Monday, April 06, 2020 04:26 PM

नैणा माता मंदिर सरकीधार

हिमाचल प्रदेश में छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध मंडी जनपद मुख्यालय से चौबीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित रिवालसर झील हिंदू, सिख व बौद्ध धर्म का त्रिवेणी संगम स्थल होने के कारण आस्था के सागर में डुबकी लगवाती है। सुबह-शाम बौद्ध मंत्रों का उच्चारण, महर्षि लोमश,शिव मंदिर में पूजा आरती के स्वर, गुरुद्वारा श्री रिवालसर साहिब में शब्द कीर्तन, गुरबाणी के मधुर स्वर सांप्रदायिक प्रेम व सद्भावना का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं...

इतिहासकारों के अनुसार सातवीं-आठवीं शताब्दी में रिवालसर धार एक आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित होने लगा था। प्रसिद्ध गुरु गोबिंद सिंह जी भी यहां कुछ समय रहे थे। उन्होंने यहां पहाड़ी राजाओं की एक महत्त्वपूर्ण बैठक बुलाई थी। स्कंद पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार भी यहां लोमश ऋषि, माता पार्वती के संवाद में बताया गया हृदयलेश यही रिवालसर तीर्थ स्थान है। आठवीं शताब्दी में बौद्ध दर्शन के महान गुरु पद्मसंभव के यहां तपस्या करने, उपदेश देने तथा मंडी रियासत के सेनवंश राजा व राजकुमारी मांधर्वा का वर्णन भी ऐतिहासिक प्रमाण है। रिवालसर झील से करीब 13 किमी. की दूरी पर सरकी धार के सर्वोच्च शिखर पर समुद्रतल से लगभग 1830 मीटर की ऊंचाई पर स्थित माता नैणा देवी का मंदिर अनायास ही श्रद्धालुओं की पहली पसंद बनता जा रहा है। यह माता हजारों परिवारों की कुलदेवी के रूप में प्रसिद्ध है। लोककथा के अनुसार गांव की कन्या तारा का पीछा करता हुआ एक डाकू इस पहाड़ी की चोटी पर निर्जन स्थान पर पहुंचा, तो कन्या ने रक्षा के लिए भगवान कृष्ण से प्रार्थना की। कहते हैं कि उस कन्या को तभी महर्षि लोमश तपस्या में लीन दिखे। कुछ पलों के पश्चात वहां चट्टान की दरार में उस कन्या के समा जाने की भी लोकास्था है। बाद में वही कन्या उग्रतारा के नाम से विख्यात हुई। (माता उग्रतारा)मां नैणा जी को पार्वती का ही रूप माना गया है। मंडी के राजा सूरज सेन के शासनकाल में सन् 1630 ई. को इस मंदिर का निर्माण उसी प्रसिद्ध कारीगर ने किया था, जिसने मंडी का प्रसिद्ध माधोराय महल बनाया था। बाद में कुछ शेष बचे श्री नैणा माता मंदिर निर्माण कार्य को धार्मिक विचारों से ओत-प्रोत स्थानीय डोहओ गांव निवासी हरिराम द्वारा पूर्ण किया बताया जाता है। 18वीं शताब्दी में मंडी जनपद के राजा विजय सेन की आंखों की रोशनी भी इसी उग्रतारा देवी की कृपा से पुनः लौटने की भी लोकास्था प्रसिद्ध है। तभी मंडी के सेन वंशज राजा की आंखों की रोशनी पुनः लौटने की खुशी में इस माता को सेन वंशज राजा द्वारा चांदी के नयन भेंट स्वरूप चढ़ाए गए। तभी से माता का नाम नैणा देवी प्रसिद्ध हो गया। कुछ लोक कथाओं में माता पार्वती के नयन इस चोटी पर गिरने की भी लोकस्था है। मंदिर में डोहू गांव के पुजारियों के करीब सात पारिवारों ने पूजा व्यवस्था को संभाला हुआ है। सन् 1905 में आए भयंकर भूकंप से माता का प्राचीन भव्य मंदिर टूट गया। फिर दोबारा उसी स्थान पर पहले यहां छोटा सा माता का प्राचीन मंदिर बनाया। बाद में जिसका जीर्णोद्धार करके विशाल भव्य मंदिर का निर्माण करवाया गया है। मंदिर में वर्ष 2007 से श्रद्धालुओं के सहयोग से प्रतिदिन लंगर की व्यवस्था निरंतर जारी है। इस मंदिर प्रांगण में हनुमान जी का मंदिर भी है। यहां श्रद्वालु जातरा लेकर भी आते हैं। मंदिर में मंगलवार व रविवार ज्यादा रौनक होती है। यहां मंदिर के प्रमुख द्वार पर मां नैणा देवी की अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है। बाबा धजाधारी एंव नैणा माता मंदिर समिति की देखरेख में यात्री रात्रि विश्राम हाल, लंगर, भजन कीर्तन हाल की उचित व्यवस्था है। यहां यात्रियों के ठहरने के लिए हिमाचल प्रदेश लोक निर्माण विभाग का विश्राम गृह, होटल भी है। रोजमर्रा का सामान व पूजा सामग्री मंदिर प्रांगण के समीप ही दुकानों में उपलब्ध है। यहां पहुंचने के लिए श्रद्वालु किसी भी मौसम में सड़क मार्ग से आवागमन सुलभ कर सकते हैं। चंडीगढ़ की ओर से आने वाले धार्मिक पर्यटक कुल्लू-मनाली वाली बसों से मंडी होते हुए आसानी से यहां आ सकते हैं। मंदिर के समीप ही बौद्ध अनुयायियों द्वारा निर्मित विचित्र रोशनी की चकाचौंध से सुसज्जित गुफा व सरकी धार परिक्रमा में सात प्राकृतिक सरोवर दर्शनीय स्थल इस यात्रा को चिरस्मरणीय बना सकते हैं। देवी के मंदिर में सच्चे मन से मांगी मुरादें अवश्य पूरी होती हैं।

- रवि कुमार सांख्यान, बिलासपुर