Saturday, August 08, 2020 05:27 AM

‘नन्हे फरिश्ते’ ने देखा आतंकवाद

यह पाकपरस्त आतंकवाद का बेहद बेरहम चेहरा है और अब यह एक सिलसिला बनता जा रहा है। मात्र तीन साल का मासूम बालक…! ऐसा बच्चा तो ‘नन्हा फरिश्ता’ या ‘ईश्वर का ही प्रतिरूप’ माना जाता रहा है। उस नन्हे मासूम के सामने उसके प्रिय नाना का छलनी शव और उस पर बिलख-बिलख कर बच्चे का रुदन…! उसे तो मौत और आतंकवाद के मायनों का ही एहसास नहीं, लेकिन इनसान के रूप में दरिंदे आतंकियों ने गोलियों की बौछार नहीं रोकी। ऐसी ही गोलीबारी का शिकार बच्चे के बुजुर्ग नाना हुए थे। न जाने किस अदृश्य शक्ति ने उस मासूम को बचा लिया और जवानों के रूप में सुरक्षा-कवच भेज दिया। टीवी चैनलों पर एक तस्वीर चलती रही, जिसमें दिखाया गया था कि बच्चा एक जवान की गोद में है। उस रणबांकुरे के फौलादी सीने और जांबाज कोशिश ने मासूम को बचा लिया। उसे वाहन में बिठाया और उसे बिस्कुट और चॉकलेट के बहाने ढेरों तसल्लियां दीं, लेकिन बच्चा सुबक-सुबक कर कहता रहा-मां के पास जाना है। रुदन और चीख में उसने अपने नाना को भी याद किया, लेकिन उसे क्या पता था कि बेरहम आतंकियों ने नाना को ‘लाश’ बना दिया है! लगभग ऐसी ही तस्वीर तब सामने आई थी, जब बीती 25 जून को कश्मीर घाटी में ही एक चार साला मासूम को मौत के घाट उतार दिया था। कमोबेश मौजूदा हादसे में बच्चे को हमारे जवानों ने बचा लिया। यही नहीं, कश्मीर में ही 12-14 साल के किशोर बच्चों को आतंकियों ने बंधक बनाया और फिर उनकी हत्या कर दी। ओफ्फ….यह कैसा आतंकवाद है! बहरहाल मौजूदा घटनाक्रम में जवान ने एक नन्ही जान बचाई और उसे मां तक पहुंचाया, लेकिन आतंकवाद की रक्तरंजित, खूनी वहशत उस ‘फरिश्ते’ की तीन साला आंखें और रुह देख और महसूस कर चुकी थीं। यह आतंकवाद कौन-सा जेहाद है? हत्याओं और हिंसा का यह दुष्चक्र कब तक जारी रहेगा? जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 और 35-ए से मुक्ति दिलाने के बावजूद आतंकवाद जिंदा है! कोई तो समाधान और रास्ता होगा? आतंकवादी दरिंदगी के जो भयावह और क्रूर बिंब उस नन्हे प्राणी के मानस पर छप गए हैं, उनके साथ बड़ा होते हुए वह सामान्य तौर पर कैसे जी पाएगा? उस बच्चे के नाना, कश्मीर के एक अदद नागरिक, जिनका आतंकवाद से कोई सरोकार नहीं, उन्हें मार कर आतंकियों ने कौन-सा जेहादी लक्ष्य हासिल कर लिया? इसी साल 2020 में 13 कश्मीरी नागरिक आतंकियों के ‘अंधे, वहशी’ जेहाद का शिकार हो चुके हैं। कश्मीर फिर भी जिंदा है और वह डरा नहीं है। पाकपरस्त आतंकवाद का तीन दशक पुराना खौफनाक खेल भी कश्मीरियों को भयभीत नहीं कर पाया है। वे आज भी ‘भारतीय’ हैं। भारत से दूर, पाकिस्तान की तरफ, पलायन नहीं हो सका है। कुछ ‘काली भेड़ें’ तो देश और समाज में होती ही हैं। हमारे जांबाज जवान भी ‘शहीद’ होते रहे हैं। मौजूदा हमले में भी सीआरपीएफ  के हेड कांसटेबल ‘शहीद’ हुए हैं, लेकिन कश्मीर को आतंकवाद से मुक्त कराने का जज्बा नहीं थका है। ‘ऑल आउट’ ऑपरेशन के तौर पर हमारी सेना और हमारे सुरक्षा बल इन धर्मांध और सिरफिरे जेहादियों का सफाया करते रहे हैं। वर्ष 2020 में ही अभी तक 135 आतंकियों को ढेर किया जा चुका है। कई कमांडर और सरगना आतंकी भी मारे जा चुके हैं। जून माह में ही 48 आतंकी मारे गए हैं। सवाल है कि आतंकवाद का यह पाकपरस्त सिलसिला कब और कैसे थमेगा? इस रूप में पाकिस्तान के आतंकी संगठनों, फौज और परोक्षतः हुकूमत की जीत प्रतीत होती है, क्योंकि आतंकवाद हमारे मासूम और निरीह वर्गों पर भी लगातार चोट करता रहा है। आखिर आतंकियों की कोई तो संख्या होगी! खबर आई है कि अब भी लश्कर, जैश, हिजबुल के 428 आतंकी सीमा पार कर कश्मीर में घुसपैठ करने को तैयार हैं। कश्मीर घाटी में भी कुछ नए आतंकियों की खेप सक्रिय कराई गई है। तो क्या इसी तरह आतंकी हमलों से हमारी ‘जन्नत’ लहूलुहान होती रहेगी? कमोबेश तीन साल के बालक से जुड़े आतंकवाद के मौजूदा अध्याय के बाद तो हमारे रणनीतिकारों को सोचने पर विवश होना पड़ेगा।

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