Friday, August 14, 2020 08:06 AM

नीरज भारती के बहाने

इसे नीरज भारती के रूप में देखें, एक पूर्व विधायक के सियासी समीकरण में समझें या सोशल मीडिया की विकरालता में सामाजिक-सांस्कृतिक बिखराव की तरह लें। जो भी हो एक पूर्व विधायक की गिरफ्तारी के सारे साक्ष्य, बहाने और तरीकों को समेट कर सोशल मीडिया हिमाचल के कठघरे में खड़ा है। सीधे-साधे यह मामला साइबर क्राइम की जद में सोशल मीडिया के दुरुपयोग की नब्ज टटोल रहा है। अगर इसे एक राजनीतिक विषय की तरह देखें, तो सोशल मीडिया में किसी संतुलन की अपेक्षा करना सबसे बड़ी भूल होगी, लेकिन जिस विषय पर नीरज भारती ने भी चीन की तरह सीमा का उल्लंघन किया उससे असहज होने की वजह देश द्रोह तक पहुंचा दी गई है। हम इसके कानूनी पहलुओं की समीक्षा नहीं कर सकते, फिर भी यह कह सकते हैं कि कानून तक अगर चुनिंदा आपत्तियां ही दर्ज होंगी, तो यह सोशल मीडिया के दुरुपयोग से निपटने की कोई आदर्श रणनीति नहीं। आज की राजनीतिक स्थिति में प्रश्न पूछने की सरलता, सहजता, स्वतंत्रता तथा निरंकुशता में अंतर करने की जरूरत है। विडंबना यह है कि भारतीय मीडिया का एक बड़ा व प्रभावशाली हिस्सा निरर्थक व अप्रासंगिक होकर अपने हित साध रहा है। ऐसे में सोशल मीडिया पर राजनीतिक संवाद व तर्क न के बराबर हो गए हैं, क्योंकि अब बहस के दो ही पक्ष हैं। आप किसी विषय को समझने से पहले ही मन में तय कर चुके होते हैं या व्यक्ति आधारित राजनीतिक विमर्श के हिस्सा बन चुके होते हैं, तो सोशल मीडिया केवल एक मत पत्र है जहां आप समर्थक हैं या विरोधी। शायद इसीलिए आज का बुद्धिजीवी वर्ग या तो अकेला पड़ गया है या उसकी अहमियत को नकारा जा चुका है। विडंबना यह भी है कि भारतीय लोकतंत्र के प्रत्यक्ष व प्रमाणित मंचों पर अब असहमति के बिंदु तराशे नहीं जा सकते और मसलों का सामाजिक, सांस्कृतिक व बौद्धिक पक्ष गायब हो चुका है। देश की गटर राजनीति ने ही दरअसल सोशल मीडिया के गटर पैदा किए हैं और जहां पिछले कुछ समय ये चारित्रिक हनन की दिशा में सियासी आक्रमण देखे जा सकते हैं। यहां किसी को ‘पप्पू’ और किसी को ‘देवता’ बनाते देर नहीं लगती, लेकिन क्या समाज का बौद्धिक स्तर  अब उचित-अनुचित, सच-झूठ, सही-गलत, सपने-हकीकत और योग्य-अयोग्य के बीच अंतर करना ही भूल गया। दरअसल सोशल मीडिया पर राजनीतिक आधिपत्य कायम करने का एक संघर्ष जारी है। इस झूठ-फरेब में फंसे सोशल मीडिया पर चौबीस घंटे चुनाव चल रहा है, प्रचार चल रहा है। पहले सोशल मीडिया पर संघर्ष केवल सियासी अधिकार तक था जिसे अब हथियार की तरह इस्तेमाल करने की प्रतिस्पर्धा तक पहुंचा दिया गया है। इसकी भयावहता के कारण सामाजिक वैमनस्य से परिवेश की चुनौतियां बढ़ रही हैं, तो चेतना शून्य होती सरकारें केवल अपने लिए रक्षा कवच बुन रही हैं। पिछले चुनावों में आम आदमी पार्टी तथा भाजपा ने सोशल मीडिया के जरिए चुनावों को जिस मुकाम तक पहुंचा दिया, वहां से वापस लौटना मुश्किल है। अब तो अमरीका का चुनाव भी भारतीय परिप्रेक्ष्य में सोशल मीडिया की पैरवी सरीखा है, तो इसीलिए विदेश नीति या वैश्विक संबंधों पर टिप्पणियों का घातक असर दिखाई देता है। यहां नीरज भारती ने भी अपनी राजनीतिक रेंज से सोशल मीडिया के टेलिस्कोप का जितना इस्तेमाल किया, उस पर आपत्ति है। हालांकि यह अब सामान्य प्रवृत्ति है और जिस तरह टिप्पणियां हो रही हैं, मीम बन रहे हैं या ट्रोलिंग का दायरा युद्धरत है, उससे नागरिक समाज भी खुद को कब सियासी मोहरा बना देता है, इसका पता नहीं चलता। आश्चर्य यह कि लोकतांत्रिक संस्थानों के प्रति आस्था घट रही है या ये ढह चुके हैं, इसलिए आम आदमी भी किसी न किसी झुंड में शरीक हो जाता है। यह नीरज भारती की सोशल मीडिया की टिप्पणियों में भी देखा जाएगा कि उसके पक्ष में भी कितने हाथ उठते हैं या जो विरोध में रहे होंगे, वे भी सामान्य नागरिक ही होंगे। जिस तरह सोशल मीडिया के प्रति उत्साहित लोग अब अपनी सीमाएं भूल रहे हैं, उससे प्रशासनिक, सरकारी व कुछ अदालती मामलों के प्रति भी असम्मान प्रकट हुआ है। यह कदापि सही नहीं है। कोई भी अदना कर्मचारी कहीं भी टिप्पणी कर दे या अयोग्य लोग जहर उगलते रहे, तो देश कैसे चलेगा। उदाहरण के लिए इन दिनों एचआरटीसी के एक पूर्व कर्मचारी अपने एमडी के प्रति जो भाषा बोल रहे हैं, उसका संज्ञान भी उतना ही जरूरी होना चाहिए जितना किसी सियासी विषय पर होता है। जाहिर है हिमाचल में भी सोशल मीडिया के माध्यम से समाज ने अपनी भाषा-संस्कार  और संयम खोया है। समाज अजीब बौखलाहट में रहे और सरकार अगर असहमति व विरोध की भाषा से क्रोधित रहे, तो राज्य के गिरते स्तर का पता चलेगा। नीरज भारती मात्र युवा नहीं दो बार संविधान की शपथ लेकर भी अगर भाषा पर नियंत्रण नहीं रखते या अपराध की गिरफ्त में पूर्व विधायक के प्रति राज्य की संवेदना परिलक्षित है, तो हम बतौर समाज यह देख सकते हैं कि सोशल मीडिया में कितनी तेजी से हमारा नैतिक पतन हो रहा है।

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