Wednesday, April 24, 2019 05:52 AM

नेताजी ! खेतीबाड़ी तो करें, पर पानी कहां से लाएं

भुंतर—सरकारी क्षेत्र में घटती नौकरी के विकल्प के तौर पर कृषि-बागबानी से स्वरोजगार की ओर युवाओं को धकेलने वाले सियासी हुक्मरान खेतों के लिए पानी देना भूल गए हैं। खेती-बागबानी से अच्छी आमदानी के सब्जबाग दिखाकर सरकारों ने पिछले दो दशकों में भले ही युवाओं को खेतीबाड़ी करने के लिए प्रेरित किया है, लेकिन खेतों को पानी न मिलने से अब युवा किसान अजीबोगरीब असमंजस है और साल-दर-साल भारी आर्थिक नुकसान उठाने को बेबस हंै। दूसरी ओर सियासतदान किसानों के नाम मात्र डींगे हांककर वोट बटोर रहे हैं और अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं। लिहाजा, इस बार किसान वोटर नेताओं से पानी का हिसाब लेने लगे हैं, जो नेताओं को चुनावी समर में पानी-पानी करवा रहा है। इसे शासनतंत्र की अव्यवस्था कहें या सियासी दलों की भारी सुस्ती, जिसने किसानों को न इधर का छोड़ा है न उधर का। कुल्लू के किसानों की बात करें तो यहां पर करीब 66 हजार कृषि योग्य भूमि है और इसमें से करीब 36700 हेक्टेयर भूमि पर खेती-बाड़ी हो रही है। हैरानी यह है कि सियासतदान अभी तक जिला की करीब 3000 हेक्टेयर जमीन को ही सिंचाई का पानी दिला सके हैं। शेष भूमि पर पानी के लिए किसान-भगवान भरोसे हैं। पिछले दो दशकों से सरकार ने अपनी नीतियों में बदलाव लाते हुए स्वरोजगार अेपनाने के प्रति लोगों को प्रेरित करने का मिशन चलाया है, लेकिन इस मिशन में छेद पड़ गया है। सिंचाई के लिए पानी न मिलने से परेशान जिला के किसानों की मानें तो अप्रैल से जून और अक्तूबर से दिसंबर तक के छह माह में खेतों में फसलों को उगाना चुनौतीपूर्ण हो गया है। सरकार ने दिल्ली से पानी के नाम पर बड़े-बड़े दावे कर योजनाएं तो बनाई है, लेकिन जमीन की हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। जिला कुल्लू की रूपी-पार्वती से लेकर खराहल, न्यूल, सैंज, बंजार, आनी-निरमंड और मनाली क्षेत्र के हजारों किसान पिछले दो दशकों से पानी-पानी चिल्ला रहे हैं। इनके लिए कागजों में योजनाएं भी स्वीकार हुई है, लेकिन सियासदानों की नींद के चलते पानी जमीन तक नहीं आ रहा है। दि लोअर कुल्लू किसान बागबान संगठन भुंतर के प्रधान यशपाल ठाकुर और पूर्व प्रधान करतार गुलेरिया के अनुसार सिंचाई सुविधा न होने से किसान आर्थिक दिवालियापन की स्थिति में पहुंचने को तैयार हैं और जल्द सरकार की तंद्रा नहीं टूटी तो हालात बहुत चिंताजनक हो जाएंगे। किसान मतदाताओं का कहना है कि नेताओं से पानी का हिसाब तो जरूर मांगा जाएगा और यह हिसाब वोट के रूप मंे नेताओं को चुकाना होगा। बहरहाल, स्वरोजगार का नारा देने वाले सियासतदान सुविधाएं देना भूल रहे हैं।