Wednesday, September 18, 2019 08:59 AM

नई हांडी में पुरानी चाट

लोकसभा के लिए आज होने वाले चुनाव को प्रत्याशियों के साथ-साथ मतदाता भी पूरे जोश में हैं। इस बार खास यह है कि जिन मुद्दों पर सालों से बात हो रही हैं, वे अभी भी वैसे ही खड़े हैं। इस चुनाव में भी वही मुद्दे छाए हुए हैं, जो पहले थे। यानी चेहरे तो बदल रहे हैं, लेकिन मुद्दे नहीं। हर बार मतदाताआें को किन मुद्दों पर रिझाते आ रहे हैं नेता, इसी की पड़ताल करता इस बार का दखल...

सूत्रधार : अमन अग्निहोत्री, पवन कुमार शर्मा नीलकांत भारद्वाज, जितेंद्र कंवर, शकील कुरैशी

 

कांगड़ा-चंबा संसदीय क्षेत्र

केंद्र के सहारे टिके प्रत्याशी लच्छेदार भाषणों से जनता निराश

कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में भाजपा-कांग्रेस फिर आमने-सामने हैं। भाजपा से किशन कपूर तो कांग्रेस से पवन काजल  मैदान में हैं, लेकिन संसदीय क्षेत्र के कई मुद्दे आज भी मुंह बाएं खड़े हैं। या यूं कहे कि दशकों पुराने मुद्दे फिर जिंदा हो गए तो कोई हैरानी नहीं होगी। इस बार भी वहीं मुद्दे हैं,जिन पर अरसे से वोट बैंक की राजनीति होती आई है। कांगड़ा-चंबा संसदीय क्षेत्र में पूर्व की कई महत्त्वाकांक्षी परियोजनाएं आज भी अधर में हैं। पुराने वादे पूरे न हो पाने के चलते इस बार नेता नए वादे करने से बचते ही दिख रहे हैं। राजनीतिक दल व उनके प्रत्याशी जनता के मुद्दों के बजाय जातीयता और आरोप-प्रत्यारोप पर ज्यादा जोर देकर अपने-अपने पक्ष माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। दोनों ही प्रमुख दलों के नेता अपना विजन या पहाड़ी राज्य हिमाचल के मुद्दों को उठाने की बजाय अपनी पार्टियों के केंद्रीय चुनावी घोषणा पत्र को ही आधार बनाकर जनता के बीच जा रहे हैं, जिससे बुद्धिजीवी और शिक्षित वर्ग नेताओं के लच्छेदार भाषणों से जरा भी खुश नहीं दिख रहे हैं। कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन से जुड़े दर्जनों ऐसे मुद्दे हैं, जिनको नेता छूने से भी बच रहे हैं।

नई घोषणाएं करने से बच रहे नेता

कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं।  बावजूद इसके राजनीतिक दलों सहित चुनाव लड़ रहे अन्य प्रत्याशियों के भाषणों की समीक्षा करें, तो कहीं भी इस मुद्दे पर गंभीरता नज़र नहीं आती है। कांगड़ा रेलवे लाइन को ब्रॉडगेज बनाने का मुद्दा प्रमुख मुद्दों में शुमार है। पूर्व सांसद शांता कुमार इस मुद्दे पर कई वादे कर चुके हैं, लेकिन धरातल पर कुछ दिखता नहीं है, जिससे जनता में रोष है। इसी तरह कांगड़ा एयरपोर्ट का विस्तारीकरण भी कांगड़ा व चंबा घाटी के पर्यटन को पंख लगाने के लिए अहम मुद्दा है पर राजनीतिक दल लोस चुनावों में इस मुद्दे पर चुप्पी ही साधे हुए हैं।  चांमुडा-होली सुरंग भी सर्वे से कई भी आगे नहीं बढ़ पाई है।  शिक्षा से जुड़ा केंद्रीय विश्वविद्यालय अभी भी उधार के भवनों में ही चल रहा है।  इसी तरह चंबा में सीमेंट प्लांट का वादा भी अधर में ही है। राजनीतिक दल एक-दूसरे पर सड़क निर्माण सहित अन्य कार्याें में अड़गा अटकाने के आरोप-प्रत्यारोप लगाकर बचने का प्रयास तो करते हैं, पर रोजगार की तलाश में बैठी युवा पीढ़ी और उनके परिजन नेताओं से सीमेंट प्लांट लगाने के लिए समय सीमा तय करने की मांग कर रहे हैं। वादा पूरा न होने के चलते खासकर चंबा के लोग खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनेकों नई योजनाओं के बावजूद धरातल पर डाक्टरों की कमी सहित तकनीकी स्टाफ न होने के चलते ये योजनाएं भी फाइलों तक सिमटी हुई नजर आ रही हैं। इसके अलावा मंडी-पठानकोट फोरलेन का कार्य भी अधूरा होने के चलते जनता के मन में कई सवाल खड़े हैं। 

