Friday, December 06, 2019 09:45 PM

निवेश और कारोबार की चुनौतियां

डा. जयंतीलाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री

देश में आर्थिक सुस्ती तेजी से बढ़ी है और सरकार आर्थिक मोर्चे पर जारी सुस्ती को दूर करने में कुछ ही सफल रही है। गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों का संकट जल्द नहीं सुलझेगा। वैश्विक व्यापार विवाद के बीच सरकारी खर्च में कमी और उपभोक्ता मांग प्रभावित होने से देश की आर्थिक वृद्धि दर चालू वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में गिरकर पांच प्रतिशत पर आ गई है...

हाल ही में वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर सर्विस ने भारत की क्रेडिट रेटिंग ‘स्थिर’ से घटाकर ‘ऋणात्मक’ ‘निगेटिव’ कर दी है। रेटिंग घटाने के पीछे मूडीज ने भारतीय अर्थव्यवस्था में सुस्ती जारी रहने, ग्रामीण परिवारों पर वित्तीय दबाव, रोजगार सृजन कम होने और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों में नकदी संकट का हवाला दिया है। हालांकि मूडीज ने भारत की दीर्घावधि की सावरिन रेटिंग बीएए 2 को बरकरार रखा है। दो साल पहले नवंबर 2017 में मूडीज ने वर्ष 2004 से चली आ रही भारत की रेटिंग को बीएए 3 से बढ़ाकर बीएए 2 कर दिया था। मूडीज के निर्णय से पता चलता है कि देश में आर्थिक विकास के निचले स्तर पर बने रहने का जोखिम बढ़ रहा है। धीरे-धीरे कर्ज का बोझ बढ़ रहा है, जो पहले से ही उच्च स्तर पर है। इससे कारोबारी निवेश और उच्च वृद्घि को मदद देने के लिए आगे के सुधारों की संभावना भी कम हुई है। निश्चित रूप से मूडीज का कदम अनुमान के मुताबिक है। चूंकि देश में आर्थिक सुस्ती तेजी से बढ़ी है और सरकार आर्थिक मोर्चे पर जारी सुस्ती को दूर करने में कुछ ही सफल रही है। गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों का संकट जल्द नहीं सुलझेगा। वैश्विक व्यापार विवाद के बीच सरकारी खर्च में कमी और उपभोक्ता मांग प्रभावित होने से देश की आर्थिक वृद्धि दर चालू वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में गिरकर पांच प्रतिशत पर आ गई है। निःसंदेह भारत में कारपोरेट टैक्स सहित अन्य करों में लगातार छूट दिए जाने तथा कर संग्रह में कमी के कारण भारत का राजस्व घाटा ‘रेवेन्यू डेफिसिट’ और राजकोषीय घाटा ‘फिजिकल डेफिसिट’ तेजी से बढ़ते हुए दिखाई दे रहा है। खासतौर से राजकोषीय घाटा देश के सकल घरेलू उत्पाद ‘जीडीपी’ के 3.7 फीसदी तक जा सकता है। पिछले दिनों प्रकाशित नवीनतम राजस्व आंकड़ों के अनुसार केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2019-20 की पहली छमाही अप्रैल से सितंबर 2019 में बजट अनुमान के 92.6 फीसदी पर पहुंच गया है जबकि इस अवधि के दौरान राजस्व घाटा बजट अनुमान के 100 फीसदी पर पहुंच गया है। स्पष्ट है कि राजकोषीय और राजस्व घाटे की हालत खराब नजर आ रही है। वित्त मंत्रालय का कहना है कि भले मूडीज ने आउटलुक घटाया हो, लेकिन अर्थव्यवस्था सबसे रफ्तार से बढ़ने वाली इकोनॉमी में शामिल है। आईएमएफ  का मूल्यांकन और कई अन्य संस्थाओं का आउटलुक भी भारत के लिए पाजिटिव है। सरकार ने पूरी इकोनॉमी को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। सरकार के कई नीतिगत फैसलों से भी इकोनॉमी के फंडामेंटल मजबूत रहेंगे। महंगाई दर नियंत्रण में रहेगी। इतना ही नहीं कई वैश्विक रिपोर्टों में भी भारत का प्रस्तुतिकरण सुधरा है। लेकिन 24 अक्तूबर को वर्ल्ड बैंक द्वारा प्रकाशित ईज ऑफ  डूइंग बिजनेस 2020 में भारत 190 देशों की सूची में 63वें स्थान पर पहुंच पाया है। विश्व बैंक ने भारत को उन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया है, जिन्होंने लगातार तीसरे साल अपनी रैंकिंग में उल्लेखनीय सुधार किया है। प्रमुख