Wednesday, October 16, 2019 02:00 AM

नासिर का व्यक्तित्व जस्टिस बेग को भी भाया था…

सौंदर्य के क्षेत्र में शहनाज हुसैन एक बड़ी शख्सियत हैं। सौंदर्य के भीतर उनके जीवन संघर्ष की एक लंबी गाथा है। हर किसी के लिए प्रेरणा का काम करने वाला उनका जीवन-वृत्त वास्तव में खुद को संवारने की यात्रा सरीखा भी है। शहनाज हुसैन की बेटी नीलोफर करीमबॉय ने अपनी मां को समर्पित करते हुए जो किताब ‘शहनाज हुसैन : एक खूबसूरत जिंदगी’ में लिखा है, उसे हम यहां शृंखलाबद्ध कर रहे हैं। पेश है सताइसवीं किस्त...

-गतांक से आगे...

नासिर मुस्कुराया इस उम्मीद में कि शायद वह भी मुस्कुराएंगी, लेकिन वह अभी भी हैरान लग रही थीं। उनका हाथ खुला, और कंचे अचानक कंक्रीट के फर्श पर फिसल गए। उनकी आवाज इतनी तेज हुई जैसे कुछ दुर्घटना हो गई हो। ‘शहनाज’, सईदा बेगम नवयुवक के पीछे खड़ी थीं। ‘अंदर जाओ, अभी।’ हैरान वल्ली अपनी मां के लहजे से कुछ समझ गया था और जल्दी से अपने मेहमान को लेकर बैठक में चला गया। आगे की मुलाकात में नासिर कटा सा रहा, उनकी आंखें दरवाजे पर ही थीं कि शायद वह शहनाज की एक और झलक पा सकें, लेकिन वह शायद जाकर घर के किसी कोने में छिप गई थीं। जब मेहमान जाने के लिए उठे, बेग उन्हें गाड़ी में बिठाने के लिए बाहर तक गए। ‘आशा करता हूं यह मुलाकात एक लंबी रिश्तेदारी की शुरुआत हो’, मि. हुसैन ने कहा। जस्टिस बेग गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुए मुस्कुराए, लेकिन वह कुछ बोल नहीं सके। मिसेज बेग अपनी बेटी की ऐसी बेशर्मी की वजह से बहुत परेशान थीं। ‘तुम्हें बरामदे में आने की क्या जरूरत थी, जबकि पहले से ही बताया गया था कि घर पर मेहमान आ रहे हैं?’ उन्होंने पूछा। ‘तुम्हें कोई शर्म नहीं है, तुम बिल्कुल काबू में नहीं हो। मुझे लगता है कि अब हमें तुम्हारा निकाह कर ही देना चाहिए।’ ‘किससे?’ शहनाज ने उत्सुकता से एक ओर सिर झुकाते हुए पूछा। ‘उसी लड़के से जो आज आया था। तुम भागी-भागी आई और उसे अपना रूप दिखाया, नहीं क्या? वह तुमसे निकाह करना चाहता है।’ ‘निकाह मुझसे?’ उन्होंने हैरानी से पूछा। ‘हां तुमसे। उसे पता ही नहीं है कि तुम कितनी गंवार हो।’ जब शहनाज बरामदे में खड़े लड़के के बारे में सोचने लगी, तो मां की फटकार भी उनके कानों तक नहीं पहुंच पाई। किसी अनजानी सी भावना से वह मुस्कुराईं, हालांकि तब तक उन्हें नहीं पता था कि वह भावना क्या थी। उस शाम, जस्टिस बेग और उनकी बेगम आम दिनों की तरह ही शाम को चाय पीने बैठे और पूरे दिन और अपने खास मेहमानों के बारे में बात करने लगे। यह तो साफ था कि नासिर का व्यक्तित्व जस्टिस बेग को भी भाया था, इतना कि उन्हें अफसोस हो रहा था कि इस समय शहनाज निकाह के लिए तैयार नहीं थी। ‘लड़का तो बहुत हैंडसम है, लेकिन हां शहनाज अभी बहुत छोटी है। तुमने ध्यान दिया था कि वह कितने अदब से हमसे मिला था? और क्या संयोग है कि मेरा और उसका नाम भी एक सा ही है। बहुत ही नम्र, संस्कारी, पढ़ा-लिखा लड़का है, लेकिन मैं शहनाज को स्कूल छोड़कर 14 साल की उम्र में निकाह करने की इजाजत नहीं दूंगा।’