Tuesday, September 17, 2019 04:36 PM

नियमों के तहत हो शिक्षकों की भर्ती

जगदीश बाली

स्वतंत्र लेखक

खराब रिजल्ट, इन्क्रीमेंट की किच-किच, परीक्षा में नकल ,सरकारी स्कूलों में घटती छात्र संख्या, अध्यापकों के हवाले गैर शिक्षण कार्य, नो डिटैंशन, बच्चों का निम्न आधारभूत ज्ञान, शिक्षकों की कमी, फर्जी डिग्रियां, सदाबहार तबादले, इतने सारे पेचोखम व समस्याओं से पहले ही शिक्षा व शिक्षा व्यवस्था ग्रस्त व त्रस्त है। इस पर जब शिक्षकों की भर्ती में गोलमाल के मामले सामने आते हैं, तो लगता है जैसे घाव पर नमक छिड़का जा रहा है। उस समय स्थिति और भी शोचनीय व चिंतनीय हो जाती है। इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि एक ओर जहां विभिन्न सरकारें व विभाग के उच्चाधिकारी शिक्षा में गिरती गुणवत्ता पर चिंता जाहिर करते हैं, वहीं प्रदेश में चयन आयोग के अतिरिक्त अन्य माध्यमों से होने वाली शिक्षकों की भर्तियों में गोलमाल के मामले सामने आते ही रहते हैं। उल्लेखनीय है कि उक्त विद्या उपासक नियमित भी हो चुकी थी।

हालांकि कई नियुक्तियां इससे पहले भी रद्द होती रही हैं, परंतु उक्त मामले में नियुक्ति को इतने लंबे समय के बाद निरस्त किया गया है। खेद का विषय है कि चयन समिति के सदस्यों ने रिजल्ट शीट के साथ छेड़छाड़ कर अपने चहेते उम्मीदवार को फायदा पहुंचाया। इससे ज्यादा दुखद उस प्रार्थी की पीड़ा भी है, जिसे न्याय पाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। माननीय उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने से पहले प्रार्थी ने दो जांच एजेंसियों से न्याय की गुहार लगाई थी। परंतु उसकी गुहार को नजर अंदाज कर रिजल्ट शीट में की गई छेड़छाड़ को गलती सुधार का मामला ठहरा दिया गया। यह अलग बात है कि ऐसे सब मामले न्यायालय तक नहीं आते। जब शिक्षक अनैतिक तौर तरीके अपना कर या गोलमाल करके इस व्यवसाय में आएगा, तो अंदाजा लगाया जा सकता है उनके द्वारा प्रदत शिक्षा का स्तर क्या होगा और उसके शिक्षण की गुणवत्ता क्या होगी। आश्चर्य इस बात पर है कि भर्ती एवं पदोन्नति नियम के तहत भर्ती करने के लिए ही प्रदेश में चयन आयोग होते हुए भी पिछले दरवाजे से भर्तियां होती रहती हैं। नियमानुसार बैच आधार पर भी भर्तियों की व्यवस्था है। परंतु फिर भी पिछले दरवाजों से भर्तियां करने का आखिर प्रयोजन क्या है। हालांकि न्यायालय विभिन्न सरकारों को नियमों के तहत ही भर्ती करने के निर्देश देता रहा है, परंतु इनका दिल है कि मानता नहीं। एसएमसी भर्ती पर भी उच्च न्यायालय ने रोक लगा रखी है।

समझा जा सकता है कि सरकारों की अपनी मजबूरियां रहती होंगी। पर ऐसी भी क्या मजबूरी कि व्यवस्था का ही जंजाल बन जाए। मैं ये तो नहीं कह रहा हूं कि सभी उम्मीदवारों के चयन के मामलों में ऐसा होता है परंतु ऐसी भर्तियों में ऐसा होने की संभावना बढ़ जाती है। चयन आयोग के माध्यम से नियुक्ति में कम से कम लिखित परीक्षा तो अभ्यर्थी पास करता ही है। अब तो चयन आयोग के माध्यम से नियुक्तियों में लिखित परीक्षा के अंकों को मुख्य आधार माना जाता है। उधर दूसरे माध्यमों से नियुक्ति में अभ्यर्थी लिखित परीक्षा तो देता ही नहीं, साथ ही साक्षात्कार की कोई विश्वसनीयता या पारदर्शिता भी नहीं होती। स्टेट या डिस्ट्रिक्ट काडर के पदों में पंचायत व पटवार सर्किल को तरजीह दी जाती है।

ऐसे में समान अवसर के अधिकार का हनन तो होता ही है। ये कहना अनुचित नहीं होगा कि भर्ती नियमों की अनदेखी कर तरह-तरह के अन्य माध्यमों से शिक्षकों की नियुक्तियों से शिक्षा विभाग में एक ही पद पर कई  तरह से भर्ती शिक्षकों की भरमार है। विभाग के बारे में कहा जा सकता है कि कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा। ऐसी भर्तियों से बहुत से ऐसे लोग नियुक्त हो जाते हैं, जो अध्यापक तो बन जाते हैं पर अध्यापन का शऊर नहीं रखते। ऐसी नियुक्तियों से कानूनी पेचीदगियां भी आड़े आती रहती हैं। शिक्षा किसी भी समाज के भविष्य का पासपोर्ट होती है। इसीलिए कहते हैं यदि शिक्षा में बेहतर निवेश होगा तो भविष्य में बढि़या नागरिकों के रूप में अच्छा ब्याज मिलेगा। वक्त रहते संक्रमित शिक्षक भर्तियों को तिलांजलि दी जाए अन्यथा संक्रमण पूरी शिक्षा व्यवस्था को चट कर जाएगा। जो साख शेष बची है, उसे महफूज रखा जाए और जो बिगड़ा है उसे बना कर सुधारा जाए। अगर अब भी इस बात को नजर अंदाज किया गया, तो कहा जा सकता है ठोकर खा कर भी न संभले तो मुसाफिर का नसीब, राह का पत्थर तो अपना फर्ज अदा करता है।