Monday, April 06, 2020 06:02 PM

नवीन शक्ति का संचार

स्वामी विवेकानंद

गतांक से आगे...

स्वामीजी ने इस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। दर्शनशास्त्र के अनेक विद्वान अध्यापक भी भाषण सुनने आए। 25 मार्च को यह भाषण हुआ था। बाद में छात्रों के अनुरोध पर इस भाषण को प्रकाशित करवा दिया गया। फिर न्यूयार्क लौटकर स्वामी जी ने वेदांत और योग की शिक्षा के लिए एक स्थायी केंद्र बनाने का संकल्प किया। उधर इंग्लैंड से बार-बार बुलावे आ रहे थे। यह लगभग निश्चित सा था कि स्वामी जी इंग्लैंड से भारत लौटेंगे। इस वजह से सोच समझकर यहां वेदांत सोसायटी की स्थापना की गई। श्री फ्रांसिस एच.लिगेट महोदय को इस सोसायटी का अध्यक्ष मनोनीत किया गया। भागिनी हरिदासी योग शिक्षिका नियुक्त हुई। स्वामी अभयानंद, योगानंद तथा कृपानंद और कुछ ब्रह्मचारियों को प्रचार कार्य के लिए नियुक्त किया गया। कुमारी मेरी फिलिप,श्रीमति आर्थर स्मिथ,श्रीवाल्टर गुडइयर तथा गायिका कुमारी एमा थर्सवी आदि समीति का कार्य संचालन देखने लगीं। स्वामी जी ने अपने गुरुभाई सारदानंद को भारत से इंग्लैंड शीघ्र ही पहुंचने के लिए खत लिखा। इंग्लैंड से सारदानंद जी को न्यूयार्क भेजने का वचन देकर 15 अप्रैल 1826 को स्वामी जी लंदन की तरफ प्रस्थान किया। पत्र मिलते ही स्वमी जी फौरन इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए और वहां स्टडीं महोदय के साथ रहते हुए स्वामी विवेकानंद जी की प्रतीक्षा करने लगे। इस बीच में वे वेदांत समति में धर्मोपदेश देने का कार्य करते रहे। इंग्लैंड पहुंचने पर दोनों गुरुभई एक दूसरे से मिलकर बहुत ज्यादा खुश हुए। स्वामी जी ने भारत में स्थित अपने शिष्यों और रामकृष्ण भक्तों का कुशल मंगल जानकर संतोष प्रकट किया। स्वामी विवेकानंद जी और स्वामी सारदानंद जी ने कु.मूलर और श्री स्टर्डी महोदय का अतिथ्य स्वीकार करते हुए,पूरे उत्साह के साथ प्रचार कार्य प्रारंभ कर दिया। स्वामी विवेकानंद जी के अमरीका लौट आने की वजह से यहां शिष्य मंडली में नवीन शक्ति का संचार हुआ। उनका सत्संग लाभ करने के लिए सभाओं में बड़ी संख्या में श्रोता आने लगे। समाचार पत्रों में आंधी लाने वाले इस हिंदू की फिर से चर्चा होने लगी। मई के महीने में आखिर में नियमित रूप से प्रशनोत्तर कक्षा और वेदांत योग शिक्षा का कार्यक्रम चालू हो गया। ज्ञानयोग के संबंध में एक भाषण माला भी प्रारंभ हुई। इस शृंखला में भक्तियोग, कर्मयोग और योगसाधना के संबंध में भी उन्होंने कुछ उत्कृष्ट व्याख्यान किए थे। विभिन्न गृहस्थों,क्लबों तथा सभा समितियों द्वारा उपदेश देने के लिए स्वामी जी को निमंत्रण आने लगे। श्रीमती ऐनी बेसेंट द्वारा आमंत्रित होकर स्वामी जी ने उनके भवन में भक्ति पर एक व्याख्यान दिया। खास तौर से आमंत्रित होकर स्वामी जी ऑक्सफोर्ड गए और वेद विद्या के आचार्य जगत विख्यात प्राध्यापक श्री मैक्समूलर से मिले थे। श्री मैक्समूलर श्री रामकृष्ण परमहंस से विशेष रूप से प्रभावित थे। इस संबंध में उन्होंने पत्रिका में लेख लिखा था। श्री केशवचंद्र ने रामकृष्ण परमहंस से प्रभावित होने के कारण अपने विचारों में यथेष्ट परिर्वतन किया था। इस बात की जानकारी श्री मैक्समूलर को थी।  इस घटना में श्री मैक्समूलर का और भी अधिक ध्यान श्री परमहंस जी की तरफ हुआ।