Wednesday, August 21, 2019 05:12 AM

धारा से मुख्यधारा की ओर

कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने पर पाकिस्तान की कुंठाओं, पाबंदियों और बौखलाहटों के साथ जंग की भभकियों का विश्लेषण करना फिजूल है। यह उसकी पुरानी फितरत है। उसने द्विपक्षीय कारोबार और बालीवुड की फिल्मों पर पाबंदी चस्पां कर दी है। पाकिस्तान ने ‘समझौता एक्सप्रेस’ को बंद करने का भी ऐलान किया है। एयरस्पेस फिर रोका है, हालांकि उसकी अवधि सितंबर तक तय की है। नतीजतन अंतरराष्ट्रीय विमान सेवाओं के जहाजों को कुछ घूम कर दुनिया के दूसरे देशों तक जाना पड़ेगा। पाकिस्तान के साथ भारत का कारोबार मात्र 0.30 फीसदी है और व्यापार करने वाले देशों की सूची में 48वें स्थान पर है। पाकिस्तान अपने देश में महंगे दूध और टमाटर की चिंता करे। बहरहाल 370 के बाद प्रधानमंत्री मोदी के संदेश और आह्वानों तथा कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद की टिप्पणी की मीमांसा करना अनिवार्य है। गुरुवार, 8 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया। फोकस जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर ही था तथा संदर्भ अनुच्छेद 370 था कि आखिर यह ऐतिहासिक फैसला क्यों लेना पड़ा। देश के प्रधानमंत्री के जरिए पहली बार यह खुलासा हुआ कि कश्मीर के लिए जम्मू और लद्दाख दोनों ही ‘उपनिवेश’ जैसे थे और केंद्र के ऐसे करीब 100 कानून थे, जो कश्मीर में मान्य नहीं थे। प्रधानमंत्री का हैरान सवाल था कि क्या कभी ऐसी कल्पना की जा सकती है कि देश की संसद भारी बहस के बाद कोई बिल पारित करके कानून बनाए और कश्मीर में उसे स्वीकार न किया जाए? जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के बच्चों को मुफ्त शिक्षा का जो अधिकार मिलना चाहिए था, उन्हें उससे वंचित रखा गया, जो हक बेटियों को पूरे देश ने दे रखे हैं, वे कश्मीर में मान्य नहीं हैं, सफाई कर्मियों का कानून देश भर में लागू है, लेकिन कश्मीर में आज भी बहन-बेटियों को मैला सिर पर ढोना पड़ता है, सफाई कर्मी कानून कश्मीर में लागू ही नहीं किया गया। दलित अत्याचार संबंधी कानून भी नहीं हैं, अनुसूचित जाति-जनजाति को मिलने वाला आरक्षण भी कश्मीर में नहीं दिया जाता रहा है, अल्पसंख्यकों के हितों की हिफाजत भी नहीं की जाती थी। न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दी जाती थी। अवज्ञाओं की पूरी फेहरिस्त है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी माना कि 370 और 35-ए ने जम्मू-कश्मीर को अलगाववाद, आतंकवाद और परिवार, भ्रष्टाचार के अलावा कुछ और नहीं दिया। बीते तीन दशकों के दौरान करीब 42,000 निर्दोष लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। अब कश्मीर इन नकारात्मक बंदिशों से मुक्त है और 370 से मुक्ति एक सच्चाई है। यह कदम उठाना जरूरी था। अब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख  का न सिर्फ वर्तमान सुधरेगा, बल्कि भविष्य भी संवरेगा। वे अपनी नियति अब खुद लिखेंगे। उनके पास संसाधन हैं, प्रकृति की नियामतें हैं, सौर ऊर्जा की भरपूर संभावनाएं हैं, लद्दाख इसका राष्ट्रीय केंद्र बन सकता है। प्रधानमंत्री ने नए रास्ते, नए सपने, नए आयाम और नई मंजिलें दिखाई हैं, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए खुद ही प्रयास करने का आह्वान भी किया है। उन्होंने सभी को भरोसा दिलाया है कि शीघ्र ही हालात सामान्य होंगे। फिलहाल जो बंदिशें दिख रही हैं, वे कानून-व्यवस्था के लिए बहुत जरूरी थीं, लेकिन 370 हटने से आम कश्मीरी खुश है। वह पहले की तरह अपने विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री चुन सकेंगे। जम्मू-कश्मीर लंबे वक्त तक केंद्र शासित क्षेत्र नहीं रहेगा। अलबत्ता लद्दाख संघ शासित क्षेत्र ही रहेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने सेना और अर्द्धसैन्य बलों में भर्तियों की बात कही, केंद्र के कर्मचारियों के समान वेतन और भत्ते दिए जाएंगे, अब रोजी-रोटी के अवसर निश्चित तौर पर बढ़ेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पाकिस्तान 370 को हथियार की तरह इस्तेमाल करता रहा और लोगों को खूब भड़काया। अब वह अतीत हो गया है। प्रधानमंत्री ने लद्दाख की हर्बल वनस्पतियों और बिखरी दवाओं का जिक्र करते हुए उन्हें कुदरत का तोहफा माना। उनके प्रचार, प्रसार का जिम्मा उन्होंने वहां के नौजवानों पर सौंपा। प्रधानमंत्री ने कहा कि ईद पास ही है। उस पर्व की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। सभी मुस्लिम भाई आराम से ईद मना सकेंगे, यह आश्वासन प्रधानमंत्री ने दिया है। साफ है कि हालात बहुत जल्द ही सामान्य होंगे। प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीर, लद्दाख के लिए, विभिन्न मौकों पर बलिदान देने वालों को याद किया और ऐसे मौके पर कहा कि जम्मू-कश्मीर इस देश का ‘मुकुट’ है। ऐसे मौकों पर कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद द्वारा कश्मीरियों को ‘बिकाऊ’ करार देना शर्मनाक और कश्मीर-विरोधी लगा। गुलाम नबी को भूलना नहीं चाहिए कि उनके मुख्यमंत्री काल के दौरान भी कश्मीर 56 दिन तक बंद रहा था। अब तो मुद्दा ही बेहद संवेदनशील था।