यहां होगी प्रत्याशियों की परीक्षा

धर्मशाला विधानसभा क्षेत्र में केंद्रीय विश्वविद्यालय, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट, रोप-वे, आईटी पार्क सहित स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़े मुद्दे प्रत्याशियों की परीक्षा लेगें। इसी तरह  गगल एयरपोर्ट व सड़कों व पेयजल सुविधाओं के सुधारीकरण के मुद्दे प्रत्याशियों की परीक्षा लेंगे।  चंबा के चुराह विधानसभा  क्षेत्र में सीमेंट प्लांट का मुद्दा नेताओं की परीक्षा लेगा। इसी तरह संसदीय क्षेत्र के अन्य क्षेत्रों में भी सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन और रोजगार से जड़े मुद्दे नेताओं की परीक्षा लेने वाले हैं।

पुराने लटके प्रोजेक्ट शुरू करने पर फोकस

भाजपा व कांग्रेस सहित चुनाव लड़ रहे करीब सभी नेता कांगड़ा-चंबा के लटके हुए प्रमुख प्रोजेक्टों को हल करने को प्राथमिकता बता रहे हैं। इसके अलावा पर्यटन विकास और शिक्षा व मूलभूत सुविधाएं मुहैया करवाने सहित जनता की आवाज को केंद्र में उठाने का दंभ भर रहे हैं। नेताओं के मैनिफेस्टो को देखें तो इसमें नई परियोजना लाने का विजन कम ही दिख रहा है। हालांकि व्यवस्था परिवर्तन के दावे कर प्रत्याशी मतदाताओं को रिझाने का प्रयास जरूर कर रहे हैं। कुलमिलाकर नेता ने फिर से जनता की अदालत में आ पहुंचे हैं।

मंडी संसदीय क्षेत्र

मंडी में जयराम और सुखराम ही सबसे बड़ा मुद्दा

पिछले लोकसभा चुनावों के परिणाम के बाद मंडी संसदीय क्षेत्र जहां पूरे देश में चर्चाओं में आया था। वहीं, इस बार लोकसभा चुनावों की शुरुआत के साथ ही मंडी संसदीय क्षेत्र की राजनीतिक गूंज दिल्ली से मुंबई तक सुनाई दे रही है।  यह संसदीय क्षेत्र जहां कई अजूबों से भरा हुआ है, वहीं मंडी सीट ने कई केंद्रीय मंत्री भी  दिए हैं, लेकिन आज भी  संसदीय क्षेत्र के कई ऐसे मुद्दे हैं, जो दशकों बाद भी अधूरे हैं। हालांकि इस बार मंडी में बदले राजनीतिक हालातों की वजह से यहां चुनाव विशेष कर मंडी जिला में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और पंडित सुखराम के बीच होकर रह गया है। भाजपा जहां मंडी से मुख्यमंत्री और छोटी काशी के स्वाभिमान को बड़ा मुद्दा बना कर चुनाव मैदान में उतरी हुई तो कांग्रेस पंडित सुखराम व पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह द्वारा करवाए गए विकास कार्यों और रामस्वरूप शर्मा के अधूरे वादों को अपना मुद्दा बनाए हुए है।

