Wednesday, August 21, 2019 03:52 AM

नए कश्मीर का उदय

डा. फारूख अब्दुल्ला की पत्नी लंदन की हैं। उनकी कोख से उमर अब्दुल्ला और सारा का जन्म हुआ। बेटा जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री बना। चूंकि बेटी ने राजस्थान के सचिन पायलट (मौजूदा उपमुख्यमंत्री) से शादी की थी, नतीजतन उन्हें 'कश्मीरी' होने के पैतृक अधिकारों से महरूम होना पड़ा। उमर ने भी गैर-कश्मीरी लड़की से विवाह किया था, लेकिन उन्हें कश्मीरियत के तमाम हकूक नसीब हुए। यह दीगर है कि उमर ने उन्हें तलाक दे दिया। अब एक आम कश्मीरी का संदर्भ...! एक कश्मीरी लड़की ने गैर-कश्मीरी सैन्य अफसर से शादी की। एक आतंकी हमले में वह 'शहीदÓ हो गए। उन दोनों की एक बेटी भी है। कश्मीरी होने के जो अधिकार और सुविधाएं उस कश्मीरी महिला को दिए जाने चाहिए थे, उनसे साफ इनकार कर दिया गया। आपसी पारिवारिक, सामाजिक और कानूनी रिश्तों में विसंगतियों के ऐसे असंख्य मामले हैं, जिन्हें इस सीमित जगह में लिखना असंभव है। चूंकि अनुच्छेद 370 से जुड़ा बिल राज्यसभा में अल्पमत के बावजूद पारित हो गया। बिल के समर्थन में 125 और विरोध में 61 वोट पड़े। लोकसभा में तो प्रचंड बहुमत के आधार पर इसका पारित होना लाजिमी है, लिहाजा बिल के कानूनन प्रभाव में आने के बाद सबसे पहला फलितार्थ यह होगा कि भारतीय संविधान के दायरे में जम्मू-कश्मीर भी होगा। इस आधार पर अनुच्छेद दो से पांच में दिए गए अधिकारों के तहत केंद्र सरकार इस पारित बिल के जरिए संशोधन करेगी। राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद संविधान संशोधन लागू हो जाएंगे। वहां के नागरिकों को सभी मौलिक अधिकार हासिल होंगे। महिलाओं और पुरुषों को समानता का मूल अधिकार मिलेगा। जाति, धर्म, मूल, वंश या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकेगा। मुख्यधारा  में शामिल होने का मौका मिलेगा। छुआछूत प्रभावी नहीं होगा। सभी को राज्य में अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार हासिल होगा। सारांश में यह भारतीय संविधान का सार्थक विस्तार होगा। उसके तहत कश्मीरी लड़की के गैर-कश्मीरी  से विवाह करने पर उसे पैतृक संपत्ति, जमीन-जायदाद से वंचित नहीं रखा जा सकेगा। इसकी सार्वजनिक घोषणा भी की जाए। अनुच्छेद 370 हटने के बाद सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले जम्मू-कश्मीर में भी मान्य होंगे। 370 वाले कश्मीर में सरकारें और सियासत इन राष्ट्रीय प्रतिष्ठानों को मान्यता ही नहीं देती थीं। अब जम्मू-कश्मीर का अपना  झंडा और संविधान नहीं होगा, बल्कि वहां भी 'तिरंगा' फहराया जाएगा। एक हिंदुस्तान, एक प्रधान, एक विधान, एक निशान का डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का स्वप्न प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने साकार किया है। अब जम्मू-कश्मीर में भी राष्ट्रीय ध्वज और प्रतीकों का अपमान करना 'अपराध' माना जाएगा। अब कश्मीर में एक ही नागरिकता होगी- भारतीय। वहां बसे हजारों शरणार्थियों की नागरिकता पर भी विचार किया जाएगा। अलबत्ता वे सरकारी शिक्षण संस्थानों में दाखिला ले सकेंगे, लेकिन अब पाकिस्तानी को कश्मीर में बसने का मौका नहीं दिया जाएगा। पहले यह होता था कि किसी कश्मीरी महिला के पाकिस्तानी से शादी करने पर पति को भी नागरिकता मिल जाती थी। नए कश्मीर में यह भी संभव होगा कि कश्मीर से बाहर शादी करने वाली लड़कियों के बच्चों को यहां संपत्ति में हक नहीं मिलता था, लेकिन अब ऐसे बच्चे हकदार होंगे। सबसे गौरतलब यह है कि कश्मीर से बाहर का कोई भी नागरिक अब यहां संपत्ति खरीद सकेगा, सरकारी नौकरी पाने का पात्र होगा, कश्मीर का वोटर या उम्मीदवार बनकर चुनाव में हिस्सा ले सकेगा। कोई भी भारतीय जम्मू-कश्मीर का नागरिक बन सकेगा। बहरहाल एक प्रयास देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल ने किया था कि 500 से अधिक रियासतों का विलय भारत में कराया। दूसरे गृह मंत्री 'छोटे पटेल'अमित शाह हैं, जिन्होंने आज कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाया है। इसकी प्रतिक्रियाएं क्या होंगी? क्या कश्मीर हिंसक होगा और आतंकवाद बढ़ेगा? फिलहाल ऐसी संभावनाएं कम हैं। उमर अब्दुल्ला और महबूबा को हिरासत में लेकर केंद्र सरकार ने दोनों क्षेत्रीय दलों की रीढ़ ही तोड़ दी है। आतंकवाद से मोर्चा लेने को करीब 80,000 सुरक्षा बलों के जवान और सेना तैनात है। वायुसेना तक को अलर्ट पर रखा गया है। पाकिस्तान की खीझ जाहिर है, तभी संयुक्त सत्र बुलाकर भारत के इस संवैधानिक परिवर्तन की निंदा की गई है, लेकिन हमारा देश झूम रहा है। ढोल-नगाड़े बज रहे हैं, पांव थिरक रहे हैं, मिठाइयां खिलाई जा रही हैं। टीवी चैनलों पर महिलाओं को भी नृत्य की मुद्रा में देखा गया। दरअसल यह 370 खत्म होने और नया, विकसित कश्मीर बनने की राष्ट्रीय प्रतिकियाएं हैं।