Monday, December 16, 2019 06:18 AM

नए मेडिकल कालेज बीमार

हिमाचल की सेहत संवारने वाले नए-नवेले चार मेडिकल कालेज खुद ग्लूकोज़ को तरस रहे हैं। आलम यह है कि तीन कालेजों को अभी तक छत मयस्सर नहीं। ऐसे में इन्फ्रास्ट्रक्चर का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। न तो यहां पढ़ाने वाले डाक्टर हैं और न ही प्रयोगशालाएं। फिर इन महाविद्यालयों में तैयार होने वाली डाक्टरों की पौध आगे चलकर प्रदेशवासियों की सेहत का किस तरह से ख्याल रखेगी, यह समझ से परे है। हालांकि नेरचौक मेडिकल कालेज के पास अपनी बिल्ंिडग और पर्याप्त सुविधाएं हैं, मगर दिक्कतें भी कई हैं। क्या है हिमाचल के चारों नए मेडिकल कालेजों का हाल...देखें इस बार का दखल...।

सूत्रधार - सूरत पुंडीर, दीपक शर्मा, आशीष भरमोरिया, सुरेंद्र ठाकुर

*  नए मेडिकल कालेजों में भी सुविधाएं कम दिक्कतें ज्यादा

*  कहीं मशीनें नहीं, जहां हैं, वहां स्टाफ की कमी

*  डाक्टरों की कमी के चलते मरीज भी परेशान

*  लैब में टेस्ट सुविधाएं न होने से लुट रहे लोग

*  प्रदेश सरकार के प्रयास भी नहीं ला पा रहे रंग

नाहन में न सिर ढकने को छत न छात्रों के लिए होस्टल

डा. यशवंत सिंह परमार मेडिकल कालेज एवं अस्पताल नाहन की हालत साढ़े तीन वर्ष बाद भी जस की तस है। कालेज में 130 प्रशिक्षु चिकित्सकों का चौथा बैच आरंभ हो चुका है। इससे पूर्व तीन बैच में 300 प्रशिक्षु पिछले तीन वर्ष से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे हैं। यानी कि कालेज में कुल 430 स्टूडेंट्स एमबीबीएस कर रहे हैं, परंतु कालेज प्रशासन के पास इतने छात्रों व अस्पताल के स्टाफ के लिए न तो सिर ढकने के लिए छत है और न  ही विद्यार्थियों के लिए होस्टल सुविधा। यहां तक कि आधुनिक आपरेशन थिएटर व लेक्चर थिएटर भी नहीं हैं। यह कालेज यह रिजनल अस्पताल के पुराने भवन में चल रहा है। करीब 200 से 300 के बीच मेडिकल कालेज के पैरा मेडिकल स्टॉफ व चिकित्सकों के अलावा फैकल्टी मेंबर के लिए भी न तो आवास की सुविधा है और न ही मरीजों को जांचने के लिए पर्याप्त कक्ष। कई बार तो हालत यह हो चुकी है कि चिकित्सकों में ही कक्ष के पीछे धक्का-मुक्की तक की नौबत आ गई थी। इसके अलावा विभिन्न विभागों के लिए कक्ष तक की सुविधा नहीं है। आपरेशन थियेटर भी पुराने ही चल रहे हैं। मेडिकल कालेज नाहन के करीब अढ़ाई सौ करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले बहुमंजिला अस्पताल व मेडिकल कालेज के भवन का टेंडर 26 जून, 2019 को दिल्ली की मैसर्स शापुरजी पालोनजी कंपनी को अवार्ड हो चुका है। कंपनी को दो वर्ष का लक्ष्य भवन पूरा करने को दिया गया है, जो 25 जून, 2021 तक तय किया गया है।

तीन हजार ओपीडी

डा. वाईएस परमार मेडिकल कालेज से पूर्व नाहन में रिजनल अस्पताल होता था। उस दौरान रिजनल अस्पताल की ओपीडी प्रतिदिन 500 से 600 के बीच थी। मेडिकल कालेज खुलने के बाद यहां पर गत तीन वर्षों में मरीजों का आंकड़ा करीब छह गुना बढ़ चुका है। वर्तमान की बात की जाए, तो यहां प्रतिदिन ओपीडी तीन हजार के आसपास पहुंच चुकी है।

