Wednesday, December 11, 2019 05:38 PM

नियुक्तियों के दामन में दाग

नियुक्तियां अपने ही चंगुल के बाहर आकर तड़पने लगीं, तो आहों से भर गया औचित्य का भंवर। हिमाचल की सरकारों ने प्रश्रय की जमात बना कर पद्धति और परंपरा की बखिया न उधेड़ी होती, तो नियुक्तियों के दामन में दाग न होते। कमोबेश हर विभाग में कसरतें ऐसी रही हैं कि सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्रों में सुराख तथा विलाप देखा गया है। ऐसी ही नौकरी की पैमाइश में एसएमसी शिक्षकों पर आफत बन आई है, तो नियुक्तियों को खंगालते हाई कोर्ट के आदेश क्षमतावान प्रतीक्षारत उम्मीदवारों के लिए वरदान बन जाते हैं। होई कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक निर्देश में खामियों के पर्दे हटाते हुए एसएमसी शिक्षक की परोक्ष व्यवस्था पर जबरदस्त टिप्पणी की है। इस तरह अस्थायी व अप्रत्यक्ष भर्तियों के जरिए आजमाई जा रही एसएमसी व्यवस्था पर विराम लग जाएगा। यह दीगर है कि ऐसी भर्तियों के जख्म अब तक शिक्षा प्रणाली की सेहत पर प्रतिकूल असर डाल चुके हैं और अगर पिछले दो दशकों का ही हिसाब लगाया जाए तो मालूम होगा कि किस कद्र स्कूली शिक्षा को सियासत ने पंगु बना दिया। बिना माकूल व्यवस्था के खोले तथा स्तरोन्नत किए गए स्कूलों ने पढ़ाई को ही चौपट नहीं किया होता, तो आज शिक्षा की क्षमता कुछ और होती। बहरहाल अदालत ने भविष्य की अहमियत में शिक्षा प्रणाली को सुधरने का मौका दिया है और यह इसलिए भी क्योंकि निर्देशों के अनुसार सरकार को स्थायी शिक्षकों का फौरी प्रबंध करना पड़ेगा। इस तरह शिक्षा में जारी लंगड़ी व्यवस्था के तहत जो अप्रत्यक्ष नियुक्तियां हुई हैं उन पर रोक के अलावा भविष्य की परिपाटी में अर्थपूर्ण समाधान नजर आ रहा है। कुछ इसी तरह की आपत्तियां सचिवालय में गैर हिमाचली लिपिकों की तैनाती पर भी उठी हैं। कुल 155 क्लर्कों में से 16 पदों पर अगर बाहरी राज्यों से तैनाती हुई है, तो एतराज की वजह समझी जानी चाहिए। सचिवालय कर्मचारी संगठन ने इस विषय को प्रदेश के नीतिगत आदर्शों के विपरीत माना है और इसे नौकरी की निचली सीढ़ी पर खड़े विषाद की तरह देखा गया है। इसी तरह के कई अंतर्विरोध हिमाचल में सरकारी नियुक्तियों में दर्ज होते रहे हैं, लेकिन इनकी दुरुस्ती के लिए स्वतंत्र कर्मचारी आयोग नहीं बना। सबसे अधिक विसंगतियां शिक्षा विभाग के गले पड़ीं और सियासी प्रभाव ने भविष्य के निर्माण को चोटिल किया। कमोबेश ऐसी ही परिस्थिति चिकित्सा क्षेत्र को भी आजिज कर रही है। अप्रत्यक्ष नियुक्तियों के दरवाजे खोलकर सरकारों ने न केवल हिमाचली क्षमता और हुनर को नजरअंदाज किया, बल्कि शिक्षा-चिकित्सा जैसे क्षेत्र को अयोग्य होने के लिए लांछित भी किया। एक अजीब सी प्रतिस्पर्धा ने राजनीतिक मानसिकता को प्रदूषित किया, नतीजतन हर सरकार ने नौकरी देने के अपने-अपने चमत्कार के तहत ऐसी व्यवस्था पैदा कर दी, जो न न्यायोचित थी और न ही प्रदेश के हित में सफल हुई। अध्यापकों के ही विभिन्न श्रेणियों में मिले रोजगार का मुआयना करें, तो स्पष्ट हो जाएगा कि किस सरकार ने क्या गुल खिलाया और इसके कारण सरकारी कार्यसंस्कृति किस तरह औंधे मुंह गिरी। एक वक्त था जब शांता कुमार जैसे मुख्यमंत्री ने ‘नो वर्क, नो पे’ जैसे ईमानदार सफे पर हस्ताक्षर करते हुए कर्मचारी वर्ग की अहमियत को भविष्य के तराजू पर तोला, लेकिन इसके बाद इसी वर्ग का सियासी कॉडर खड़ा करने की कोशिश हुई। अप्रत्यक्ष नियुक्तियां ऐसे ही राजनीतिक कॉडर का सफर मानी जाएंगी। पिछले कुछ सालों के भर्ती घोटालों पर नजर दौड़ाएं तो मालूम हो जाएगा कि किस सरकार ने कितनी हदें तोड़ीं। कंडक्टर भर्ती से मजदूरी तक की नुमाइश में राजनेताओं ने अपने प्रभाव का कर्मचारी साम्राज्य खड़ा किया। इतना ही नहीं आज की तारीख में अहम नियुक्तियों या किसी विभागीय नौकरी के आईने में सियासत प्रतिबिंबित होती है, तो इसकी एकमात्र वजह नौकरी का वोट बैंक खड़ा करना रहा है। इसका विश्लेषण हो सकता है कि किस नेता ने अपने हक में इसका इस्तेमाल कैसे किया और यही वजह है कि स्थानांतरण नीति-नियम बनाने से हर सत्ता ने गुरेज किया। अब कर्मचारी वर्ग को साधने की कोशिश अप्रत्यक्ष नियुक्तियों से उन्हें अपनाने से आजमाने तक समाहित है। एसएमसी नियुक्तियों पर अदालत का निर्देश उन बेरोजगारों के लिए राहत का संदेश है, जो बिना किसी सिफारिश अपनी मेहनत और ईमानदारी के भरोसे सरकारी क्षेत्र से नौकरी की उम्मीद पाले हुए हैं।