इन मुद्दों को ढाल बना रही भाजपा

मंडी संसदीय क्षेत्र में भाजपा ने राष्ट्रवाद और नरेंद्र मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनाने का मुद़्दा भी सबसे आगे रखा हुआ है।  इसके अलावा हवाई अड्डा, टनल निर्माण, लेह तक रेल लाइन, फोरलेन प्रभावित, चार गुना मुआवजा, नमक कारखाना, खस्ताहाल सड़कें, चिकित्सकों की कमी जैसे मुद्दे चुनाव में संसदीय क्षेत्र में गूंज रहे हैं।

यहां घिर रहे दोनों दल 

मंडी संसदीय क्षेत्र में विधानसभा स्तर पर भी कई ऐसी समस्याएं हैं, जो भाजपा-कांग्रेस पर भारी पड़ रही हैं। खराब सड़कें, चिकित्सकों की कमी, जंगली जानवरों की समस्या, बेसहारा पशु और प्राकृतिक आपदा जैसी समस्याओं पर लोग नेताओं से चुनाव में हिसाब मांग रहे हैं।

दशकों में एक कारखाना नहीं लगा सके नेता

मंडी संसदीय क्षेत्र में ऐसे बडे़ सारे मुद्दे व जनता की मांगें हैं, जिन्हें यहां के नेता दशकों में पूरा नहीं कर सके हैं।  पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और पंडित सुखराम केंद्र में मंत्री भी रहे हैं, लेकिन इसके बाद भी क्षेत्र के ऐसे कई मुद्दे हैं, जो आज भी अधूरे  हैं।   कृषि व बागबानी आधारित उद्योग लगाने का वादा भाजपा और कांग्रेस दोनों  दशकों से करते आए हैं, लेकिन  ऐसा उद्योग नहीं लग सका है। इस्पात मंत्री रहते हुए वीरभद्र सिंह यहां स्टील कारखाना लगाना चाहते थे। इसी तरह पंडित सुखराम ने रक्षा मंत्री रहते हुए  कारखाना लगाने की योजना बनाई थी, लेकिन   योजनाएं सिरे नहीं चढ़ सकीं।  जड़ी-बूटी आधारित लघु उद्योग लगाने के भी वादे पूरे नहीं हो सके हैं। क्षेत्र में हवाई अड्डा बनाने की दिशा में अब काम तो हुआ है, लेकिन यह मुद्दा भी वर्षों से हर चुनाव में गूंजता आ रहा है।  वाइन फैक्टरी की मांग भी पूरी नहीं हुई है।  इसी तरह से लाहुल क्षेत्र के आलू को लेकर की गई घोषणाएं भी अधूरी हैं। 

नेताओं के वादे

मंडी सीट से इस बार 17 प्रत्याशी चुनाव में हैं,  जिनके अपने-अपने वादे हैं। कोई प्रत्याशी मतदाताओं को 6 हजार रुपए महीने के देने की वकालत कर रहा है, तो कोई क्षेत्र को पर्यटन हब बनाने की बात कर रहा है। माकपा अधूरे विकास व भ्रष्टाचार पर लोगों के बीच में है, जबकि मुख्य दल भाजपा और कांग्रेस अपने-अपने घोषणा पत्रों के अलावा अलग से वादे लोेगोें के साथ कर रहे हैं। भाजपा प्रत्याशी रामस्वरूप शर्मा का कहना है कि वह केंद्र और प्रदेश में जयराम सरकार के सहयोग से मंडी संसदीय क्षेत्र को आदर्श क्षेत्र बनाना चाहते हैं, जिसमें प्रस्तावित रेल प्रोजेक्ट को तेज कर लेह रेल पहुंचाना, पर्यटन स्थलों को विकसित करना, अधूरे फोरलेन को शीघ्र बनवाना, जलौड़ी जोत व भू-भू जोत टनल निर्माण, स्वरोजगार की नई योजनाएं जैसे उनके लक्ष्य हैं,जबकि कांग्रेस इस चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दों के साथ ही स्थानीय अधूरे वादों को लेकर भाजपा को घेर रही है, जिसमें कृषि आधारित उद्योग, मंडी में हवाई अड्डा, जोगिंद्रनगर से लेह रेल लाइन, अधूरा फोरलेन, फोरलेन प्रभावितों को चार गुना मुआवजा, नमक कारखाना , ओल्ड पेंशन स्कीम  बहाली, कॉल सेंटर स्थापना, उद्योग लाना, आधारभूत ढांचा विकसित करना, बेरोजगारी  दूर करना और  स्वरोजगार के वादों को लेकर आश्रय शर्मा चुनाव मैदान में हैं।

