Monday, August 26, 2019 08:47 AM

नाकामयाब साबित होते हैंडपंप

सुखदेव सिंह

लेखक, नूरपुर से हैं

 

सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग और जिला परिषद कमेटी सदस्यों में आपसी तालमेल सही न होने की वजह से इस योजना के तहत लगने वाले हैंडपंप भी खूंटे बनकर रह गए हैं। दो दशकों से खूंटे बन चुके इन हैंडपंपों की तरफ किसी भी सरकार ने गौर करना सही नहीं समझा है। करोड़ों रुपए का बजट पाइपों के नाम पर जमीन के अंदर दफन होकर रह गया है, जिसका लोगों को कोई लाभ ही नहीं मिल पाया है। ऐसे में क्या इन हैंडपंपों की खुदाई गरीब लोगों को पानी की समस्या से निजात दिलाने को लेकर की गई हो, ऐसा लगता नहीं है। एक समय ऐसा भी था जब लोग पानी के लिए पैदल चलकर कुओं, बावडि़यों और झरनों में पहुंचते थे। यहां तक कि तालाबों का पानी भी लोग पीते रहे हैं...

हिमाचल प्रदेश सरकार अब पंचायतों में 14वें वेतन आयोग के तहत हैंडपंप लगाने जा रही है। एक बात समझ नहीं आती कि प्रदेश में खूंटे बन चुके हैंडपंपों के बारे में सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग और प्रदेश सरकार क्यों नहीं सोच रही है। ऐसे में नए हैंडपंप लगाए जाने का क्या औचित्य रह जाता है, समझ से परे है। हैंडपंपों का सही रखरखाव न होने की वजह से यह खूंटे बनकर रह गए हैं। हैंडपंपों की हालत लावारिसों की तरह है, जिनकी तरफ कोई भी ध्यान नहीं दिया जाता है। जनप्रतिनिधियों ने वोटबैंक की खातिर गांवों में चप्पे-चप्पे पर हैंडपंप लगाकर जनता के वोट हथियाने की लगातार कोशिश जारी रखी है। हैंडपंप ऐसी जगहों में भी आंखें बंद करके लगाए गए, जिनमें कभी पानी की एक भी बूंद नहीं निकली है। सार्वजनिक विकास को दरकिनार कर लोगों ने अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए गलत जगहों में हैंडपंप आईपीएच विभाग की मर्जी के खिलाफ लगाकर भी बजट की बर्बादी की है। कुछेक हैंडपंपों में इस कद्र मटमैला पानी निकलता है कि उससे अपनी प्यास बुझाना कोई भी स्वास्थ्य के लिहाज से सही नहीं समझता है। ऐसा भी माना गया है कि लगातार हैंडपंप का इस्तेमाल न किए जाने की वजह से ही उनमें मटमैला पानी निकलता है।

