नदियों के संगम प्रयाग

पंच प्रयाग तीर्थयात्रियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहे हैं। नदियों का संगम सनातन धर्म में बहुत ही पवित्र माना जाता है। जिन जगहों पर इनका संगम होता है, उन्हें प्रयाग कहा जाता है और इन्हें प्रमुख तीर्थ मानकर पूजा जाता है। आइए जानते हैं इनके महत्त्व के बारे में।

देवप्रयाग-  अलकनंदा और भागीरथी नदियों के संगम पर देवप्रयाग स्थित है। इसी संगम स्थल के बाद इस नदी को गंगा के नाम से जाना जाता है। गढ़वाल क्षेत्र में भागीरथी नदी को सास और अलकनंदा नदी को बहू कहा जाता है। भागीरथी के कोलाहल भरे आगमन और अलकनंदा के शांत रूप को देखकर ही इन्हें यह संज्ञा मिली है। देवप्रयाग में शिव मंदिर और रघुनाथ मंदिर हैं। देवप्रयाग में कौवे दिखाई नहीं देते, जो एक आश्चर्य की बात है। स्कंद पुराण के केदारखंड में इस तीर्थ का विस्तार से वर्णन मिलता है कि देव शर्मा नामक ब्राह्मण ने सतयुग में निराहार सूखे पत्ते चबाकर और एक पैर पर खड़े होकर एक हजार वर्षों तक तप किया और भगवान विष्णु के दर्शन कर वर प्राप्त किया। मान्यता के अनुसार भगीरथ के ही कठोर प्रयासों से गंगा धरती पर आने के लिए राजी हुई थीं और यहीं वह सबसे पहले प्रकट हुईं।

रुद्रप्रयाग- बद्रीनाथ से होकर आने वाली मंदाकिनी और अलकनंदा नदियों के संगम पर रुद्रप्रयाग स्थित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव के ‘रुद्र’ नाम पर इस स्थान का नाम रुद्रप्रयाग पड़ा। संगम स्थल के पास चामुंडा देवी और रुद्रनाथ मंदिर हैं। यह माना जाता कि यहीं पर ब्रह्माजी की आज्ञा से देवर्षि नारद ने हजारों वर्षों की तपस्या के बाद भगवान शंकर का साक्षात्कार कर सांगोपांग गांधर्व शास्त्र प्राप्त किया था। संगम से कुछ ऊपर भगवान शंकर का ‘रुद्रेश्वर’ नामक लिंग है, जिसके दर्शन पुण्यदायी बताए गए हैं। रुद्रनाथ मंदिर की शाम की आरती काफी प्रसिद्ध है। यहां लगभग तीन किमी. की दूरी पर कोटेश्वर महादेव मंदिर भी है।

कर्णप्रयाग- अलकनंदा और पिंडर नदियों के संगम पर कर्णप्रयाग स्थित है। कर्ण की तपस्थली होने के कारण ही इस स्थान का नाम कर्णप्रयाग पड़ा। माना जाता है कि यहीं पर कर्ण ने भगवान सूर्य की आराधना कर अभेद्य कवच-कुंडल प्राप्त किए थे। इस कारण यहां स्नान के बाद दान करने की परंपरा है। संगम से पश्चिम की ओर शिलाखंड के रूप में दानवीर कर्ण की तपस्थली और मंदिर है। कर्णप्रयाग में पिंडर नदी बागेश्वर स्थित पिंडारी ग्लेशियर से होकर यहां पहुंचती है।

नंदप्रयाग - नंदाकिनी और अलकनंदा नदियों के संगम पर नंदप्रयाग स्थित है। पौराणिक कथा के अनुसार यहां पर नंद महाराज ने भगवान नारायण को पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए तप किया था। यहां पर नंदादेवी का भी बड़ा सुंदर मंदिर है। नंदादेवी का मंदिर,नंद की तपस्थली और नंदाकिनी का संगम आदि योगों से इस स्थान का नाम नंदप्रयाग पड़ा। यहां पर भगवान लक्ष्मीनारायण और गोपाल जी के मंदिर भी दर्शनीय हैं। विष्णु प्रयाग-पंच प्रयागों में आखिरी प्रयाग विष्णु प्रयाग है, जो बद्रीनाथ से बिलकुल नजदीक है। यहां पर अलकनंदा और विष्णुगंगा नदी का मिलन होता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी स्थान पर नारद मुनि ने भगवान विष्णु की तपस्या की थी। इस स्थल पर भी भगवान विष्णु का मंदिर है। जिसका निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने करवाया था। स्कंदपुराण में इस तीर्थ का वर्णन विस्तार से किया गया है। यहां विष्णु गंगा में 5 और अलकनंदा में 5 कुंडों का वर्णन आया है। इस स्थल पर दाएं-बाएं दो पर्वत हैं, जिन्हें भगवान के द्वारपालों के रूप में जाना जाता है। दाएं में जय और बाएं में विजय है।