Thursday, December 12, 2019 03:03 PM

नागनी माता मंदिर

कांगड़ा जिला की देव भूमि वीर भूमि एवं ऋषि- मुनियों की तपोस्थली पर वर्ष भर मनाए जाने वाले असंख्य मेलों की शृंखला में सबसे लंबे समय अर्थात दो मास तक मनाए जाने वाला प्रदेश का एक मात्र मेला नागनी माता का है। इस मंदिर को छोटी नागनी माता मंदिर के नाम से भी जाना जाता है...

पठानकोट-मंडी राष्ट्रीय राजमार्ग पर हिमाचल-पंजाब की सीमा कंडवाल में स्थित नागनी माता मंदिर उत्तर भारत के लोगों की आस्था के प्रतीक का केंद्र बना हुआ है। हिमाचल के देवी -देवताओं की अपनी अलग ही कहानी है। यहां हर गांव में अपना एक देवता है। कांगड़ा जिला की देव भूमि वीर भूमि एवं ऋषि- मुनियों की तपोस्थली पर वर्ष भर मनाए जाने वाले असंख्य मेलों की शृंखला में सबसे लंबे समय अर्थात दो मास तक मनाए जाने वाला प्रदेश का एक मात्र मेला नागनी माता का है। इस मंदिर को छोटी नागनी माता मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। कथा के अनुसार 1922 ई. में गोरखा बाबा आए थे तथा उस समय घने जंगल से घिरे उक्त स्थान पर गोरखा बाबा ने कुटिया बनाकर तपस्या की। गोरखा बाबा ने यहां काफी सालों तक तपस्या की। काफी वर्षों के उपरांत गांववासियों ने तपस्या करते हुए गोरखा बाबा के माथे पर सुनहरी रंग की नागिन को बैठे देखा। गांववासियों ने तपस्या में लीन गोरखा बाबा को जगाया तथा इस बारे में पूछा तो गोरखा बाबा ने कहा कि जिस स्थान पर तपस्या की जा रही है वह स्थान नागनी माता का है, जिस कारण वह उक्त स्थान पर तपस्या करने के लिए आए हैं। उन्होंने कहा कि इस स्थान को नागनी माता के रूप में जाना जाएगा और इस स्थान की मिट्टी का लेप लगाने से सांप व बिच्छु के काटे सहित अन्य जहर विकारों से मुक्ति मिलेगी। मंदिर में हिमाचल के अलावा पंजाब से भी श्रद्धालुओं का हर माह खासकर शनिवार को यहां पर आना-जाना लगा रहता है। वर्षभर श्रद्धालु मंदिर में नतमस्तक होने के लिए आते हैं। मंदिर में मांगी हुई मन्नत के पूरा होने उपरांत श्रद्धालु मंदिर में ओरा (गेहूं-नमक)चढ़ाते हैं। मंदिर में सावन-भादों माह में हर शनिवार को मेले का आयोजन होता है, जिसमें भारी संख्या में दूरदराज से श्रद्धालु माता टेकने के लिए आते हैं। मेलों के दौरान मंदिर की शोभा देखने योग्य होती है। मंदिर के प्रांगण में शिवजी की विशाल मूर्ति देखने योग्य है। मंदिर के पुजारी अनुसार मंदिर में होने वाले मेलों के दौरान अंतिम मेले को विशाल भंडारे का आयोजन होता है। उन्होंने कहा कि मंदिर में माता के दर्शनों को आने वाली महिलाओं व पुरुषों के लिए अलग-अलग लाइनों की व्यवस्था की गई है। श्रद्धालुओं के ठहरने व लंगर की भी व्यवस्था की जाती है। इसी के साथ मंदिर की सीढि़यां चढ़ते ही हर एक गतिविधि पर नजर रखने के लिए सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं।