Monday, August 10, 2020 10:26 AM

नागरिकता का कोई धर्म नहीं

हमारे एक सम्मानित मुस्लिम दोस्त भारत सरकार के योजना आयोग में सलाहकार जैसे सुपर प्रथम श्रेणी के पद पर थे। सेवामुक्त होने के बाद वह बिहार सरकार के पॉवर रेगुलेटरी कमीशन के चेयरमैन रहे। बाद में तेलंगाना सरकार में भी इसी पद पर रह कर सेवामुक्त हुए। अब सरकार उन्हें 1.10 लाख रुपए माहवार की पेंशन दे रही है। देश के प्रथम और द्वितीय नागरिक के तौर पर भी मुस्लिम शख्स राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति रहे। मुस्लिम सांसदों और मंत्रियों की तो एक लंबी फेहरिस्त है। मुसलमान वैज्ञानिक, प्रोफेसर से लेकर अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी तक देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। क्या ऐसा संभव है कि एक मजहबी और भारतीय समुदाय के तौर पर मुसलमानों से भेदभाव किया जा सके या अतीत में ऐसा कभी किया गया हो? नागरिक संशोधन बिल के संदर्भ में जो चीख-चीख कर विरोध कर रहे हैं, संसद में ही बिल फाड़ दिया है और कल से देश भर में बिल फाड़ने और जलाने तथा आने वाले दिनों में अंजाम भुगतने की जो धमकियां दी जा रही हैं, कमोबेश वे नेतागण या कथित विद्वान यह तो स्पष्ट करें कि देश के मुसलमानों के कौन से अधिकार और अवसर छीने गए हैं? संविधान की मूल भावना के खिलाफ  इस बिल को बताया जा रहा है, लेकिन संविधान का उल्लंघन तो स्पष्ट करें। अनुच्छेद 14, 15, 16, 21 और 25 को गिनाना बंद करें, क्योंकि राजनेताओं और सांसदों को उनकी संवैधानिक व्याख्या की जानकारी ही नहीं है। बस, सभी उन अनुच्छेदों को दोहरा रहे हैं कि उनका उल्लंघन यह बिल करता है। गृहमंत्री अमित शाह ने विपक्ष की ओर चुनौती फेंकी है कि वह साबित कर दे कि बिल संविधान, मौलिक अधिकारों और भारतीय मुसलमानों के खिलाफ  है, तो वह संसद से बिल ही वापस ले लेंगे। दरअसल ऐसा क्या हो रहा है, जिसके खिलाफ  एक खास जमात को भड़काया, उकसाया जा रहा है और देश विभिन्न विरोध-प्रदर्शनों और आंदोलनों की दहलीज पर आ खड़ा हुआ है? नागरिकता कोई नया मुद्दा नहीं है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम लियाकत अली खान ने आपस में करार किया था कि वे अपने-अपने देश के अल्पसंख्यकों की पूरी हिफाजत करेंगे। नेहरू ने भारतीय मुसलमानों के लिए बहुत कुछ किया और नागरिकता उन्हें दी जाती रही, जो 11 साल भारत में रहे हों। पाकिस्तान से मनमोहन सिंह और लालकृष्ण आडवाणी सरीखी हस्तियां भी भारत आईं और नागरिकता ली। वे क्रमशः प्रधानमंत्री और उपप्रधानमंत्री बने। 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने कालखंड के दौरान लाखों बांग्लादेशियों को भारत की नागरिकता दी थी। जाहिर है कि उनकी जड़ें भारत में ही रही होंगी! वर्ष 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने संसद में ही यह विचार रखा था कि जो अभागे, पीडि़त, प्रताडि़त भारत मूल के हिन्दू हैं, उन्हें देश की नागरिकता दी जाए। उन्हीं की कैबिनेट में ई.अहमद विदेश राज्यमंत्री थे। यदि 2005 से 2013 तक उनके संसद में दिए गए बयानों और बहस के जवाबों को संसदीय रिकार्ड से निकाल कर पढ़ा जाए, तो साफ हो जाएगा कि वह विदेश में बसे हिंदुओं को नागरिकता देने के कितने बड़े पैरोकार थे। एक ही दृष्टिकोण था कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में जिन हिंदुओं को प्रताडि़त किया जाता रहा है, उन पर रोजाना अत्याचार किए जाते हैं, उनका बलात धर्म-परिवर्तन कराया जाता है, कमोबेश उन्हें भारत में शरण दी जाए और नागरिकता प्रदान की जाए। उसी सिलसिले को अब आगे बढ़ाया जा रहा है, तो यह विभाजनकारी कैसे हो गया? भारत ने युगांडा से प्रताडि़त हिंदुओं को मुक्त करा शरणार्थी बनाया और फिर नागरिक भी बनाया। कांग्रेस वाले नेता या तो इन तथ्यों को नहीं जानते अथवा जानबूझ कर विस्मृत कर रहे हैं। दरअसल हिंदुओं को धार्मिक प्रताड़ना के आधार पर कोई भी देश नागरिकता देने को तैयार नहीं है। अलबत्ता उन्हें ‘राजनीतिक शरण’ जरूर दी जा सकती है। हमारे मूल भाई-बांधव हिंदू, सिख-ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी आखिर कहां जाएं? यदि इन समुदायों को यूं ही मरने-कटने को छोड़ दिया जाता है, तो फिर भारत की ताकत सवालिया हो जाएगी। यदि इन समुदायों के लोगों को विधिवत नागरिकता दी जाती है, तो उससे मुसलमान कहां प्रभावित होते हैं? संसद में बिल पेश किया गया है। उसके एक-एक बिंदु पर विमर्श करें। गृहमंत्री के जवाब सुनें। दलीलें साझा की जाएं। उसके बाद ही निष्कर्ष पर देश का अभिमत बनने दें। पूर्वाग्रहों से लोकतंत्र नहीं चला करता। बेशक मुसलमानों के डर खत्म किए जाने चाहिए, क्योंकि मौजूदा सरकार उनकी भी अभिभावक है, लेकिन इस पर हिंदू-मुसलमान और वोट बैंक की राजनीति नहीं की जानी चाहिए। उससे किसी भी पक्ष को कुछ भी हासिल नहीं होगा।