नशे के विरुद्ध समाज का दायित्व

जगदीश बाली

 स्वतंत्र लेखक

कई बार देखा गया है कि बच्चे घर से तो स्कूल आते हैं, परंतु विद्यालय नहीं पहुंचते। वे नशे का सेवन करने के लिए किसी सुनसान या टूटी-फूटी इमारतों का सहारा ले कर घंटों वहां पड़े रहते हैं। इसका पता न स्कूल को होता है न अभिभावकों को। अतः स्कूल प्रबंधन को अनिवार्य रूप से छात्रों की अनुपस्थिति की सूचना अभिभावकों को देनी चाहिए। उधर माता-पिता भी अपने बच्चों की दिन भर की गतिविधियों पर नजर रखें...

जिस चिराग से घर को रोशनी की थी उम्मीद, उसी चिराग को नशा गुल कर गया। ये दर्द उन मां-बाप का है जिनके जवान बेटे नशे के गर्त में डूब गए। नशे से ग्रस्त देवभूमि हिमाचल की तस्वीर भयावह है। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जब समाचार पत्रों व अन्य मीडिया हमें प्रदेश में नशे से जुड़ी तस्करी व वारदातों से रू-ब-रू न करवाते हों। कहीं नशे की खेप पकड़ी जा रही है, कहीं नशे में हत्या, कहीं आत्महत्या की जा रही है और कहीं नशे की चंद बूंदों व चंद कशों के लिए गुनाह किए जा रहे हैं। नशे की जब लत पड़ जाती है तो अक्ल का ठौर ठिकाना नहीं रहता। नशेडि़यों को ये भी सुध नहीं रहती कि ड्रग्ज लेने के लिए वे एक ही सीरिज का इस्तेमाल कर रहे हैं। नतीजा यह है कि अब एक ही सीरिज के इस्तेमाल से एचआईवी के कई मामले सामने आ रहे हैं।

ऊना में चार ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें पीडि़त एक ही सीरिज का इस्तेमाल करने से एचआईवी पाजिटिव हो गए। हिमाचल प्रदेश चरस के इस्तेमाल में देश में चौथे स्थान पर है। देवभूमि के लगभग 27 प्रतिशत युवा ड्रग्ज के आगोश में है। मदिरा, खैनी, गुटका तो आज आम बात हो ही गए है, परंतु अब चरस और चिट्टा तो प्रलय नृत्य कर रहे हैं। कुछ समय पहले चिट्टे के लिए नूरपुर क्षेत्र में घर के एक चिराग ने अपने ही घर में पचास हजार पर हाथ साफ कर लिए। पिता ने मजबूरन थाने में शिकायत कर दी। गगरेट में एक युवक ने चिट्टे के लिए अपने लैंटल का बढ़ा हुआ सरिया काट कर बेच डाला। इसी वर्ष जून में शिमला के बालूगंज के 27 वर्षीय युवक की इंदिरा गांधी चिकित्सा महाविद्यालय में नशे की अधिक मात्रा लेने से मृत्यु हो गई थी। इसी तरह के मामले शिमला के कृष्णा नगर और मल्याना क्षेत्रों से भी संज्ञान में आए हैं।

प्रदेश के विभिन्न भागों से चिट्टे की अधिक मात्रा लेने से मौत के मामले सामने आते ही रहते हैं। शिमला जिले के मतियाना के कलजार की घटना को कोई नहीं भूला होगा जब कालेज के तीन युवकों ने चरस पाने की खातिर वृद्ध दंपति को दराट से मौत के घाट उतार दिया था। तीनों युवक पहले से ही ड्रग्ज के नशे में थे। जब नशे से आत्महत्या, हत्या, चोरी व अन्य आपराधिक वारदातें आम होने लगें, तो यह उस समाज, प्रांत व राष्ट्र के भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। एनडीपीएस एक्ट के तहत होने वाले अपराध की राष्ट्रीय दर 2.8 प्रतिशत के मुकाबले प्रदेश की ये अपराध दर 7.7 प्रतिशत है। अब ड्रग्ज का जहर महाविद्यालयों से हो कर स्कूलों में पढ़ रहे मासूमों की रगों व सांसों तक पहुंच रहा है। निःसंदेह सरकार और कानून ड्रग्ज के विरुद्ध प्रयासरत है, परंतु यहां माता-पिता, अध्यापकों और कुल मिला कर समाज का दायित्त्व महत्त्वपूर्ण है। शादियों या अन्य समारोहों में सार्वजनिक रूप से मदिरापान करने वालों की काफी आवो भगत होती है। इसे अद्भुत चीज समझ कर हमारे काफी सारे बच्चे नशे की ओर आकृष्ट हो जाते हैं। इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। खासतौर पर स्कूलों में नशीले पदार्थों के सेवन पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है। जरा सोचिए अगर स्कूलों में पढ़ते मासूमों को नशे से नहीं बचाया गया, तो इन ज्ञान के मंदिरों से कैसे नागरिक पैदा होंगे और हमारे समाज का स्वरूप कैसा होगा। देखने में आता है कि स्कूलों के टॉयलेट्स में विद्यार्थी नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं। अतः इन जगहों के चारों ओर सीसीटीवी कैमरे तैनात किए जाने चाहिए। नशे में संलिप्त छात्रों की काउंसिलिंग होनी चाहिए और अगर वे नहीं सुधरते तो उन्हें किसी डिएडिक्शन कैंप में भेज देना चाहिए अन्यथा वह अपने साथ और अन्य बच्चों को भी इस गर्त में धकेल देगा।

कई बार देखा गया है कि बच्चे घर से तो स्कूल आते हैं, परंतु विद्यालय नहीं पहुंचते। वे नशे का सेवन करने के लिए किसी सुनसान या टूटी-फूटी इमारतों का सहारा ले कर घंटों वहां पड़े रहते हैं। इसका पता न स्कूल को होता है न अभिभावकों को। अतः स्कूल प्रबंधन को अनिवार्य रूप से छात्रों की अनुपस्थिति की सूचना अभिभावकों को देनी चाहिए। उधर माता-पिता को भी चाहिए कि अपने बच्चों की दिन भर की गतिविधियों पर नजर रखें। उसके बस्ते और जेबों को जरूर टटोलें। महाविद्यालयों व विद्यालयों की विभिन्न प्रतियोगिताओं के दौरान मादक पदार्थों के सेवन की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इन प्रतियोगिताओं के दौरान नशे के सेवन पर कड़ी नजर रखने की आवश्यकता है। ड्रग्ज की तस्करी के गोरखधंधे में स्थानीय युवा शामिल हो जाते हैं। इस अवैध कारोबार के खिलाफ हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा व उत्तराखंड की सरकारों को साझे तौर पर सजगता से काम करने की आवश्यकता है।

पुलिस विभाग नशा विरोधी अभियान चलाती रहती है, परंतु नशे के अजगर से पार पाने के लिए जन-सहयोग की आवश्यकता है। खेद का विषय है कि जिसे देश की शक्ति कहा जाता है, वह युवा नशे के गर्त की ओर बढ़ रहा है। जहां मां-बाप एक एक-एक पैसा जोड़ कर अपने बच्चों के भविष्य के सपने देखता हैं, वहीं नशे में डूबे हुए ये बच्चे नशे की एक एक बूंद से, ड्रग्ज की एक-एक सांस से, खैनी या जर्दे की एक-एक चुटकी से उन सपनों को ध्वस्त करने में लगे हैं। युवाओं को इस गर्त से बचाने के लिए बड़े-बुजुर्गों, माता-पिता व अध्यापकों को प्रयत्नशील रहना होगा।

वक्त रहते जाग जाइए। माता-पिता को घर में अपने बच्चों को समय दे कर ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिससे बच्चे नशे की ओर कदम न बढ़ाएं। मालूम नहीं कब नशा आप के घरों के चिराग को गुल कर आपके जीवन में अंधेरा कर जाए।