हमीरपुर संसदीय क्षेत्र

फिर केंद्र सरकार की उपलब्धियां भुनाने की सियासी चाल

प्रदेश के चारों संसदीय क्षेत्रों में हमीरपुर सीट ऐसी है, जहां 23 वर्षों से भाजपा का प्रभुत्व है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी यहां जिन मुद्दों पर चुनाव लड़ रही है, वे कहीं न कहीं एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यहां से तीन बार सांसद रहे अनुराग ठाकुर जहां एक तरफ संसदीय क्षेत्र के लिए उनके कार्यकाल में मंजूर हुए बड़े शिक्षण और स्वास्थ्य संस्थानों, राष्ट्रीय राजमार्गों, फोरलेन, रेल और केंद्र के कार्यों को भुनाने में लगे हैं, वहीं कांग्रेस प्रत्याशी रामलाल ठाकुर संसदीय क्षेत्र लिए केंद्र से मंजूर हुए प्रोजेक्टों को जल्द से जल्द पूरा करवाना चाहती है, ताकि आमजन को उनका लाभ मिल सके। संसदीय स्तर पर कांग्रेस लोगों को न्याय योजना से जोड़ने की बात कर रही है तो ऊना और बिलासपुर के भाखड़ा विस्थापितों की समस्याओं को संसद तक पहुंचाना चाहती है। इसके अलावा संसदीय क्षेत्र में औद्योगिक इकाइयां लगवाने चाहती है, जिससे युवाओं के लिए रोजगार के अवसर खुल सकें। वहीं, बीजेपी की पिछली बार की तरह कांग्रेस भी इस बार गरीबों के खाते में सालाना 72-72 हजार रुपए जमा करवाने की बात कर रही है।

कांग्रेस इन मुद्दों पर लड़ रही चुनाव

हमीरपुर संसदीय क्षेत्र को बड़ी बहुदेशीय योजना से जोडऩा, जिससे रोजगार के अवसर खुलें। राष्ट्रीय राजमार्गों व फोरलेन को विससित करवाना।  ग्रामीण क्षेत्रों में 150 दिन का रोजगार हर आदमी को सुनिश्चित करवाना। भाखड़ा विस्थापितों की समस्याओं को संसद तक पहुंचाना।  रेलवे विस्तारीकरण योजना के क्रियान्वयन से हमीरपुर व बिलासपुर जिलों को जोड़ना। एम्स जैसे बड़े स्वास्थ्य संस्थान का निर्माण सीमित समय में करवाना। एनआईटी हमीरपुर की एक्सपेंशन करवा कर बहुदेशीय संस्थान बनवाना। हिमाचली उत्पादों का एक्सपोर्ट काउंसिल, भारत सरकार के माध्यम से गुणवत्ता के आधार पर विश्व भर में निर्यात संभव करवाना। पर्यटन की दृष्टि से भी इस संसदीय क्षेत्र को भारतीय पर्यटन विकास कारपोरेशन या पर्यटन मंत्रालय की केंद्रीय परियोजना के माध्यम से अमलीजामा पहनाना। संसदीय क्षेत्र के तहत आने वाले सभी जिलों में एक बहुउद्देशीय खेल परिसर के निर्माण का प्रयास करना। हर विधानसभा क्षेत्र के लिए सांसद करियर काउंसिलिंग कमेटी का गठन करना 24 घंटे युवाओं के मार्गदर्शन के लिए कार्य करेगी। साथ ही एक पुस्तकालय हर उपमंडल स्तर पर खोलना। स्थानीय कलाकारों को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने के अवसर प्रदान करना।

