न्याय और सत्य

स्वामी विवेकानंद

गतांक से आगे...

उनका उसूल था न्याय और सत्य के सामने वो हार न मानेगे और कभी नाइंसाफी को गले नहीं लगाएंगे। अदालत में मुकदमा चलने लगा। नरेंद्र के स्वर्गीय पिता विश्वनाथ बाबू के दोस्त प्रसिद्ध बैरिस्टर उमेश चंद्र बंद्योपाध्यान ने खुद प्रवृत्त होकर मुकदमा चलाने का भार अपने सर ले लिया। इस मुकदमे से संबंधित कुछ घटनाओं से नरेंद्र की तीक्ष्ण बुद्धि, चरित्र आदि की दृढ़ता का परिचय मिला। जिस समय विपक्ष के वकील नरेंद्र से जिरह कर रहे थे, उस समय नरेंद्र के निर्भीक, स्पष्ट, धीर और गंभीर उत्तर सुनकर और यह जानकर कि वो कानून पढ़ रहे हैं, जज महाशय हर्ष से बोल उठे। युवक समय आने पर तुम एक अच्छे वकील बनोगे। उन्होंने सारी स्थिति को समझकर अपना फैसला नरेंद्र के हक में सुना दिया। मुकदमा जीतने के बाद नरेंद्र खुशी-खुशी मां को खबर देने घर की ओर चल दिए कि विपक्ष के अर्टी ने उनका हाथ पकड़कर उनको रोका और खुशी के साथ कहा, जज साहब से मैं भी सहमत हूं। कानून ही योग्य क्षेत्र है। मैं आपका उज्ज्वल भविष्य चाहता हूं। घर पहुंच नरेंद्र ने खुशी से अपनी माता से कहा, मां मकान हमारे पास आ गया। मां ने खुशी से अपने आपको भूलकर विजयी बेटे को अपने सीने से लगा लिया। दुःखों में भी भगवान कभी-कभी सुख की एक लहर भेज देता है, यही संसार है। एक के बाद एक दिन बीतने लगा, लेकिन नरेंद्र की सांसारिक परिस्थितियों में कोई सुधार नहीं हुआ। एक दिन उन्होंने सोचा क्या मालूम श्री रामकृष्ण की कृपा से कुछ सुधार हो जाए। मन में यह बात उठते ही वो दक्षिणेश्वर पहुंच गए। अपने प्रिय नरेंद्र को पाकर श्री रामकृष्ण खुशी से झूम उठे, किंतु नरेंद्र की पूरी कहानी सुनने के बाद उनका चेहरा गंभीर हो गया। असीम विश्वास के साथ नरेंद्र ने उनसे कहा, महाराज मेरी माता और भाई-बहनों को दो दाना अन्न खाने को मिल सके, इसके लिए आप अपनी काली माता से कुछ अनुरोध कीजिए। श्री रामकृष्ण ने कहा अरे, मैं मां से कभी कुछ नहीं मांगता। फिर भी तुम लोगों का भला हो इसलिए एक बार उनसे अनुरोध किया था, पर तू तो मां को मानता ही नहीं, इसलिए मां तेरी बात पर ध्यान नहीं देती। श्री रामकृष्ण अगर चाहते तो नरेंद्र को भला क्या नहीं दे सकते थे। उन्होंने जिस के दुःख को जानकर खुद भिक्षा के लिए निकल पड़ने का संकल्प किया था, क्या वो उसी नरेंद्र के अनुरोध की उपेक्षा कर सकते थे? मगर लीलामय श्री रामकृष्ण भी छोड़ने वाले नहीं थे। वो शिष्य की परीक्षा के लिए बार-बार कहने लगे, मां की कृपा के बिना कुछ नहीं होगा। नरेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया, यह देखकर श्री रामकृष्ण ने आगे कहा, अच्छा आज मंगलवार है।