Tuesday, September 17, 2019 01:47 PM

निवेश बनाम विनिवेश

बहस की सुर्खियों में बहता पसीना विधानसभा सत्र की समीक्षा में जो लिखेगा, उसमें विपक्ष के हो हल्ले के बीच दो अधिकारी प्रतिबिंबित होंगे। ऊना में विधायक के विशेषाधिकार में कानून-व्यवस्था की पड़ताल का सबब, अंततः सत्र की बहस में एसपी स्तर के अधिकारी को परिदृश्य से हटाया गया, कुछ इसी तरह विपक्ष के मूल प्रश्नों ने निवेश-विनिवेश के भंवर में पर्यटन की जिम्मेदारी से अतिरिक्त मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी को अलहदा कर दिया। जाहिर है कि इन दोनों विषयों पर समाज और विधानसभा के व्यवहार में अंतर रहेगा और यहीं से दो अधिकारियों के मनोबल में फैसलों की पटकथा का क्रूर क्रम चस्पां होगा। ऊना के एसपी और विधायक के बीच कानून-व्यवस्था के साक्ष्य और सियासी तहजीब के प्रमाण जाहिर हैं, जिसके ऊपर काफी कुछ लिखा जा चुका है, फिर भी जनता की कचहरी में लोकतांत्रिक मूल्यों पर विवेचन होता रहेगा। दूसरी ओर जिस वजह से वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राम सुभग सिंह से मानसून सत्र ने पर्यटन की जिम्मेदारी छीनी है, उस पर राज्य का विवेचन आवश्यक है। यहां मसला यह नहीं कि सियासत की सूली पर कोई अधिकारी कब तक अपने मनोबल को चढ़ाता रहेगा, बल्कि यह है कि हिमाचल में वास्तव में निवेश और विनिवेश के मायने हैं। पर्यटन की इकाइयां तो पहले भी मंजिल और मकसद हार कर निजी किरदार में रूपांतरित हुईं, तो फिर इस दिशा में केवल भाजपा सरकार के हाथ खोटे क्यों हुए या यह क्यों न पूछा जाए कि जिस सियासत की तुष्टी पर ऐसी फिजूलखर्ची होती है, उसे क्यों न रोका जाए। क्या विपक्ष जिम्मेदारी के साथ अपने बहस के रुख को और धारदार बनाते हुए यह पूछ सकता है कि पर्यटन की इकाइयां घाटे में क्यों हैं या घाटे में चल रही एचआरटीसी के कितने डिपो अनावश्यक हैं। पर्यटन इकाइयों की नालायकी अगर एक अधिकारी को इसके विकल्प व समाधान तलाशने की जिम्मेदारी से हटा कर पूरी हो जाती है, तो कमोबेश हर विभाग में ऐसे लोगों की शायद ही उपयोगिता रह जाएगी। हिमाचल में कब निवेश बनाम विनिवेश को अलग-अलग परिप्रेक्ष्य में देखा जाएगा। न निवेश, विनिवेश से शुरू होता है और न ही विनिवेश से सरकारी दौलत हारती है। दरअसल हिमाचल में आर्थिक सुधारों की गुंजाइश ही समझी नहीं जाती, इसलिए यह प्रदेश अपने कद से बड़े आकार का सरकारी ढांचा ओढ़ने की सदैव कोशिश करता है और इसी कारण कई अलाभकारी सरकारी उपक्रम राज्य में घाटे की पैदावार के कारक बनकर भी चलाए जा रहे हैं। आखिर कब तक हिमाचल ऋण का बोझ बढ़ा कर और सार्वजनिक उपक्रमों को घाटे में चलाकर खुद को प्रगतिशील मानता रहेगा। यह विचारों की अजीब कैद है, जिससे बाहर निकलकर हिमाचल को अपनी चादर के मुताबिक पैर पसारने हैं। यह कई मोर्चों पर संभव होगा और कठोरतम व अलोकप्रिय फैसलों के दम पर होगा। निजी निवेश के बिना प्रदेश की स्थिति का मूल्यांकन घाटे की व्यवस्था कब तक करती रहेगी। कांग्रेस और भाजपा के बीच की दीवारों पर सुखद पोस्टर यह नहीं हो सकता कि नालायक और निकम्मे सार्वजनिक उपक्रम कितने सुरक्षित हैं, बल्कि यह जिक्र होना चाहिए कि किस तरह यह प्रदेश अपने घाटों से निकलकर आत्मनिर्भर हो सकता है। इन्वेस्टर मीट के आयाम अलग हैं, इसलिए बहस का मुखौटा पहनकर पर्यटन इकाइयों का बचाव करके भी हम हिमाचल का अवलोकन नहीं कर रहे। कमोबेश हर सरकार प्रदेश को केवल उधारी में सपने दिखा रही है, जबकि सच यह है कि हमने अनावश्यक संस्थानों की भीड़ में खुद को कर्ज में डुबो दिया है। हिमाचल के आर्थिक व वित्तीय औचित्य में अनावश्यक स्कूल-कालेजों व चिकित्सा संस्थानों की छंटाई के साथ-साथ घाटे के प्रतिष्ठानों को अलविदा कहने का समय आ गया है।