Tuesday, March 31, 2020 08:15 PM

निवेश के द्वार पर एयरपोर्ट

निवेश के रास्ते पर खड़ा कांगड़ा एयरपोर्ट एक तरफ अपने विस्तार की संभावनाओं में प्रदेश की सूरत बदलने को उतावला है, तो दूसरी तरफ इस हकीकत को अंगीकार करने का वातावरण आड़े आ रहा है। सियासत के लिए मुद्दा ढूंढना आसान है और इसीलिए विस्तार का विरोध कई पंचायत चुनाव करा सकता है। दरअसल हिमाचल की राजनीति और सरकारों का आचरण जिस चम्मच से समाज को खिलाता रहा है, उस राशन में सलीका व तरीका कुछ और है। बहरहाल प्रदेश की प्रगति का सबसे बड़ा द्वार कांगड़ा के गगल एयरपोर्ट में खड़ा हो चुका है, बस इसकी वसीहत में सरकार की इच्छाशक्ति तथा जनसहमति का प्रबंधन कौशल देखा जाएगा। ऐसा नहीं है कि हिमाचल ने इससे पूर्व विकास के रास्तों की अड़चनें दूर नहीं की या प्राथमिकताओं को साबित नहीं किया, लेकिन अब हर दस्तूर में सियासत है। देखना यह है कि परियोजना के पक्ष और विपक्ष में भविष्य की कितनी चिंता है। कुछ इसी तरह केंद्रीय विश्वविद्यालय के पक्ष और विपक्ष में लोगों ने एक बड़े संस्थान की परिपाटी को ही जमीन पर रगड़ा था। कमोबेश हर जिला में ऐसी अनेक परियोजनाओं का उल्लेख हो सकता है, जहां राज्य को हारना पड़ा। अतीत में ऊना व वाकनाघाट के एसईजेड परियोजनाएं या धर्मशाला में अक्षरधाम मंदिर निर्माण भी ऐसी ही सियासत के शिकार हुए। मनाली का स्की विलेज तो सीधे-सीधे राजनीति का शिकार हुआ, वरना पर्यटन का मानचित्र आज हिमाचल को कहीं और देखता। प्रदेश में विभिन्न सड़क मार्गों, नेशनल हाई-वे, फोरलेन तथा एयरपोर्ट विकास को अब टाला नहीं जा सकता, इस तरह वर्तमान सरकार तथा सियासी परिदृश्य को अपनी सार्थकता में ऐसे मसलों का सहानुभूतिपूर्वक हल निकालना होगा। खासतौर पर कांगड़ा, हमीरपुर व ऊना के लिहाज से मुजारा कानून को याद रखना होगा, जहां सारी जमींदारी ही बदल गई। मुफ्त में आई जमीनों के कितने हिस्से बिके या इसके बाद कृषि उत्पादन पर इसका क्या असर हुआ, न कानून ऐसा कुछ साबित कर पाया और न ही सामाजिक परिवर्तन में इसका शृंगार हो पाया। कुछ इसी तरह नौतोड़ जमीनों के आबंटन में गई जमीन के लक्ष्य पूरे नहीं हुए, बल्कि लाभार्थियों ने इसे गाहे-बगाहे बेच कर खुद को पुनः भूमिहीन साबित करने का बंदोबस्त कर लिया। सत्तर के दशक में वनीकरण की धुन बजाते हुए हिमाचल ने अपने विकास की संभावनाओं से जमीन छीनकर जंगल के नाम कर दी और इस तरह प्रदेश के विकास में भूमि घाटा अब दबाव डाल रहा है। प्रदेश की सरकारों के पास आज तक यह डाटा ही उपलब्ध नहीं है कि सरकारी जमीन पर किस हद तक अतिक्रमण हुआ है। ऐसे में हिमाचल की भूमि उपलब्धता को सामान्य लैंडपूलिंग, सार्वजनिक जमीन के पैमाइश तथा वन क्षेत्र के उचित इस्तेमाल की अनुमतियों से ही बढ़ाया जा सकता है। बेशक अब विकास का हर्जाना तय होगा और इसे सामुदायिक संवाद, नए तौर-तरीकों, पंचायती राज के बेहतर दखल तथा उत्तम लेन देन या सौदे-मसौदे के तहत ही सम्मानजनक बनाया जा सकता है। प्रश्न कुछ खोने से शुरू होकर पाने की उम्मीद  और रोजगार के अवसर हासिल करने के आश्वासन तक रहेगा। हिमाचल का भविष्य ऊर्जा, सिंचाई, ट्रांसपोर्ट नेटवर्क व शहरीकरण के विस्तार से होते हुए उन तमाम दबावों के साथ नत्थी है जो रोजगार को पर्यटन की दृष्टि से देखता है। हिमाचल को प्रगति के नए इरादों और निवेश की जरूरतों के मुताबिक खरा उतरना है तो भू अधिग्रहण, पुनर्वास तथा मुआवजे का कुशल प्रबंधन करना होगा। कांगड़ा एयरपोर्ट विस्तार के साथ निवेश, भविष्य की आशाएं हैं, तो समुदाय के भीतर उठते प्रश्नों का उत्तर केवल आर्थिक व सामाजिक पहल से ही मिलेगा। जिंदगी के अधिकार, शांति तथा सामंजस्य की नए सिरे से व्याख्या करने के लिए आवश्यक होगा कि भौतिक विकास के साथ-साथ सामुदायिक विकास के हर पहलू को जोड़ा जाए। यानी एयरपोर्ट विस्तार के साथ पुनर्वास परियोजना भी रेखांकित की जाए। यह लैंडपूलिंग के साथ भविष्य को रेखांकित करती ऐसी योजना बना सकती है, जो अपने आप में निवेश केंद्र का रूप अख्तियार करेगी। इस हिसाब से कांगड़ा एयरपोर्ट विस्तार का महत्त्व पुनर्वास, नए बाजार व रोजगार से ही नुकसान की भरपाई कर पाएगा। हिमाचल सरकार ऐसी परियोजनाओं को छोड़ नहीं सकती और इसलिए सामुदायिक जिम्मेदारी के प्रति अपनी जवाबदेही तय करने का तरीका पेश करना होगा।