Tuesday, September 17, 2019 02:19 PM

नाहन शहर में मुहर्रम पर निकाले ताजिए

मुस्लिम समुदाय ने याद की ईमाम हुसैन की कुर्बानी, शहर में चार स्थानों से निकाले गए ताजिए

नाहन -रियासतकालीन दौर से ही चली आ रही रिवायत मुहर्रम की ताजिए निकालने की रस्म को नाहन शहर में इस गम माह के पहले दिन मुस्लिम समुदाय ने पूरा किया। मंगलवार को नाहन शहर में मुस्लिम समुदाय के सुन्नी समुदाय ने शहर भर में चार स्थानों से ताजिए निकाले तथा गम माह मंे बुजुर्गों को कब्रों में जाकर याद किया गया। वहीं मुहर्रम पर अत्याचारी मुस्लिम शासक बगदाद के द्वारा धोखे से शहीद किए गए ईमाम हुसैन की कुर्बानी को याद किया गया। ऑल हिमाचल मुस्लिम वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष नसीम मोहम्मद दीदान ने बताया कि मुहर्रम समुदाय के लिए खुशी का उत्सव का त्योहार नहीं, बल्कि गम का माह है। नाहन शहर में रियासत काल से ही मुस्लिम समुदाय के लोग इस गम माह में मुहर्रम को ताजिए निकालते हैं जो कि आज भी रिवायत यहां के सुन्नी मुसलमानों द्वारा निभाई जा रही है। उन्होंने बताया कि जबकि इस रिवायत को शिया समुदाय ही निभाते हैं, मगर नाहन में सर्व धर्म के तहत मिल-जुलकर रहने की परंपरा रही है तथा शहर में एक भी परिवार शिया मुस्लिम का नहीं है। लिहाजा यह परंपरा सुन्नी समुदाय ही निभा रहा है। उन्होंने बताया कि ताजिए मस्जिद की एक गुंबदनुमा लकड़ी की आकृति होती है जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर सफर करवाया जाता है। वहीं मंगलवार को मुहर्रम की शुरुआत गुन्नूघाट से पहले ताजिए को उठाकर की गई जोकि हरिपुर मोहल्ला तक पहुंची। वहीं हरिपुर मोहल्ला से रानीताल तक दूसरा ताजिया का सफर शुरू किया गया। इसी तरह चार ताजिए अलग-अलग स्थानों से उठाकर शहर भर में ताजिए निकाले गए। इस दौरान ढोल-नगाड़ों के साथ समुदाय के लोगों ने छाती पीटकर तथा खेल तमाशों से इस गम माह में ईमाम हुसैन की कुर्बानी को याद किया, जिन्हें अत्याचारी यदीद के द्वारा उनके 72 साथियों के साथ निर्मम अत्याचार किए गए तथा शहीद कर दिया गया। उन्होंने बताया कि सबसे खास इस मर्तबा यह भी है कि इस वर्ष 10 सितंबर को इस्लामिक कैलेंडर के पहले ही मुहर्रम की शुरुआत हुई है। इस दौरान समुदाय के लोगों ने भगवान जगन्नाथ मंदिर में भी जाकर माथा टेका, वहीं मंदिर कमेटी ने तहसीलदार नारायण चौहान की अगवाई में समुदाय के पदाधिकारियों का यहां स्वागत किया। इस दौरान समुदाय के लोगों ने खैरात वितरण किया तथा कब्रों में जाकर सफाइयां इत्यादि की, वहीं बुजुर्गों को भी याद किया गया।