Tuesday, March 31, 2020 12:07 PM

दोषियों को फांसी एक नजीर

जगदीश बाली

लेखक, शिमला से हैं

जब कानून से न्याय और संरक्षण मिलता है तो समाज को तसल्ली, सुकून और संतोष प्राप्त होता है। 20 मार्च 2020 की सुबह भी सुकून देने वाली थी। जागने के तुरंत बाद मैंने जब मां को खबर दी कि उन सबको फांसी हो गई है, तो मां बोली, ‘अच्छा हुआ, नहीं तो ये बहुत नाचते।’ मां ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है, पर उनके शब्द इस बात का एहसास दिला रहे थे कि समाज का हर वर्ग कानून से न्याय और सुरक्षा की अपेक्षा रखता है। फांसी देने के बाद जल्लाद पवन ने भी यही कहा कि जीवन में पहली बार मुझे चार दोषियों को फांसी देने की खुशी है। सचमुच निर्भया के गुनहगारों को फांसी की खबर से कई दिनों से चले आ रहे मेरे उद्विग्न मन को मुसर्रत हासिल हुई। आखिर तारीख पर तारीख का सिलसिला खत्म हुआ और दिल को सुकून देने वाली वह सुबह आ ही गई जब  निर्भया के गुनहगारों को उस तख्त पर चढ़ा दिया गया जिसके वे हकदार थे। सफदरजंग हास्पिटल में मौत से जूझ रही निर्भया ने एसडीएम को बयान देते हुए कहा था, ‘नहीं...फांसी नहीं...सभी को जिंदा जला देना चाहिए।’ ऑक्सीजन मास्क से ढके मुंह से बुदबुदाते हुए इन शब्दों में मौत से जूझ रही उस बेटी की असीम व असहनीय पीड़ा आज भी साफ  महसूस की जा सकती है और साथ ही इसमें उसका उन अपराधियों के लिए आक्रोश व नफरत भी स्पष्ट महसूस की जा सकती है।

हालांकि हमारा कानून वह सजा तो नहीं दे सकता जो निर्भया ने चाहा था, परंतु देश का कानून ज्यादा से ज़्यादा जो सजा दे सकता है, वह उन गुनहगारों को मिल गई। निर्भया की आत्मा को कुछ शांति जरूर मिली होगी। कानून से इन गुनहगारों की पैंतरेबाजी चली तो काफी ज्यादा नहीं चली। एक साथ चार गुनहगारों को फांसी पर लटका दिया गया।  कौन भूल सकता है 16 दिसंबर 2012 की रात को 23 वर्षीय निर्भया से हुए सामूहिक दुष्कर्म और उसकी लोमहर्षक हत्या को जिससे दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरा देश दहल उठा था। इस अमानवीय कृत्य के विरोध में मोमबत्तियां जलाते हुए लोग इस उम्मीद के साथ आंदोलन के रूप में सड़कों पर उतर आए थे कि कानून बेटियों के विरुद्ध हो रहे ऐसे अपराधों के प्रति सख्त होगा। हालांकि फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद भी इन दरिंदों की फांसी की तारीख आगे खिसकती रही, परंतु आखिरकार गुनहगारों को उनके अंजाम तक पहुंचा दिया गया। निर्भया के मां-बाप ही नहीं बल्कि हर बेटी के मां-बाप आठ वर्षों से निर्भया के गुनहगारों को फांसी की इस घड़ी का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। ये गुनहगार कानून के छिद्रों से बच निकलने का भरसक प्रयास करते रहे और कानून के पंडितों ने भी कानून की धाराएं गिना-गिना कर फांसी को टालने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मौत की सजा सुनाए जाने के बाद से ही ये कानून के हर ढीले पेंच को घुमाते रहे। कुछ समय के लिए देशवासी फांसी को बार-बार टालने से निराश जरूर हो गए थे। पर अब वह मलाल जाता रहा। ये हमारे देश की मानवीयता व कानूनी-व्यवस्था है कि फांसी चुपचाप दे दी जाती है, अन्यथा ऐसे गुनाहों के लिए फांसी से भयंकर सजा भी दी जाए तो भी कम है। कई देशों में बलात्कार के अपराधियों को भयानक व पीड़ादायक मौत नसीब होती है।