कारोबार सूचकांकों के तहत कारोबार एवं निवेश में सुधार का परिदृश्य भी दिखाई दे रहा है। आईएमडी विश्व रैंकिंग 2019 के अनुसार, वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद ‘जीडीपी’ में तेज वृद्धि, कंपनी कानून में सुधार और शिक्षा पर खर्च बढ़ने के कारण भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ा है। इस रैंकिंग में भारत 43वें स्थान पर आ गया है। बौद्धिक संपदा एवं नवाचार में भारत के आगे बढ़ने का आभास इसी वर्ष 2019 में नवाचार, प्रतिस्पर्धा तथा बौद्धिक संपदा से संबंधित जो वैश्विक सूचकांक और अध्ययन रिपोर्टें प्रकाशित हुई हैं, उनमें भारत आगे बढ़ता हुआ बताया जा सकता है।  देश के नवाचार एवं कारोबार में आगे बढ़ने के पीछे एक प्रमुख कारण यह है कि वर्ष 2018-19 में भारत में डिजिटल अर्थव्यवस्था, घरेलू कारोबार, स्टार्टअप, विदेशी निवेश, रिसर्च एंड डेवेलपमेंट को प्रोत्साहन मिला है। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि अमरीका, यूरोप और एशियाई देशों की बड़ी-बड़ी कंपनियां नई प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारतीय आईटी प्रतिभाओं के माध्यम से नवाचार को बढ़ावा देने के लिए भारत में अपने ग्लोबल इन हाउस सेंटर ‘जीआईसी’ तेजी से बढ़ाते हुए दिखाई दे रही हैं। इंटरनेट ऑफ  थिंग्स, कृत्रिम बुद्धिमता और डेटा एनालिटिक्स जैसे क्षेत्रों में शोध और विकास को बढ़ावा देने के लिए लागत और प्रतिभा के अलावा नई प्रोद्यौगिकी पर इनोवेशन और जबरदस्त स्टार्टअप माहौल के चलते दुनिया की कंपनियां भारत का रुख कर रही हैं। चूंकि क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज की रेटिंग से विदेशी निवेश और विदेशों से ऋण लेने वाली कंपनियों की ब्याज दर संबंधित हैं अतः निश्चित रूप से मूडीज के द्वारा भारत की क्रेडिट रेटिंग घटाए जाने से भारत में आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ‘एफडीआई’ और संस्थागत विदेशी निवेश ‘एफआईआई‘ पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ गई है। ऐसे में जरूरी है कि उन बातों पर और अधिक ध्यान दिया जाए जिनसे देश की क्रेडिट रेटिंग निगेटिव हुई है। हमें आर्थिक सुधार की डगर पर अभी कई मीलों चलना है। अभी कई कमियों और चुनौतियों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। निःसंदेह सरकार के पास व्यापक आर्थिक व वित्तीय सुधार कार्यक्रम मौजूद हैं और उनमें से कुछ सुधारों को पहले ही लागू किया जा चुका है जबकि बकाया सुधारों को लागू किया जाना लंबित बना हुआ है। निश्चित रूप से देश की अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव के लिए विकास के साथ-साथ रोजगार अवसरों को बढ़ाया जाना होगा। विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर बढ़ाना होगी। कर अनुपालन और भुगतान को और सरल किया जाना होगा। जीएसटी का क्रियान्वयन सरल बनाया जाना होगा। सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण को कारगर तरीके से नियंत्रित करना होगा। उद्यमियों के लिए नौकरशाही कम करने तथा बैंकिंग प्रक्रिया आसान करने की जरूरत है। रोजगार, निर्यात और निजी निवेश बढ़ाने के कारगर प्रयास किए जाने होंगे। कारोबार के विभिन्न कदमों को तेज करने के लिए अभी भी दिखाई दे रहे भ्रष्टाचार को नियंत्रित करना होगा। हम आशा करें कि सरकार क्रेडिट रेटिंग बढ़ने से संबंधित सभी बातों पर ध्यान देगी। ऐसा किए जाने पर मूडीज द्वारा बताई गई क्रेडिट रेटिंग संबंधी कमियों को पूरा किया जा सकेगा। इससे भारत की क्रेडिट रेटिंग में सुधार हो सकेगा और इससे जहां भारत को अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विदेशी संस्थागत निवेश प्राप्त हो सकेंगे, वहीं भारत की कंपनियों को सरलतापूर्वक कम ब्याज दर पर ऋण भी प्राप्त हो सकेंगे।