हैंडपंप की जमीन में दबाई जाने वाली पानी की पाइपों की गुणवत्ता सही न होने की वजह से भी ऐसी समस्या हो सकती है। जमीन में जलस्तर दिनोंदिन घटता जा रहा है, जिसके चलते जोलोजिस्ट की सही रिपोर्ट के बगैर कोई भी हैंडपंप लगाया जाना सही नहीं है। हिमाचल प्रदेश में करीब 80 प्रतिशत हैंडपंप खूंटे बनकर बाहरी पर्यटकों को सरकारों की लापरवाह कार्यप्रणाली से भी अवगत करवाते हैं। क्या ऐसे लगाए गए हैंडपंप जोलोजिस्ट की रिपोर्ट के अनुसार ही लगे, यह बड़ा सवाल है। अगर ऐसे हैंडपंप नियमों के अनुसार ही लगाए गए, तो उनमें पानी की बूंद तक न निकलना खेदजनक है। जन प्रतिनिधियों ने मशीन से हैंडपंप की खुदाई करने वाले ठेकेदारों को इस तरह सीधे लाभ पहुंचाने की कोशिश की है। उस बजट को खर्च करने का क्या लाभ, जिसका जनता को कोई लाभ ही नहीं मिल पा रहा हो। जनप्रतिनिधियों ने अपनी सरकारों के बजट को ही इस तरह गलत जगहों पर हैंडपंप लगाकर बर्बादी करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है। केंद्र सरकार किसानों की आर्थिकी सुधारने को लेकर उनकी हर मदद कर रही है। जल संरक्षण पर सरकारें करोड़ों रुपए आंखें बंद करके खर्च करती जा रही हैं। प्राकृतिक जल स्रोतों का अस्तित्व मिटने की कगार पर पहुंच चुका है। सरकारें तालाबों, बावडि़यों और कुओं के सही रखरखाव को लेकर करोड़ों रुपए खर्च करती जा रही हैं। सच बात तो यह कि करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद जल संरक्षण किए जाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। तालाबों की जमीनों पर लोगों ने अतिक्रमण करना शुरू कर रखा है, जिसके चलते वह सिकुड़ते जा रहे हैं। तालाबों के अतिक्रमण को लेकर भू-राजस्व विभाग की ओर से बनाई गई नाजायज मिसलों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है। तालाबों में सिवाय गंदगी के और कुछ भी देखने को नहीं मिलता है। तालाबों की खुदाई नियमों को ताक पर रखकर की जा रही है। पर्यावरण में जमीन-आसमान का अंतर आ गया है। पेड़ों की कमी लगातार होने से बारिशें भी बेमौसमी हो रही हैं। ऐसे में तालाबों में पानी एकत्रित किया जाना, दिन में सपने देखने समान लगता है। मनरेगा के तहत चैक डेमों, डंगों, नालियों पर सरकारें बजट खर्च करती जा रही हैं, मगर जब तक हम पर्यावरण की सुरक्षा करने में सफल नहीं हो जाते, तब तक जल संरक्षण की योजना कैसे साकार हो सकती है? सरकारों ने प्रदेश की जनता को सदैव जल उपलब्ध करवाने को लेकर कई योजनाएं शुरू की हैं, मगर सरकारी विभागों के कर्मचारियों में आपसी तालमेल न होने की वजह से भी ऐसी योजनाओं को सही समय पर अमलीजामा नहीं पहनाया जा रहा है। केंद्र सरकारों ने स्वजल धारा योजना के तहत लोगों को सबसिडी पर हैंडपंप लगाने की योजना शुरू की थी।

सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग और जिला परिषद कमेटी सदस्यों में आपसी तालमेल सही न होने की वजह से इस योजना के तहत लगने वाले हैंडपंप भी खूंटे बनकर रह गए हैं। दो दशकों से खूंटे बन चुके इन हैंडपंपों की तरफ किसी भी सरकार ने गौर करना सही नहीं समझा है। करोड़ों रुपए का बजट पाइपों के नाम पर जमीन के अंदर दफन होकर रह गया है, जिसका लोगों को कोई लाभ ही नहीं मिल पाया है। ऐसे में क्या इन हैंडपंपों की खुदाई गरीब लोगों को पानी की समस्या से निजात दिलाने को लेकर की गई हो, ऐसा लगता नहीं है। एक समय ऐसा भी था जब लोग पानी के लिए पैदल चलकर कुओं, बावडि़यों और झरनों में पहुंचते थे। यहां तक कि तालाबों का पानी भी लोग पीते रहे हैं।

पूरे गांव की प्यास एक ही नल से बुझती रही है। मौजूदा समय में लोगों के घरों में नलों की भरमार होने के बावजूद पानी को लेकर मारामारी चल रही है। कभी किसी व्यक्ति को यह कहते नहीं सुना जा सकता कि उसके घर में पानी की सप्लाई पर्याप्त मात्रा में आ रही है। अकसर पानी की समस्या का रोना लोगों की रोजमर्रा की आदत बनती जा रही है। जनता पानी समस्या को लेकर सरकार के समक्ष अपना दुखड़ा सुनाती है। विधायक और मंत्री बिना सोचे-समझे ऐसी जगहों में नलकूप, वाटर सप्लाई और हैंडपंप मंजूर करवा देते हैं, जहां पानी की कोई समस्या ही नहीं होती। लोगों ने हैंडपंपों को उखाड़कर वहां मकान और दुकानें तक बनाकर इनका अस्तित्व खत्म करने की कोशिश जारी रखी है। वर्षों से खराब पड़े हैंडपंपों से लोगों ने अपने मवेशी बांधकर खूंटे का काम लेना जारी रखा  है। कुछेक लोग हैंडपंपों पर बिजली की मोटर लगाकर उनसे पानी निकालकर लाभ भी उठा रहे हैं। प्रदेश सरकार को खूंटे बनते जा रहे हैंडपंपों के बारे में गौर करना चाहिए, ताकि खर्च किए गए बजट का जनता लाभ ले सके।