Monday, October 14, 2019 10:55 AM

नेकी कर गड्ढे में डाल

गुरमीत बेदी

साहित्यकार

मेरे घर के आसपास कोई कुआं नहीं है। दूर-दूर तक कोई दरिया भी नहीं। इसलिए मेरा नेकी करने का बिलकुल भी मन नहीं करता। जैसे जनता से किए वादे पूरे करने का नेता का मन नहीं करता। नेता को लगता है कि अगर वादे पूरे कर दिए, तो नेताओं की बिरादरी उन्हें गलत परंपरा शुरू करने के लिए कोसेगी। उन्हें मर कर भी चैन नहीं मिलेगा। स्वर्ग या नरक जहां भी वे जाएंगे, नेताओं की बिरादरी से कैसे आंख मिलाएंगे। इस धर्म संकट की वजह से नेता अपने वादे पूरे करने का रिस्क नहीं ले पाते। उधर मैं नेकी करने का साहस नहीं जुटा पा रहा। मैं बेफिज़ूल की नेकी करके अपनी ऊर्जा का स्खलन नहीं करना चाहता। आखिर नेकी करके कहीं तो डालनी पड़ेगी। कुआं और दरिया दोनों मेरी पहुंच से दूर हैं। मैंने मोबाइल का जीपीआरएस सिस्टम ऑन करके गूगल पर भी सर्च करके देख लिया। कुआं मेरे घर से उत्तर पश्चिम में 25 मील दूर है और उसमें गांव के लोग अपने घर का कूड़ा-कचरा डालते हैं, ताकि गांव स्वच्छ रहे और स्वच्छ इंडिया का सपना फलीभूत हो। इसी तरह जीपीआरएस सिस्टम ने यह बताया कि दरिया मेरे घर से साढ़े तीन सौ मील दूर है और वहां के लिए कोई सीधी या टेढ़ी बस नहीं है। यानी मेरे नेकी करने की राह में बहुत रोड़े हैं। मैं नेकी करके डालूंगा कहां, यह यक्ष प्रश्न मुझे उद्वेलित किए जा रहा है। बीच-बीच में नेकी करने की भावनाएं मेरे भीतर नाग की तरह फन उठाती हैं, लेकिन फिर सामने कोई जरिया न देख शांत पड़ जाती हैं। थोड़ी देर बाद फिर से नेकी करने की तलब होती है, जैसे किसी अधेड़ को बस में साथ की सीट पर बैठी किसी सुंदर महिला से बात करने की नैसर्गिक तलब होने लगती है। मेरी नेकी करने की तलब बेकाबू हुए जा रही है और मैं इस तलब से वशीभूत होकर गांव के एक विद्यार्थी से पूछने लगता हूं कि ‘बेटा नेकी करने की बहुत इच्छा हो रही है, लेकिन नेकी करके डालूंगा कहां? कुछ आइडिया दो।’  विद्यार्थी हैरानी से मेरी तरफ देखता है। जैसे जानना चाह रहा हो कि नेकी और वह भी पूछ-पूछ, लेकिन मेरी आंखों में नेकी करने की बेचैनी को टपकते देख वह बड़े आदर-सत्कार के साथ मशविरा देता है कि हे अंकल! इसमें परेशान होने या संकोच करने की क्या बात है। सामने सड़क में इतने गड्ढे हैं कि नेकी करके किसी भी गड्ढे में डाल दो। नेकी को अपना ठौर मिल जाएगा और ईश्वर आपके बहीखाते में उस नेकी की एंट्री कर देगा। हो सकता है आपके द्वारा नेकी करके गड्ढे में डालने से गड्ढे और सड़क की तकदीर भी संवर जाए और रात को घर के लिए निकले शराबी भी सही-सलामत घर पहुंच जाएं। दोपहिया वाहन वाले गिरने से बच जाएं और उनकी हड्डी पसलियां सलामत रह जाएं। इन गड्ढों की वजह से कई डिलीवरी अस्पताल में होने की बजाय इन पर से गुजरने वाले वाहनों में ही हो चुकी हैं, जिससे अस्पतालों में डिलीवरी की मोटी फीस भी बची है और समय से पहले किलकारी भी सुनने को मिली है। इसलिए इन गड्ढों से बढ़कर कोई और पवित्र जगह नहीं हो सकती। आप निश्चिंत होकर बेहिचक नेकी करते रहिए और इन गड्ढों में डालते रहिए। ये गड्ढे हमारी आन, बान और शान हैं तथा हमारा लोकतंत्र इन्हीं गड्ढों से गदगदाएमान हो रहा है। यह सुझाव मुझे ठीक लगा कि नेकी करो और गड्ढे में डालो।