Saturday, April 20, 2019 02:14 PM

नेता जातिवाद छोड़ विकास को दें तरजीह

लोकसभा चुनावों की रणभेरी बजते ही सियासी पारे में आया उछाल हिमाचल में भी चढ़ता जा रहा है। सियासी दलों के साथ-साथ टिकट के कुछ चाह्वान जाति को मुद्दा बनाकर चुनावी समर में उतरने का दम भर रहे हैं। पर क्या जाति की बैसाखियों के सहारे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की पगडंडियों पर चलना उचित है! क्या जाति के नाम पर चुनावी समर में उतरने वाले नुमाइंदे लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं हैं, इन्हीं मुद्दों पर लोगों की राय सामने ला रहा है, प्रदेश का अग्रणी मीडिया गु्रप ’दिव्य हिमाचल’               सिटी रिपोर्टर- ऊना

जाति का आधार न हो

सलोह के समाजसेवी बलदेव सरोआ ने कहा कि लोकतंत्र के चुनाव जाति के आधार पर नहीं होने चाहिए। बल्कि परिपक्व व्यक्ति को ही चुनावी दंगल में उतारना चाहिए।

निपुण व्यक्ति लड़े चुनाव

मुबारिकपुर के अनिल कुमार कहते हैं कि लोकतंत्र में जाति विशेष को तरजीह देने से माहिर लोगों की काबिलियत नजरअंदाज हो जाती हैं। इसलिए नेतृत्व करने में निपुण व्यक्ति को ही चुनावों में आना चाहिए।

जाति प्रथा खत्म हो

सैंसोवाल के अग्रणी किसान शिव शशि कंवर ने कहा कि लोकतंत्र में आरक्षण देकर बेशक जातिप्रथा को खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन टिकट आबंटन में हर लेवल पर आज भी जाति विशेष को प्राथमिकता दीजाती है।

आगे आना चाहिए

थानाकलां के मनीष ठाकुर ने कहा कि राजनीति में नेतृत्व करने वालों को आगे आना चाहिए। किसी भी पार्टी को जातपात के आधार पर टिकट आबंटन नहीं करना चाहिए।

वोट को जाति पर न बांटे

कुरियाला गांव के शिव कुमार शर्मा का कहना है कि राजनीतिक दलों में आबादी व जात के आधार पर लोगों को नहीं बांटना चाहिए। चुनावों में माहिर व्यक्ति को ही तरजीह देनी चाहिए।