धार्मिक आस्था का प्रतीक है पिपलू मेला

हिमाचल प्रदेश को देवभूमि के नाम से जाना जाता है। बंगाणा से सात किमी.की दूरी पर पिपलू में प्रतिवर्ष लगने वाला वार्षिक मेला धार्मिक आस्था के साथ प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को भी सदियों से संजोए हुए है। बदलते वक्त के साथ-साथ हमारे प्राचीन मेलों का स्वरूप भले ही बदला हो, लेकिन ऐतिहासिक पिपलू मेला आज भी अपनी प्राचीन सांस्कृतिक स्वरूप में काफी हद तक देखा जा सकता है। पिपलू गांव में भगवान नरसिंह से जुड़ी अनेक जनश्रुतियां प्रचलित हैं, जिनमें से एक के अनुसार पास के हटली गांव में एक उतरू नाम का किसान अपने खेत में काम कर रहा था, लेकिन अचानक उसकी दराती एक पौधे में फंस गई। पौधे को साफ  करते समय, उसके नीचे एक शिला भी पड़ी थी, लेकिन उतरू ने शिला की ओर कोई ध्यान नहीं दिया तथा खेत को साफ  कर वहां से चला गया। परंतु रात को स्वप्न में उसने देखा कि भगवान विष्णु उससे कह रहे हैं, मुझे खेत में नग्न छोड़कर तुम स्वयं बड़े आनंद से यहां सो रहे हो। उन्होंने कहा कि मुझे अब वहां धूप और ठंड लगेगी साथ ही मुझ पर बारिश भी पड़ेगी। दूसरे दिन उतरू फिर उसी खेत में पहुंचा तथा वहां से शिला को उठाकर पशुशाला में रख दिया और स्वयं चारपाई में जाकर सोने लगा। परंतु अभी वह मुश्किल से चारपाई पर सोया ही था कि वह चारपाई से नीचे गिर पड़ा। जैसे ही वह चारपाई में सोने का प्रयास करता वैसे ही नीचे गिर पड़ता। इस दौरान पशुशाला में उसके पशु भी जोर-जोर से चिल्लाने लग पड़े। तब उसने भगवान विष्णु को याद किया तथा दर्शन देने की प्रार्थना करने लगा। भगवान विष्णु ने दर्शन देकर कहा कि तुम मेरी पिंडी को बाजे बजाते हुए सूखे पीपल के पेड़ के नीचे रख दो। उसके बाद उतरू सूखा पीपल का पेड़ ढूंढते-ढूंढते झगरोट गांव आ पहुंचा, जहां उसे पीपल का सूखा पेड़ दिखाई दिया। उतरू ने शिला को पीपल के पेड़ के नीचे स्थापित करवा दिया तथा स्थापना के आठवें दिन सूखे पीपल से कोंपलें फूटने लगीं और कुछ ही दिनों में यह पेड़ हरा-भरा हो गया। उतरू ने प्रतिदिन यहां आकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी तथा धीरे-धीरे इस स्थान का नाम पिपलू पड़ गया। यहां जून महीने में मेले का आयोजन किया जाता है और छबीलें भी लगाई जाती हैं।

-शशि राणा, रक्कड़