Wednesday, July 08, 2020 12:36 PM

नींबू प्रजाति फलों को ऐसे बचाएं रोगों से

गगनदीप सिंह

नींबू प्रजातीय फल जैसे संतरा, किन्नु, माल्टा, मौसमी तथा नींबू हिमाचल प्रदेश के निचले इलाकों में किसानों की आय का प्रमुख स्रोत है। इन फल वृक्षों पर विभिन्न अवस्थाओं में लगने वाले हानिकारक कीट काफी क्षति पहुंचाते हैं, जिनका समय रहते प्रबंधन करना अति आवश्यक है। यदि बागबानों को इनके बारे में जानकारी हो तो इन कीटों द्वारा होने वाले नुकसान को काफी कम किया जा सकता है। उनकी जानकारी हेतु मुख्य कीटों का विवरण इस प्रकार हैः-

  1. नींबू का सिल्ला : यह एक बहुत ही छोटे आकार का रस चूसने वाला कीट है। इस कीट के व्यस्क पत्तियों पर 30 डिग्री का कोण बनाकर बैठते हैं तथा जरा सा हिलाने पर उछल कर भाग जाते हैं। इस कीट के शिशु तथा प्रौढ़ फल वृक्षों की कोमल पत्तियों, शाखाओं और कलियों से रस चूसते हैं। प्रभावित पत्तियां पूर्ण रूप से खुल नहीं पाती हैं तथा विकृत हो जाती हैं। इसके अलावा ये कीट एक शहद जैसा चिपचिपा पदार्थ (हनी ड्यू) स्थापित करते हैं, जिस पर काली फफूंद जम जाती है, परिणामस्वरूप पत्तियां काली पड़ जाती हैं तथा पौधे अपना भोजन ठीक प्रकार से नहीं बना पाते। यह कीट रस चूसते समय एक जहरीला द्रव भी छोड़ता है, जिससे शाखाएं मुरझा कर सूखने लगती हैं। इसके साथ-साथ यह कीट ‘ग्रीनिंग’ नामक बीमारी के फैलाव में भी अहम भूमिका निभाता है। इन सभी के परिणामस्वरूप वृक्ष कमजोर पड़ जाते हैं, फल कम लगते हैं तथा समय से पहले गिरने भी लगते हैं।

प्रबंधन : सिल्ला कीट के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रिड 200 एसएल को 100 मिलीलीटर 250 लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें। यदि आवश्यकता हो तो 21 दिन बाद पुनः छिड़काव करें।

  1. पर्ण सुरंगी कीट (लीफ माइनर) : इस कीट का व्यस्क बहुत ही छोटा पतंगा होता है, जो कि कोमल पत्तियों पर अंडे देता है। कुछ दिन उपरांत इनमें से पीले रंग की सुंडियां निकलकर, पत्तियों के भीतर प्रवेश कर हरे पदार्थ को खाना प्रारंभ कर देती हैं तथा पत्तियों में टेढ़ी-मेढ़ी सुरंगे बनाती हैं। ये सुरंगे चांदी की तरह प्रतीत होती हैं फलस्वरूप पत्तियां पीली पड़ जाती हैं तथा पौधों की वृद्धि रुक जाती है। यह कीट पौधशाला तथा छोटे पौधों में बहुत क्षति पहुंचाता है। यह भी देखा गया है कि जहां पर इस कीट का आक्रमण होता है वहां केंकर भी अधिक होता है।

प्रबंधन : नया बागीचा लगाने हेतु पंजीकृत पौधशाला से ही स्वस्थ पौधे खरीदें। पौधशाला में फोरेट 10सीजी 150 ग्राम/100 वर्ग मीटर की दर से डालें। ध्यान रहे कि इस दानदार कीटनाशक को नंगे हाथों से न छुएं। प्रभावित फल वृक्षों पर इमिडाक्लोप्रिड 200 एसएल को 100 मिलीलीटर/ 250 लीटर पानी के दर से छिड़काव करें।

  1. नींबू की तितली : इस कीट का व्यस्क एक सुंदर काले रंग की तितली होती है, जिसके पंखों के ऊपर पीले रंग के धब्बे होते हैं। इस कीट की मादा पौधों की पत्तियों पर अंडे देती है, जिससे सुंडियां निकलकर नई पत्तियों को खाना प्रारंभ कर देती हैं। यह सुंडी शुरू की अवस्था में भूरे रंग की होती है, जिस पर बाद में सफेद धारियां पड़ जाती हैं। पत्तियों पर बैठी हुई यह सुंडी पक्षी की विष्ठा के समान प्रतीत होती है। इस उपरांत यह हरे रंग की हो जाती है। ये सुंडियां पत्तियों को बाहरी किनारे से मध्य शिरा की ओर खाती हैं, जो कि इस कीट के आक्रमण की पहचान है। अधिक आक्रमण की अवस्था में सिर्फ कांटे ही शेष रह जाते हैं। परिणामस्वरूप फल वृक्ष कमजोर हो जाते हैं तथा पैदावार बहुत प्रभावित होती है।

प्रबंधन : प्रारंभिक अवस्था में सुंडियों को पकड़कर नष्ट कर दें। फल वृक्षों पर क्विनालफॉस 500 मिलीलीटर/250 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।