एक साल से बज रही रेलगाड़ी की सीटियां

हमीरपुर जिला की बात करें तो यहां एक साल से कांग्रेस रेलगाड़ी की सीटियां बजा रही है। कांग्रेस कहती है कि संसदीय क्षेत्र के मौजूदा सांसद ने जब दूसरा चुनाव लड़ा था तो कहा था कि वे अगले पांच वर्षों में हमीरपुर में रेल पहुंचा देंगे, लेकिन दूसरी क्या वे तीसरी बार भी सांसद बने लेकिन ट्रेन के सर्वे कागजों में ही करवाते रहे। धरातल पर कुछ नहीं हुआ। उधर, भाजपा का तर्क है कि इन कामों में वक्त लगता है कि इतनी जल्दी ऐसे काम नहीं होते। 

तीन बार के कार्यों पर चुनाव लड़ रही भाजपा

भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी अनुराग ठाकुर का फोकस अधिकतर केंद्र सरकार की उन नीतियों की ओर है, जिसमें जनकल्याण के अलावा देश सुरक्षा की बात कही जा रही है। मोदी सरकार के कार्यकाल में हुई सर्जिकल स्ट्राइल को ढाल बनाकर देश की जनता के अलावा पूर्व सैनिकों के वोट बैंक पर भाजपा की नजर है। किसान सम्मान निधि योजना द्वारा किसानों के खातों में आने वाली राशि चुनावों का मुद्दा बनी है।   मेडिकल और एजुकेशनल हब के रूप में विकसित करनाए एम्स हमीरपुर मेडिकल कालेज पीजीआई सेटेलाइट संस्थान एवं सेंट्रल यूनिवर्सिटी देहरा का  निर्माण कार्य शीघ्र शुरू करवाना, हाइड्रो इंजीनियरिंग कालेज ट्रिपल आईटी कालेज एवं सेंट्रल यूनिवसिंटी का निर्माण कार्य शीघ्र शुरू करवाना,  हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र को खेलों के हब के रूप में विकसित करना, हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र को विश्व के मानचित्र पर और अधिक उभारने के लिए काम करना, लोकसभा क्षेत्र में जो रेलवे लाइन स्वीकृत करवाई गई है,  उनका काम शुरू करवाना एवं नंगल-ऊना रेल लाइन को तलवाड़ा और मुकेरियां से मिलाने सहित कई वादे किए जा रहे हैं। 