स्टाफ बहुत कम

मेडिकल कालेज में करीब 300 से अधिक विभिन्न श्रेणियों के पद स्वीकृत हैं, दुर्भाग्य यह है कि अभी भी केवल मात्र 60 से 70 प्रतिशत पद ही भरे हुए हैं। शेष पद अभी खाली हैं। टीचिंग फैकल्टी की भी हालत यह है कि उन्हें ओपीडी के साथ एमजेंसी में भी सेवाएं देनी पड़ी हैं, आपरेशन भी करने पड़ रहे हैं तथा एमबीबीएस के प्रशिक्षु चिकित्सकों को पढ़ाना भी पड़ रहा है।

दो साल में भवन बनाने का लक्ष्य

डा. वाईएस परमार मेडिकल कालेज नाहन के अपने भवन का अढ़ाई सौ करोड़ से निर्माण शुरू हो गया है। कंपनी को दो वर्ष का लक्ष्य प्रदेश सरकार की ओर से दिया गया है। नए मेडिकल कालेज में नई व्यवस्था बनाने में समय लगता है। फिर भी नाहन में तमाम व्यवस्थाओं को सुचारू करने के हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं। यह सही है कि अभी विभिन्न श्रेणियों के काफी पद रिक्त हैं। खाली पदों को भरने के प्रयास किए जा रहे हैं।

डा. जयश्री शर्मा

प्रिंसीपल, मेडिकल कालेज, नाहन

चंबा में न डाक्टर; न  टेस्ट की  सुविधाएं, मरीज कहां जाएं

चंबा जिला की करीब साढे़ छह लाख की आबादी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के उद्देश्य से वर्ष 2016 में स्थापित पंडित जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कालेज को तीन वर्ष बाद भी अपना भवन नहीं मिल पाया है। सरोल में निर्मित होने वाले भवन की प्रक्रिया भूमि चयन से आगे नहीं बढ़ पाई है। इस कारण वर्तमान में मेडिकल कालेज का संचालन क्षेत्रीय अस्पताल परिसर और ऐतिहासिक अखंड चंडी पैलेस में किया जा रहा है, जबकि मेडिकल कालेज में एमबीबीएस के तीसरे बैच की पढ़ाई आरंभ हो चुकी है। कालेज चंबा में कुल 320 प्रशिक्षु एमबीबीएस कर रहे हैं। मेडिकल कालेज में जिला के विभिन्न हिस्सों से रोजाना हजारों की तादाद में मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं, मगर स्टाफ व सुविधाओं की कमी के चलते उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। हालात यह हैं कि हृदय घात, हेड इंजरी या बर्निग आदि के केस टांडा रैफर किए जा रहे हैं। यहां नेत्र रोग, स्त्री रोग और रोडियोलॉजिस्ट डिपार्टमेंट्स में चिकित्सकों की कमी भी मरीजों के मर्ज को दोगुना कर रही है। इसके अलावा अभी तक सीटी स्कैन व एमआरआई की सुविधा भी उपलब्ध नहीं हो पाई है।

*  वर्ष 2016 में स्थापित हुआ पंडित जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कालेज चंबा

*  तीन साल बाद भी अपना भवन नहीं मिल पाया, सिर्फ जमीन ही चुनी

*  कालेज में एमबीबीएस का तीसरा बैच, पढ़ रहे 320 छात्र

*  हृदयघात, हैड इंजरी या बर्निग के केस रैफर हो रहे टांडा

*  नेत्र, स्त्री रोग और रोडियोलॉजिस्ट डिपार्टमेंट्स में चिकित्सकों की कमी

*  सीटी स्कैन व एमआरआई की सुविधा अभी तक नहीं

151 में 64 पद खाली

मेडिकल कालेज में वर्तमान में क्लीनिकल व नॉन क्लीनिकल के कुल 151 पद स्वीकृत हैं। इसमें महज 87 पद ही भरे गए हैं, जबकि शेष 64 पद रिक्त चल रहे हैं। क्लीनिकल स्टाफ  की कमी है। हालांकि प्रबंधन रिक्त पदों को भरने के लिए लगातार साक्षात्कार कर रहा है। हां यहां नान क्लीनिकल स्टाफ की पोजीशीन संतोषजनक है। मेडिकल कालेज में रोजाना 1300 से 1500 मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं, मगर कई विशेषज्ञ चिकित्सक न होने से उन्हें मजबूरन निजी क्लीनिक या टांडा का रुख करना पड़ रहा है।

