Saturday, September 22, 2018 11:05 AM

न स्वयं विक्षुब्ध हों, न औरों को विक्षुब्ध करें

दूसरी बात यह है कि अन्याय-पीडि़त व्यक्ति की अंतरात्मा कलुषित नहीं होती, इसलिए वह उग्र स्तर के ऐसे विग्रह नहीं करती जो अन्य निर्दोष लोगों को कष्ट पहुंचाए। जिसका जीवन स्वयं में कलुषित रहा हो, जिसने अनेक को कष्ट पहुंचाने में रस लिया हो, ऐसे ही लोगों की आत्माएं इतनी हिंस्र हो सकती हैं...

-गतांक से आगे...

यदि मन आत्मग्लानि, आक्रोश आदि भावों से भरा रहे, तो उससे न केवल इस जीवन में भी वह मनःस्थिति बहुत अंशों में ज्यों की त्यों बनी रहती है, वरन विश्राम के लिए मिले हुए उस अवकाश में भी प्राणी को चैन नहीं लेने देती। इस तथ्य पर उपरोक्त घटनाओं से प्रकाश पड़ता है। इस प्रकार का यही एक प्रमाण नहीं, वरन समय-समय पर ऐसी ही अनेक घटनाएं घटित होती रहती हैं, पर इन्हें महत्त्व नहीं मिलता। उपहास और अविश्वास के गर्त में वे घटनाएं भी उपेक्षित हो जाती हैं, जो वस्तुतः बहुत प्रामाणिक थीं, यदि उनका गहराई से विश्लेषण होता तो उस प्रत्यक्ष के आधार पर परोक्ष पर बहुत कुछ प्रकाश पड़ सकता था। उपरोक्त इशर के कस्बे के समीप वाले जंगल की घटना को इसलिए महत्त्व मिला कि पुलिस, पत्रकार आदि लोगों ने उसमें दिलचस्पी ली। यदि वे लोग उस खोजबीन में भाग न लेते तो मोटर वालों की ही सनक या शरारत कहकर, उसे उपेक्षित कर दिया गया होता। यह ठीक है कि कितनी ही मनगढ़ंत ऊल-जलूल बातें भी होती रहती हैं, पर उनमें से कुछ ऐसी भी होती हैं, जिनकी खोजबीन करने से उन तथ्यों पर प्रकाश पड़ सकता है, जो अभी तक एक प्रकार से अपूर्ण, उपेक्षित और अविश्वस्त ही बने हुए हैं। इस घटना में ठेकेदार की आत्मा का प्रकोप सिद्ध नहीं होता, क्योंकि एक व्यक्ति के दुर्व्यवहार का क्षोभ प्रायः एक तक ही सीमित रहता है। दूसरी बात यह है कि अन्याय-पीडि़त व्यक्ति की अंतरात्मा कलुषित नहीं होती, इसलिए वह उग्र स्तर के ऐसे विग्रह नहीं करती जो अन्य निर्दोष लोगों को कष्ट पहुंचाए। जिसका जीवन स्वयं में कलुषित रहा हो, जिसने अनेक को कष्ट पहुंचाने में रस लिया हो, स्वार्थ सिद्धि के लिए कितनों के साथ ही अनाचार विश्वासघात किया हो, ऐसे ही लोगों की आत्माएं इतनी हिंस्र हो सकती हैं, जो अनायास लोगों को कष्ट पहुंचाकर, अपनी पूर्व आकांक्षाओं की तृप्ति करें। इस दृष्टि से क्लाइव की आत्मा के द्वारा यह उपद्रव होता हो तो आश्चर्य की बात नहीं है। घटना इस तथ्य पर प्रकाश डालती है कि एक शरीर छोड़ने और दूसरा प्राप्त करने के मध्यांतर में आत्मा को सूक्ष्म शरीर धारण करके, अंतरिक्ष में विचरण करना पड़ता है। यह इसलिए भी होता होगा कि शरीर रहते किए हुए दुष्कृत्यों के परिणामों को वह अधिक विस्तारपूर्वक देख-समझ सके और भविष्य के लिए उस अवांछनीय नीति की अनुपयुक्तता को स्वीकार कर सके। दूसरा तथ्य यह प्रकट होता है कि सूक्ष्म शरीर बिलकुल असमर्थ नहीं हो जाता, उसमें न केवल भावनात्मक क्षमता रहती है, वरन भौतिक वस्तुओं को प्रभावित करने जैसी सामर्थ्य भी रहती है। यदि ऐसा न होता तो मोटर के शीशों में ठीक गोल छेद करना कैसे बन पड़ता? उस क्षमता को प्रेत जीवन में भी भले और बुरे प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त करके पुण्य और पाप की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। मरणोत्तर जीवन में संस्कार क्षेत्र प्रौढ़ रहता है, विचार तंत्र सो जाता है। जिस प्रकार के विचारों और कार्यों में मनुष्य जीवन भरा रहता है, वही अंतःचेतना मरणोत्तर स्थिति में प्रबल रहती है और अनायास ही उसी स्तर की गतिविधियों का क्रम चलता रहता है। मरणोत्तर जीवन, शांत, सुखी, परोपकारी स्थिति का रहे, इसके लिए जन्म में तैयारी करनी पड़ती है। उच्च विचार और शुद्ध जीवन रखकर, जहां इहलौकिक जीवन सराहनीय और सम्मानित स्तर का रखा जा सकता है, वहां उसका परिणाम मरणोत्तर काल में देवोपम हो सकता है। दुष्ट और दुरात्म जीवन क्रम न इस लोक में सराहा जाता है, न परलोक में शांति मिलने देता है। विक्षुब्ध, दुष्कर्म निरत लोग न इस लोक में शांति पाते हैं और न ही परलोक में।

अनीति का प्रतिशोध : जापान की जनश्रुतियों में सत्रहवीं सदी के महाप्रेत सोगोरो की कथा एक ऐतिहासिक तथ्य की तरह सम्मिलित हो गई है और अनाचार बरतने वालों को अकसर वह घटनाक्रम इसलिए सुनाया जाता रहता है कि वे अनीति से बाज आएं।

 -क्रमशः

(यह अंश श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित पुस्तक ‘भूत कैसे होते हैं, क्या करते हैं?’ से लिए गए हैं।)