Saturday, January 25, 2020 11:31 PM

नागरिकता के सवाल पर

11 दिसंबर, 2019 की तारीख भारत के इतिहास में भी दर्ज हो गई और मोदी सरकार की एक और ऐतिहासिक कामयाबी की भी साक्ष्य बन गई। नागरिक बिल पर संसद की आखिरी मुहर भी छप गई। अब कानून बनना महज एक औपचारिकता है। इस विषय पर देश के विभिन्न सवालों और आशंकाओं के जवाब भी गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में दे दिए हैं। किसी सामान्य जनसभा या मंच पर भाषण देने और संसद के भीतर कथन में गहरे अंतर होते हैं। कमोबेश एक मंत्री तथ्यों के परे कोई बयान नहीं दे सकता, क्योंकि उस स्थिति में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव रखा जा सकता है। मंत्री की कुर्सी और सांसदी भी जा सकती है, लिहाजा अब देश के उबलते, आक्रोशित और हिंसक तबके को आश्वस्त होकर शांत हो जाना चाहिए। अब यह भी स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के ही धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता क्यों दी जाएगी? श्रीलंका, भूटान और म्यांमार के मूल भारतीय समुदायों को फिलहाल क्यों बाहर रखा गया है? विदेशों में बसे मुसलमानों को भी प्राकृतिक तौर पर नागरिकता कैसे मिल सकती है? तसलीमा नसरीन और अदनान सामी की ही तरह 566 मुसलमानों ने मोदी सरकार के दौरान ही भारत की नागरिकता हासिल की है, लेकिन एक घोर संवेदनशील विषय संसद में बहस के दौरान सम्यक रूप से संबोधित नहीं किया जा सका। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदू महासभा का न तो कभी राजनीतिक वर्चस्व रहा और न ही प्रशासन में हस्तक्षेप रहा। देश की आजादी में भी उसकी निर्णायक और जिम्मेदार भूमिका नहीं थी। महात्मा गांधी और कांग्रेस के इर्द-गिर्द आजादी का आंदोलन केंद्रित रहा। यदि सावरकर ने यह थ्योरी दी थी, तो गांधी और कांग्रेस ने उसे स्वीकार क्यों किया? उस दौर में बंबई में मुहम्मद अली जिन्ना के घर पर गांधी, नेहरू और राजगोपालाचारी सरीखे कद्दावर कांग्रेस नेता क्या करने गए थे। कई दिनों तक जिन्ना की गुहार क्यों करते रहे? गौरतलब है कि गांधी भारत के विभाजन के पक्ष में नहीं थे और जिन्ना मजहब के आधार पर मुसलमानों के लिए अलग देश चाहते थे-पाकिस्तान। यानी भारत के दो टुकड़े...! ‘मुस्लिम लीग’ के अधिवेशन में भी अलग देश का प्रस्ताव किसने रखा था? 1946 में ‘डायरेक्ट एक्शन’ का आह्वान किसने किया था?  नतीजतन ग्रेट कलकत्ता के तहत नोआखली इलाके में भीषण दंगे-फसाद हुए थे, हिंदुओं को निशाना बनाकर मारा-पीटा गया था। उस भयानक हिंसा में अंग्रेज और मुसलमान को खरोंच तक भी नहीं आई थी। गांधी ने वहां जाकर अनशन किया था, लेकिन हिंसा तभी थमी, जब सिद्धांत रूप में पाकिस्तान का निर्माण मान लिया गया। भारत का एक बाजू कट गया। क्या अब मुसलमानों को दोबारा नागरिकता देकर पाकिस्तान को ही भारत की तरफ  लाने की कोशिश है, ताकि तनाव हमेशा ही बरकरार रहे? उस दौर में गांधी ने यह भी कहा था कि पाकिस्तान में रह रहे हिंदू, सिख कभी भी भारत में आकर बस सकते हैं। गांधी ने मुसलमानों के भारत आने या लाने की बात नहीं कही थी। यदि भारत और उसका राजनीतिक नेतृत्व राष्ट्रपिता गांधी का सम्मान करता है, तो मुस्लिम-मुस्लिम चिल्लाना बंद करें। औसत मुसलमान न तो डरा हुआ है और न ही नागरिकता बिल को लेकर चिंतित है, बल्कि कांग्रेस सरीखे दलों को कोस रहा है, जिन्होंने मुसलमान को असहाय, अनपढ़ और गरीब बनाकर रखा। हमने जो ऐतिहासिक ब्यौरा दिया है, वह इतिहास में दर्ज है और उस पर कई किताबें भी लिखी जा चुकी हैं। इससे साफ हो जाना चाहिए कि द्वि-राष्ट्र का सिद्धांत किसका था और उसकी परिणति क्या हुई? इसी आधार पर एक बार फिर इतिहास लेखन की प्रक्रिया शुरू हुई है और प्रताडि़त मूल भारतीय जमात का भारत में बसने का रास्ता साफ  हुआ है। भारतीय मुसलमान उस प्रक्रिया से बिल्कुल अछूता है।