स्टाफ की तैनाती के प्रयास जारी

सरोल में निर्मित होने वाले भवन की ड्राइंग व मास्टर प्लान तैयार हो चुका है। जल्द ही टेंडर प्रक्रिया निपटने के साथ ही भवन निर्माण शुरू कर दिया जाएगा। कालेज में नॉन क्लीनिकल स्टाफ  की संख्या पर्याप्त है, मगर क्लीनिकल साइड में नेत्र रोग, स्त्री रोग विशेषज्ञ व रोडियोलॉजिस्ट डिपार्टमेंट में चिकित्सकों की कमी है। रिक्त पद भरने के लिए मेडिकल कालेज प्रबंधन की ओर से प्रयास जारी हैं

डा. पीके पुरी

प्रिंसीपल मेडिकल कालेज, चंबा

नेरचौक में भवन शानदार फिर भी दिक्कतें बेशुमार

लाल बहादुर शास्त्री आयुर्विज्ञान संस्थान एवं अस्पताल नेरचौक नए नवेले मेडिकल कालेजों में इकलौता ऐसा कालेज है, जिसके पास अपनी बिल्डिंग है। कालेज करीब 45 बीघा में फैला है और यहां उत्तर भारत के मेडिकल कालेजों में सबसे बेहतरीन इन्फ्रास्ट्रक्चर में से एक माना जाता है। वहीं यहां दिक्कतें भी बहुत हैं। कालेज की स्थापना 2012 में तत्कालीन केंद्रीय कामगार एवं रोजगार मंत्री आस्कर फर्नाडिस ने की थी। हालांकि मेडिकल कालेज का निर्माण ईएसआईसी ने किया था और इसका उद्घाटन 2014 में आचार संहिता लगने से चंद मिनट पहले किया गया। 2016 में ईएसआईसी ने इसे चलाने से इनकार कर दिया। 2017 में एमसी आई ने कालेज में पहले बैच के लिए अनुमति दी। बीस अक्तूबर, 2018 को नेरचौक मेडिकल कालेज में ओपीडी और आईपीडी (इनडोर पेशेंट डिपार्टमेंट) की शुरुआत की गई।

रूटीन टेस्ट नहीं

नेरचौक मेडिकल कालेज में ओपीडी की शुरुआत 20 अक्तूबर, 2018 को कर दी गई थी, लेकिन अभी तक रूटीन टेस्ट भी पूरी तरह से मेडिकल कालेज के अंदर नहीं हो पा रहे हैं। दरअसल यहां लैबोरेटरी ही तैयार नहीं है।

कालेज प्रबंधन नाकाम

मेडिकल कालेज के निर्माण में तकनीक का कितना बेहतरीन इस्तेमाल किया है। यहां मरीज के बैड से ही सभी टेस्ट सैंपल लैबोरेटरी तक पहुंचाने के साथ अन्य कई व्यवस्थाएं है, लेकिन कालेज प्रबंधन ये सुविधा शुरू ही नहीं कर पा रहा है।

एक एक्स-रे मशीन

कालेज में एक्स-रे की फिलहाल एक ही मशीन चल रही है। इसके अलावा मेडिकल कालेज के पास अल्ट्रासाउंड की तीन मशीनें हैं। ईसीजी की मशीनें तो सात हैं, लेकिन एक समय एक ही चलती है, क्योंकि टेक्नीशियन की कमी है।

टर्सरी केयर सेंटर

नेरचौक मेडिकल कालेज में 45 करोड़ की लागत से टर्सरी केयर सेंटर तैयार होगा। इसके लिए करीब 20 करोड़ रुपए कालेज प्रबंधन को मिल गए हैं। साथ ही केंद्रीय लोक निर्माण विभाग से बिल्डिंग के लिए एमओयू भी साइन कर लिया गया है।

