस्था का सामना ही करना पड़ेगा। महिला होते हुए भी मैं महिला आरक्षण का विरोध करती हूं व मानती हूं कि जो महिलाएं चिकित्सक बन आसमान छू रही हैं, जोमहिलाएं पत्रकार बन बुलंदियों पर हैं, जो महिलाएं जाति और क्षेत्र आधारित आरक्षण के बिना उच्च प्रशासनिक पदों पर आसीन होकर या देश की सेना में आसीन होकर देश सेवा कर रही हैं, लेखिका बन समाज सेवा में संलग्न हैं, क्या उन्हें किसी आरक्षण की जरूरत है? जो लोग समझते हैं कि आरक्षण से समाज के दबे-कुचले तबके को बल मिलेगा, तो अंतरिक्ष तक पहुंची कल्पना चावला जैसी माहिलाएं उनके मुंह पर एक जोरदार तमाचा हैं। तो हमारे नेताओं और उनके चमचो! यह जान लो कि आरक्षण से अपराध व अत्याचार कभी कम नहीं होंगे और न ही समाप्त होंगे, बल्कि आरक्षण योग्यता पर वह प्रहार है, जो देश को डुबोकर छोड़ेगा। आरक्षण नहीं ऐसे कानूनों की जरूरत है, जिनका दुरुपयोग न हो बल्कि डर हो। परंतु यह भी एक कटु सत्य है कि न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी, क्योंकि हमारे नेताओं ने हमारी व्यवस्था को को ही ऐसा बना दिया है, जहां सुधार की कोई गुंजाइश ही नहीं रही। रही-सही कसर नेताओं के अंधभक्त पूरी कर रहे हैं, जो उनके हर ठीक व गलत काम पर जय-जयकार करने में लगे हैं।