Wednesday, September 18, 2019 05:05 PM

नाम दान से भली पोलियो की दो बूंदें

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

दुनिया के झमेलों से तंग आ चुके पंडित जॉन अली अध्यात्म के पथ पर अग्रसर होना चाहते थे, लेकिन हर मजहब की चौखट पर माथा रगड़ने के बाद उन्हें हर पंथ-आश्रम की गतिविधियां संसद की उस कार्यवाही की तरह लगतीं, जिसमें घंटों बहस-मुहासबे के बावजूद कुछ हासिल नहीं होता। उन्हें हर गुरू उस विपक्षी नेता की तरह लगता, जिसकी नजर तो कुर्सी पर हो, लेकिन पता नहीं कि उसे हासिल करने के लिए क्या करना है और जो कुछ पूछने पर केवल अंड-बंड बोले। एक सायं एक धार्मिक चैनल पर चल रहे प्रवचन में वह बाबा घासपाल के क्रांतिकारी विचारों से इतने मुतासिर हुए कि प्रसारित विज्ञापन में दिए गए उनके आश्रम दूरभाष पर संपर्क साध लिया। घासपाल आश्रम के एक परम भक्त ने उन्हें एक माह तक गुरुजी के प्रवचनों को सुनने के बाद संपर्क करने की ताकीद की। लेकिन पंडित एक हफ्ते में उनके प्रवचनों से आजिज आ गए। बाबा अपने प्रवचनों में अन्य पंथों की धज्जियां तो उड़ाते, लेकिन सार तत्त्व को जानने की कोई तरकीब नहीं बताते। उन्होंने आठवें दिन फोन कर शिकायत भरे लहजांे में कहा कि जगद्गुरू प्रवचनों में केवल दूसरांे की आलोचना करते हैं। जबकि समत्व को प्राप्त प्राणी किसी की आलोचना नहीं करता। इतना सुनते ही बाबा के भक्त नाराज होते हुए बोले, ‘‘भक्तजी, आप मुझे महामूर्ख-नासमझ प्राणी लगते हैं। आप उस जगद्गुरू के बारे में अनाप-शनाप बोल रहे हैं, जो सार नाम को प्राप्त है। पहले गीता पर उनकी टीका पढ़ो-समझो। तुहें वीपीपी से पुस्तकें भेज रहा हंू। मूल्य चुका देना।’’ खुद को नासमझ कहे जाने पर पंडित अंदर तक खिन्नता से भर गए। लेकिन एक महीने के भीतर खबरें आने लगीं कि बाबा घासपाल के भक्तों ने कुछ माह पहले एक अन्य पंथ के जिन अनुयायियों से अपने पंथ की श्रेष्ठता के मुद्दे पर मार-पीट की थी, उनमें से एक की मौत हो गई है। इस मामले में कोर्ट में बाबा घासपाल की गवाही थी। लेकिन कोर्ट में गवाही को उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया। अब गैर-जमानती वारंट जारी होने पर कभी भी उनकी गिरफ्तारी संभव थी। समाचार सुनते ही उनका दिल फिरकी लेने को बेचैन हो उठा। आश्रम फोन कर उन्होंने परम शिष्य से पूछा कि अब मुझे नाम दान कैसे मिलेगा? भक्त ने बताया कि सारी प्रक्रिया में छह महीने लगेंगे। पहले सीडी के माध्यम से बाबाजी के प्रवचनों को समझना होगा। फिर मंत्र जाप से शक्ति स्थिति तक पहुंचने के बाद बाबाजी जब भी कोर्ट में पेश होंगे, उन्हें कोर्ट के बाहर शिष्य समूह के साथ उनका आशीर्वाद लेना होगा। तत्पश्चात उन्हें बाबाजी का कोई भी परम शिष्य नाम दान दे देगा। लेकिन एक गैर-हाजिरी नाम दान को खंडित कर देगी। पंडित छूटते ही बोले, ‘‘सरकार बच्चों को पोलियो जैसी खतरनाक बीमारी से बचाने के लिए दो बंूदे जिंदगी की पिलाती है और वे आजीवन इससे छुटकारा पा जाते हैं। लेकिन जगद्गुरू का मंत्र तो इतने आशीर्वाद के बावजूद खंडित हो जाता है। लगता है, बाबा हर पेशी के समय अपना शक्ति प्रदर्शन चाहते हैं। क्या उन्हें भगवान पर भरोसा नहीं? भगवान भजन आश्रम में किया चाहे जेल में, महत्त्व तो वही रहेगा। लगता है जगद्गुरू का नाम दान भी खंडित हो चुका है, जो दुनियावी झमेलों में उलझ गए। इस वक्त तो उन्हें स्वयं नाम दान की जरूरत है, इससे पहले वह कुछ और बोलते, दूसरी ओर से फोन कट चुका था।