Friday, August 23, 2019 05:56 AM

नियोजित शहर की आर्थिकी

नगर निकायों की हैसियत का खोखलापन हिमाचल की तस्वीर को ऐसी स्थिति में पहुंचा चुका है, जहां आमदनी के स्रोत प्रायः दिखाई नहीं दे रहे। यह दीगर है कि प्रदेश का शहरी उत्थान अब व्यावसायिक होने लगा है और यह सब निजी निवेश के कारण दिखाई दे रहा है। मंत्रिमंडल की बैठक में ग्राम एवं नगर विकास महकमे के माध्यम से इसकी जरूरत देखी गई। पहली बार लैंड पूलिंग का जिक्र भविष्य के निवेश में देखा गया। हालांकि इससे सरकार और जनता के बीच साझा विकास देखा जा रहा है, लेकिन पहले अस्त-व्यस्त रहे नगर नियोजन विभाग को इसकी अहम भूमिका में सशक्त किया जाए। लैंड पूलिंग से निजी जमीन की नई पैमाइश में सुविधाएं देखी जा रही हैं, लेकिन इससे पहले शहरों के आसपास जमीन की बिक्री ने विकास का खाका ही भविष्य की उधेड़बुन बना दिया है। यह केवल निजी जमीन पर ही दुरुस्ती के प्रश्न खड़े नहीं कर रहा, बल्कि सार्वजनिक भूमि के सही इस्तेमाल की जरूरत भी है। सरकार और निजी जमीन मालिकों के बीच पूलिंग के साथ-साथ विभागीय इमारतों की पूलिंग पर सोचना होगा। प्रदेश को अपनी सरकारी संपत्तियों के सही इस्तेमाल के लिए एस्टेट विकास प्राधिकरण का गठन करना होगा, ताकि उपलब्ध जमीन का किफायती प्रयोग किया जा सके। विडंबना यह है कि शहरों के बीचोंबीच पसरे विभागों ने अपनी सीनाजोरी से जमीन का दुरुपयोग ही किया है। शहरी विकास की नई परिभाषा तथा भविष्य को रेखांकित करते विकास के दृष्टिगत सरकारी इमारतों तथा विभागीय कार्यालयों का स्थानांतरण करना होगा। यह तभी संभव होगा अगर एस्टेट विकास प्राधिकरण को विभिन्न विभागों के भवनों का मालिकाना हक दिया जाए। इसी के तहत तमाम डाक बंगले भी लाए जाएं, तो प्रबंधकीय दृष्टि से इनका रखरखाव व सही-सही प्रयोग होगा। राज्य एस्टेट प्राधिकरण के गठन से दो-तीन प्रशासकीय शहरों के किसी ग्रामीण मध्य भाग में कर्मचारी नगर बसाए जा सकते हैं। इसी तरह कलस्टर के रूप में दो शहरों के मध्य में बड़े बस स्टैंड, बड़े पार्किंग मैदान, कूड़ा कचरा संयंत्र, परिवहन नगर तथा अदालत परिसर बसाए जा सकते हैं। कमोबेश हर बड़े शहर में बिखरे कार्यालयों को एक छत के नीचे तथा भविष्य की जरूरतों के अनुरूप विकसित करना होगा। नगर निकायों को अपने दायरे में लैंड बैंक विकसित करते हुए बेकार पड़ी भूमि, इमारतों तथा नदी-नालों के चैनेलाइजेशन से भविष्य की जरूरतों का उत्तर ढूंढना होगा। हर शहर की चारों दिशाओं में डंपिंग साइट्स की निशानदेही में अगर भविष्य के सामुदायिक मैदान तैयार किए जाते हैं, तो व्यर्थ होते अतीत या भवनों से निकलते कचरे का सही इस्तेमाल होगा। हर शहर से गांव तक की तरक्की में स्वरोजगार का ढांचा सुदृढ़ होना चाहिए तथा स्थानीय निकायों की आमदनी में निखार लाने का ढांचागत इंतजाम करना होगा। हर तरह के टावर्स की स्थापना का रोडमैप नए सिरे से स्थानीय निकायों की आय का स्रोत बन सकता है। इसी तरह गांवों में ईको तथा हाई-वे टूरिज्म, विपणन यार्ड और शहरों में मानव निर्मित झीलें, व्यापारिक परिसर, मनोरंजन पार्क तथा महापार्किंग जैसी ढांचागत सुविधाएं जुटाकर स्थानीय निकायों की रीढ़ मजबूत होगी और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।