शिमला संसदीय क्षेत्र

दशकों पुरानी योजनाओं से लोगों को रिझाने की तैयारी

शिमला संसदीय क्षेत्र में जिन मुद्दों पर सालों से बात हो रही हैं, वे अभी भी वैसे ही खड़े हैं। इस चुनाव में भी वही मुद्दे छाए हुए हैं, जो पहले थे।  शिमला संसदीय क्षेत्र की बात करें तो यहां पर सिरमौर जिला में गिरिपार को जनजातीय का दर्जा दिलाने का वादा काफी पुराना है।  इस बार भी इसी मुद्दे पर सिरमौर में बात की जा रही है। जहां भाजपा यह कह रही है कि उसके पूर्व सांसद ने इस तरफ खासे प्रयास किए और लोकसभा में भी इसे लेकर बात उठाई परंतु हुआ कुछ नहीं। अभी भी भाजपा यही कह रही है कि बस अगली बार केंद्र में मोदी सरकार बनी तो यह दर्जा जरूर मिलेगा। इसके साथ शिमला संसदीय क्षेत्र क्योकि बागवान बहुल एरिया है यहां पर पिछले चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वादा किया था कि हिमाचल के सेब को बड़ा मुकाम देने के लिए सेब पर आयात शुल्क को बढ़ाया जाए।  इससे विदेशी सेब पर यहां रोक लगती परंतु ऐसा नहीं हो सका।  इस बार भी इस आयात शुल्क को बढ़ाए जाने की बात कही जा रही है और राजनीतिक दल वादा कर रहे हैं। भाजपा भी इस मुद्दे पर बोल रही है तो कांग्रेस आरोप लगा रही है। सेब बागवानों   को इस पर रिझाने की कोशिशें हो रही हैं। शिमला संसदीय क्षेत्र में रेल विस्तारीकरण भी एक अहम मामला है। यहां पर सालों से रेल आगे नहीं बढ़ सकी।  बद्दी को रेल लाइन से जोड़ने के एक मामले में जरूर सफलता मिली है, लेकिन अभी इसमें जमीन का अधिग्रहण होना है। इसके चलते यह भी कब तक हो पाएगा, इसका कोई पता नहीं है। रेल विस्तारीकरण को लेकर यह भी वादा होता रहा है कि शिमला से आगे रेल को बढ़ाया जाएगा परंतु इस पर कोई कदम नहीं उठाया जा सका। इसी तरह से बड़ी रेल लाइन की बात भी होती रही, वहीं टूरिज्म सर्किल को डिवेलप करने का वादा भी यहां की जनता के साथ किया गया था। भाजपा के प्रत्याशी सुरेश कश्यप का कहना है कि उनकी पार्टी के सांसद ने पूरे संसदीय क्षेत्र के विकास को तरजीह दी है। कुछ अहम मुद्दे, जिनमें गिरिपार को जनजातीय का दर्जा दिलाना, सेब का आयात शुल्क बढ़ाना, फोरलेन को जल्द पूरा करवाना, रेल के विस्तारीकरण को प्रयास करना यह उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। कांग्रेस के प्रत्याशी डा.कर्नल धनी राम शांडिल का कहना है कि जो काम उनके कार्यकाल में हुए थे, भाजपा के सांसद ने उन्हें आगे नहीं बढ़ाया। यह सभी क्षेत्रों की जनता जानती है। गिरिपार के लिए वह प्रयास करते रहे हैं जो जारी रहेंगे वहीं सेब बागबानों के साथ भी न्याय करवाया जाएगा। पूरे क्षेत्र का एक समान विकास उनकी प्राथमिकता में है। शिमला संसदीय क्षेत्र में 12 लाख 59 हजार 085 कुल मतदाता प्रत्याशियों को चुनेंगे। इनमें  6 लाख 54 हजार 248 पुरुष, 6 लाख 4 हजार 822 महिला व 15 तृतीय लिंग मतदाता दर्ज हैं।

रिटेंशन पॉलिसी बढ़ाएगी टेंशन

शिमला के हजारों लोग रिटेंशन की टेंशन में हैं, जिनसे भी वादे कई बार हो चुके हैं मगर कोई भी पॉलिसी इनके हक में आज तक लागू नहीं हो सकी है।  शिमला तक फोरलेनिंग का काम अभी भी अधूरा है जिस पर सालों लग चुके हैं और टारगेट के मुताबिक काम नहीं हुआ वहीं हाटकोटी-ठियोग-रोहडू सड़क में भी कई तरह के पचड़े हैं। शिमला संसदीय क्षेत्र में भी कई एनएच बनाए जाने की घोषणा हुई है, जिस पर भी कदम आगे नहीं बढ़ पाए हैं, वहीं सड़कों की हालत खस्ता है।

फिर गूंजा गिरिपार का जनजातीय दर्जा, सेब का आयात शुल्क

इस संसदीय क्षेत्र के ये सभी मुद्दे इस चुनाव में भी मुद्दा ही बने हुए हैं। इन पर न तो मौजूदा सांसद ही कुछ कर पाए और न ही पूर्व सांसद ने ही कुछ किया। एक दफा फिर से इन दलों के प्रत्याशी जनता के बीच में हैं। सिरमौर में गिरिपार को जनजातीय का दर्जा दिलाने का अहम मुद्दा और ऊपरी शिमला में सेब आयात शुल्क बढ़ाने का मुद्दा प्रमुख है और इस चुनाव में भी यही मुद्दे प्रत्याशियों की परीक्षा लेने जा रहे हैं। इसके साथ सड़कों और क्षेत्र के विकास का मामला सभी विधानसभा क्षेत्रों में अहम है, जिन पर पूरे चुनाव में चर्चा हुई है और अब परीक्षा होगी।