Monday, November 19, 2018 12:53 AM

देश में बाढ़ प्रबंधन की कारगर योजनाएं नहीं

डा. वरिंदर भाटिया

लेखक, पूर्व कालेज प्रिंसीपल हैं

केरल की बाढ़ ने इसकी अर्थव्यवस्था को कई साल पीछे धकेल दिया है। यह विश्लेषण बताता है कि बाढ़ किस निर्ममता से हमारी अर्थव्यवस्था को चट कर रही है। सिर्फ केरल की बात ही नहीं, बिहार का 73 प्रतिशत हिस्सा आधे साल बाढ़ और शेष दिन सूखा झेलता है और यही वहां के पिछड़ेपन, पलायन और परेशानियों का कारण है। इसका लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा नदियों के रौद्र रूप से पस्त रहता है। असम में इन दिनों 18 जिलों के लगभग साढ़े सात लाख लोग बाढ़ के कारण घर, गांव से पलायन कर गए हैं...

केरल में बारिश से आई बाढ़ वहां गंभीर पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक संकट का कारण बन चुकी है। कहा जा रहा है कि केरल में पिछले 100 वर्षों में ऐसी मूसलाधार बारिश नहीं हुई थी। नतीजतन वहां तमाम बांध, जलाशय, झील और तालाब लबालब भर गए। केरल में 1924 के बाद से अब तक की यह सबसे प्रलयंकारी बाढ़ है। भारी बारिश के बाद आई भीषण बाढ़ ने राज्य को तहस-नहस कर दिया है। इसने वहां की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से हिलाकर रख दिया है। केरल की अर्थव्यवस्था मुख्य तौर पर पर्यटन उद्योग पर टिकी है, लेकिन बाढ़ के चलते यह उद्योग फिलहाल बुरी तरह चौपट हो गया है। सूत्रों के अनुसार इन्फ्रास्ट्रक्चर और संपत्ति का कुल मिलाकर 20,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। उद्योग जगत का मानना है कि टूरिज्म सेक्टर और बाकी चीजों से करीब 25,000 करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है। केरल में टूरिस्ट घूमने के साथ-साथ कई मेडिकल सुविधाओं का लाभ भी उठाते हैं। कई लोग यहां आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट के लिए आते हैं। ऐसे में यहां हेल्थ और हॉस्पिटालिटी सेक्टर दोनों को भारी नुकसान होने की संभावना है।

वहां अचल संपत्तियों, कृषि और बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान हुआ है, जिसने राज्य को करीब 21,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की चोट पहुंचाई है। एक पुष्ट रिपोर्ट के मुताबिक भारी बारिश से पीडि़त केरल राज्य की जीडीपी इस वित्त वर्ष के 7.6 फीसदी के बजटीय अनुमान से घटकर 6.5 से 7 फीसदी पर पहुंचने का अनुमान है। राज्य की जीडीपी में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान सिर्फ 26 फीसदी है, जबकि 66 फीसदी योगदान सेवा क्षेत्र का है, जिसमें अकेले पर्यटन क्षेत्र की हिस्सेदारी 40 फीसदी की है। इस रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि जिले, राज्य और राष्ट्रीय राजमार्गों की करीब 10,000 किलोमीटर तक की सड़कों को होने वाला नुकसान अनुमानित रूप से 12,000 करोड़ रुपए के आसपास बैठेगा और एयरपोर्ट को होने वाला नुकसान करीब 40 करोड़ रुपए के आसपास बैठेगा। सरकारी आंकड़े ही गवाह हैं कि भारत में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की माप किस तरह बढ़ती गई है। 1951 में यह महज एक करोड़ हेक्टेयर थी, जो 1960 तक बढ़कर अढ़ाई करोड़ हेक्टेयर हो गई। 1978 में यह दायरा 3.4 हेक्टेयर पहुंचा और आज देश के कुल 329 मिलियन हेक्टेयर में से चार करोड़ हेक्टेयर इलाका नियमित रूप से बाढ़ की चपेट में हर साल बर्बाद होता है।

इसी तरह बाढ़ से नुकसान भी तेजी से बढ़ता गया है। यह महज एक बानगी है कि वर्ष 1995-2005 के दशक में बाढ़ से 1805 करोड़ के नुकसान का सरकारी आकलन था, जो अगले दशक यानी 2005-2015 में बढ़कर 4745 करोड़ रुपए हो गया। केरल की अप्रत्याशित बाढ़ ने इसकी अर्थव्यवस्था को कई साल पीछे धकेल दिया है। यह विश्लेषण बताता है कि बाढ़ किस निर्ममता से हमारी अर्थव्यवस्था को चट कर रही है। सिर्फ केरल की बात ही नहीं, बिहार का 73 प्रतिशत हिस्सा आधे साल बाढ़ और शेष दिन सूखा झेलता है और यही वहां के पिछड़ेपन, पलायन और परेशानियों का कारण है। इसका लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा नदियों के रौद्र रूप से पस्त रहता है। असम में इन दिनों 18 जिलों के लगभग साढ़े सात लाख लोग बाढ़ के कारण घर, गांव से पलायन कर गए हैं और यह उनकी सालाना नियति है। केंद्र हो या राज्य सरकारों का ध्यान बाढ़ के बाद राहत कार्यों व मुआवजे पर ही रहता है। केरल बाढ़ से मुक्ति तो मिल जाएगी, लेकिन उससे हुए नुकसान से मुक्ति कब मिलेगी, यह पता नहीं। अब बाढ़ तो प्रकृति के हाथ में है, लेकिन उससे हुए नुकसान की भरपाई सरकार के हाथ में है। शुक्र है कि आपदा राहत में जुटे लोगों के पराक्रम, पायलटों के साहस, मछुआरों व विभिन्न समूहों के स्वयंसेवकों की निस्स्वार्थ सेवा की जैसी-जैसी कहानियां सुनने को मिल रही हैं, वे सचमुच दिल को छू लेने वाली हैं।

केरल वासियों की मदद के लिए चौतरफा अपील का असर देशभर में दिख रहा है। बालीवुड के एक शहंशाह ने भी 51 लाख रूपए की मदद देने की घोषणा की है। अनेक राज्य सरकारों ने अपनी तरफ से बाढ़ राहत कोष में धन जमा कराया है, लेकिन जब बारिश थमेगी और राज्य सरकार अपनी अर्थव्यवस्था, इन्फ्रास्ट्रक्चर और जन-स्वास्थ्य को फिर से पटरी पर लाने का काम शुरू करेगी, तब उसे कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। केरल वासियों को पूरे देश के लोगों से हमदर्दी और सहयोग की जरूरत है। कड़वा सत्य यह भी है कि आजादी के 71 से अधिक साल बाद भी हम आज तक देश में बाढ़ प्रबंधन की कोई कारगर योजना नहीं दे पाए हैं।