मेडिकल कालेज में बेहतरीन  काम हो रहा है। कालेज अभी नया है, शुरुआत में दिक्कतें आती हैं। फिर भी जो कमियां हैं, उन्हें जल्द दूर किया जाएगा। सीटी स्कैन मशीन के लिए टेंडर प्रोसेस जारी है।

डा. रजनीश पठानिया, प्रिंसीपल, नेरचौक मेडिकल कालेज

भवन निर्माण के नाम पर नहीं लग पाई एक भी ईंट

डा. राधाकृष्णन मेडिकल कालेज हमीरपुर को लगभग डेढ़ साल में अपना भवन नसीब नहीं हो पाया है। जोल सप्पड़ में चिन्हित 168 कनाल भूमि पर बनने वाले मेडिकल कालेज के भवन निर्माण के नाम पर एक ईंट तक नहीं लगी है। मेडिकल कालेज के वर्तमान हालात बिलकुल भी संतोषजनक नहीं है। मेडिकल कालेज बनने के बाद यहां ओपीडी चार गुणा बढ़ गई, लेकिन जगह की कमी आज भी अखर रही है। कई बार तो एक ही ओपीडी में चार से पांच डाक्टर बैठे देखे जा सकते हैं। हमीरपुर मेडिकल कालेज में रोजाना यहां दो से अढ़ाई हजार की ओपीडी रहती है। मेडिकल कालेज में एंडोस्कोपी की सुविधा नहीं है। यहां पड़ी एंडोस्कोपी की मशीन काफी समय से धूल फांक रही है। एंडोस्कोपी के लिए बाहरी अस्पतालों का ही रुख करना पड़ता है। गर्भवती महिलाओं को भी प्लेटलेट्स कम होने की सूरत में सीधे टांडा रैफर किया जा रहा है। प्लेटलेट्स की कमी दूर करने वाली मशीन यहां उपलब्ध ही नहीं है। प्लेटलेट्स बनाने के लिए ब्लड का कंबीनेशन चाहिए होता है, जिसकी सुविधा यहां उपलब्ध नहीं है। हालांकि माना जा रहा है कि इस मशीन की डिमांड दी गई है। इसके अलावा भी अस्पताल में कई दिक्कतें हैं।

टीचिंग फैकल्टी कम

मेडिकल कालेज में टीचिंग फैकल्टी के पद भी रिक्त चल रहे हैं। एचओडी से लेकर असिस्टेंट प्रोफेसर तक के पद खाली पड़े हुए हैं। एमसीआई के निरीक्षण के दौरान अन्य मेडिकल कालेज से डाक्टर्ज बुला लिए जाते हैं। काम पूरा हो जाने के उपरांत उन्हें वापस भेज दिया जाता है। वर्तमान में करीब तीन दर्जन के करीब पद रिक्त हैं। एचओडी, एसोसिएट प्रोफेसर व असिस्टेंट प्रोफेसर के पद शामिल हैं, जो तीन दर्जन से अधिक है।

छात्रों के लिए जुगाड़

छात्रों के लिए भी मेडिकल कालेज में प्रबंध जुगाड़ से ही चल रहे हैं। छात्रों के लिए होस्टल की व्यवस्था नहीं है। किराए के भवनों में इनके रहने की प्रबंध किया गया है। मेडिकल कालेज के दूसरे बैच में 120 स्टूडेंट्स पढ़ाई कर रहे हैं। अभी तक मेडिकल कालेज की कोई बड़ी उपलब्धि सामने नहीं आई है।  फैकल्टी पूरी करने की कोशिश हो रही है। असिस्टेंट प्रोफेसर के एक दर्जन पदों के लिए आवेदन भी मांगे गए हैं।

अभी नया-नया कालेज है। कई तरह की चुनौतियां भी हैं, लेकिन प्रदेश सरकार के सहयोग से कालेज को आगे की ओर ले जाने के लिए प्रयास जारी हैं। इस बार कालेज में एमबीबीएस का दूसरा बैच बैठ चुका है। छात्रों को सुरक्षित माहौल मुहैया करवाया जा रहा है

डा. अनिल चौहान, प्रिंसीपल, मेडिकल कालेज हमीरपुर